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‘ऑटोसजेसन’ अर्थात् स्वसंकेत। आत्मसुधार का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। इसके द्वारा अवचेतन मन की गहराई में प्रवेश कर उस क्षेत्र में जमी विकृत अभिरुचियों में अभीष्ट सुधार- परिवर्तन किया जा सकता है। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है, जिसके सहारे अपने आपको अभीष्ट दिशा में चल पड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। वैसे दूसरों पर भी इस विद्या का प्रयोग करके उन्हें शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सुधारा जा सकता है; पर स्व- सम्मोहन या स्व- संकेत प्रक्रिया द्वारा यदि व्यक्ति अपने आपको स्वस्थ, नीरोग, सामर्थ्यवान, प्रतिभासंपन्न माने और निरंतर इसी भावना का संकेत अपनी आत्मा को देता रहे, इसी विचार में पूर्ण निश्चय एवं विश्वास भरकर अपने आपको इसी का संकेत दे, तो वह निश्चित ही तदनुरूप ढलता जाएगा, आवश्यकता केवल निरंतर सूचना या संकेत देने की है। जितने उत्कृष्ट एवं परिपुष्ट संकेत होंगे, उतना ही महान् परिवर्तन होगा, उतने ही उत्कृष्ट तत्त्वों की सिद्धि होगी। 
यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि सजेशन अर्थात् संकेत क्या है? उत्कृष्ट, पुष्ट एवं दृढ़ विचार, स्पर्श, ध्वनि, शब्द, दृष्टि तथा विभिन्न आसनों तथा क्रियाओं द्वारा अपने अथवा दूसरों के मन पर प्रभाव डालने और अपनी इच्छा द्वारा कार्य संपन्न करने का नाम ‘संकेत’ करना है। संकेत ऐसे वाक्यों से किया जाता है, जिनमें अपूर्व दृढ़ता, गहन श्रद्धा, शब्द- शब्द में शक्ति भरी रहती है। साधक बारंबार कुछ शब्दों, वाक्यों तथा सूत्रों को लेता है, मंत्रजप की तरह बार- बार उन्हें मन में उठाता है और उन पर अपनी विचार- क्रिया दृढ़ करता है। पुनरावर्तन द्वारा कुछ समय पश्चात् ये विचार स्थायी स्वभाव में परिणत हो जाते हैं। मन को जिस प्रकार का प्रबोध बार- बार दिया जाता है, कालांतर में वही उसकी स्थायी संपत्ति हो जाती है। मन ही हमारे संपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक क्रिया- कलापों का संचालक है। यह प्रचंड शक्ति वाला यंत्र है। विचारों को उत्पन्न, परिवर्तन व परिवर्द्धन करने का कार्य भी इसी संचालक यंत्र द्वारा होता है। अतः स्व- संकेत का सीधा प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। जब मन इन संकेतों से अपना पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उन्हें स्वीकार कर लेता है, तब वह अपने क्रिया- व्यापार, व्यवसाय उनके अनुसार करने लगता है, सफलता व सिद्धि तब दूर नहीं रह जाती। 
प्राचीनकाल में भारतीय ऋषि- मनीषियों ने इस संबंध में गहन अनुसंधान किए थे और अद्भुत सफलताएँ अर्जित की थीं। आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं एवं मनोवैज्ञानिकों के अनुसंधानों ने भी अब उक्त तथ्योंकी पुष्टि कर दी है। शरीर- विज्ञान और मनोविज्ञान की दृष्टि से क्या- क्या परिवर्तन देखे गये हैं? इससे हमारी जाग्रत चेतना के गर्भ में अन्य परतों तक पहुँच कैसे संभव है, इस संदर्भ में विख्यात लेखक एवं मनोवैज्ञानिक चार्ल्स टी.टार्ट ने अपनी कृति ‘आल्टर्ड स्टेट ऑफ कांसिअशनेश’ में विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। 
विश्व के अनेक देशों में विगत चार दशकों से हिप्नोसिस एवं ऑटोसजेशन पर अनेक अनुसंधान कार्य हुए हैं। पाया गया है कि इन प्रक्रियाओं द्वारा प्रसुप्त चेतना की परतों को आसानी से उभारा और परिष्कृत किया जा सकता है। विश्वप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ऑल्डुअस हक्सले के अनुसार मनुष्य का चेतनक्षेत्र समुद्र की तरह गहरा और विशाल है। उसकी अनके परतें हैं। ऊपरी सतह से नीचे उतरने पर पाई जाने वाली इन परतों को अचेतन, अवचेतन, सुपरचेतन की परतें कहते हैं। सक्रिय मस्तिष्क को निद्रित कर देना और अचेतन को क्रियाशील बना देना सम्मोहन एवं स्व- संकेत द्वारा संभव है। इस प्रकार की स्व- संकेत या स्व- संवेदन प्रक्रिया को ‘आटोजेनिक ट्रेनिंग’ नाम दिया गया है। 
सम्मोहन में प्रायः सम्मोहित व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है और उसके निर्देशों एवं संकेतों के आधार पर चलना पड़ता है। इससे उसके व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ सकता है। यह कमी ‘ऑटोसजेशन’ या ‘ओटोजेनिक ट्रेनिंग’ से दूर हो जाती है। यह एक प्रकार की साइकोथैरेपी है, जो स्वयं के द्वारा स्वयं के लिए की जाती है। जर्मनी के मनोवैज्ञानिक जे.एच. शुल्त्ज ने अपनी कृति ‘ओटोजेनिक ऑरगन एक्सरसाइजेज’ में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक लिखा है। उसके अनुसार इस ट्रेनिंग में विभिन्न प्रकार के संकेतों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों में शिथिलन एवं ऊष्मा का संचार किया जा सकता है। इन क्रियाओं के कारण होने वाली शारीरिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन को शरीरक्रियाविज्ञानियों ने अध्ययन किया है। पुराने संस्कारों, आदतों को नष्ट करने और नवीन आदतों तथा संस्कारों को उत्पन्न करने का सबसे सरल और प्रभावकारी तरीका स्व- संकेत का अभ्यास है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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