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ब्राह्मण परंपरा में यज्ञ को एक अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। ब्राह्मण के छह कर्म बताए गए हैं। इन्हें तीन युग्म भी कहा जाता है- (१) विद्या पढ़ना- विद्या पढ़ाना,  (२) दान देना- दान दिलाना,(३) यज्ञ करना- यज्ञ कराना। इन तीन युग्मों में एक यज्ञ से संबंधित है। इसका दूसरा अर्थ हुआ कि ब्राह्मण का एक- तिहाई जीवन यज्ञ- प्रक्रिया से संबंधित है। संध्या की तरह अग्निहोत्र भी उसके नित्य कर्म में सम्मिलित रखा गया है। इस अनुशासन का विशिष्ट लाभ यह है कि लोकसेवी परमार्थपरायण जीवन को शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से नीरोग- समर्थ होना चाहिए। यज्ञ सान्निध्य से यह उभयपक्षीय समर्थता उपलब्ध होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उच्चस्तरीय समर्थता प्राप्त करने के लिए ब्रह्मकर्म में यज्ञ कृत्य को प्रमुख स्थान दिया गया है। 
भगवान् मनु ने ब्राह्मणत्व के उद्भव में यज्ञ को प्रमुख आधार बताया है। वे कहते हैं- महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः। (२/२८) अर्थात् यज्ञों और महायज्ञों की सहायता से इन्हीं सामान्य शरीरों को ब्राह्मण बनाया जाता है। ब्राह्मण किसी वंश विशेष में पैदा नहीं होता, वरन् वह यज्ञोपचार से बनाया- ढाला जाता है। 
मकरध्वज रसायन की विशिष्टता प्रसिद्ध है। उसमें पदार्थ तो साधारण ही होते हैं, पर विशेष अग्नि संस्कारों की पद्धति से उसे अमृतोपम बनाया जाता है। उसी प्रकार यज्ञ- संपर्क में निरंतर रहने वाले शरीर बल एवं मनोबल के ही नहीं, आत्मबल के भी धनी बनते हैं। इन्हीं विशेषताओं से सुसंपन्न व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते थे। उन्हें सर्व- समर्थ माना जाता था और श्रद्धा वंदन प्रस्तुत करके आशीर्वाद माँगा जाता था। उनके आशीर्वाद जिस दिव्य सामर्थ्य के सहारे फलित होते थे, उसका उपार्जन विशिष्ट साधनाओं के सहारे किया जाता था। इन साधनाओं में यज्ञ- साधना का स्थान और महत्त्व सदा असाधारण माना जाता रहा है। 
यज्ञ से वायुमंडल का शोधन, वातावरण में व्याप्त विषाणुओं का नाश और आरोग्य रक्षा की कल्पना प्रायः हर भारतीय करता है। आरोग्य संदर्भ में यज्ञोपचार की सहायता से रोग- निवारण और शक्ति- संवर्द्धन के दोनों ही उद्देश्य पूरे हो सकते हैं। यह कार्य अन्य साधनों के सहारे भी सध सकता है, पर उनमें सात्विकता के उच्च स्तर का अभाव ही रहता है। मांस- मदिरा से बने खाद्य पदार्थ भी शक्ति- संवर्द्धन में किसी तरह सहायक हो सकते हैं,पर उन अभक्ष्यों में जुड़ी रहने वाली तामसिकता का प्रवेश भी उपयोगकर्त्ता के शरीर में होगा। फलतः उपलब्ध सामर्थ्य का दिशाप्रवाह निकृष्ट स्तर की दुष्प्रवृत्तियों को अपनाने, चरितार्थ करने में ही होता रहेगा। ऐसी दशा में वह बढ़ा हुआ बल कुमार्गगामी होने के कारण अंततः उपार्जनकर्त्ता के लिए हानिकारक ही सिद्ध होगा। बलिष्ठ होने की उपयोगिता- आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, पर उसका वास्तविक लाभ तभी है, जब उसमें उत्कृष्टता की मात्रा भी बनी रहे। यज्ञ के माध्यम से सूक्ष्मीकृत पुष्टई अपने प्रभाव- क्षेत्र में ऐसी सामर्थ्य उत्पन्न करती है, जो सच्चे अर्थों में बलिष्ठ बना सके और उस उपलब्धि का उपयोग उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संभव हो सके। 
ब्राह्मण के लिए यह आत्मिक बलिष्ठता अनिवार्य घोषित की गई। वह लौकिक सुखोपभोग में संचरण करने वाला जीव नहीं, उत्कृष्ट विचारों और श्रद्धासिक्त भावनाओं में रमण करने वाला देवता कहा जाता है। ब्राह्मण की गरिमा प्राप्त करना चाहे जिस किसी के बस की बात नहीं, उसे आचरण की उत्कृष्टता और पात्रत्व की परीक्षा देनी होती है। कहीं की भी फिसलन उसे पदच्युत कर देती है। इन्हीं तथ्यों का बार- बार स्मरण कराते रहने के लिए ब्राह्मण के लिए यज्ञकर्म अनिवार्य बताया गया है। संगति के गुण आने स्वाभाविक हैं। अग्नि के सान्निध्य में उपार्जित ऊष्मा, तेजस्विता, ऊर्ध्वचिंतन और परमार्थ के भाव उसे यज्ञ भगवान् से ही प्राप्त होते हैं। जो इस सत्य को पहचान कर अपने आचरण में ढाल लेता है, वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी हो सकता है। 

(शांतिकुंज फीचर्स, हरिद्वार) 


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