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शास्त्रकारों ने एक बड़े रहस्य का उद्घाटन किया है— बुद्धेबुद्धिमतां लौके नास्त्यगम्य हि किंचन। बुद्धया यतो हता नन्दश्चाणक्यनासिपाणया॥ 
अर्थात्- ‘बुद्धिमानों की बुद्धि के आगे संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है। बुद्धि से ही शस्त्रहीन चाणक्य ने सशस्त्र नन्दवंश का नाश कर डाला।’ 
मनुष्य के हाथ- पैरों की अर्थात् मानवीय शरीर की स्थूल शक्ति अन्य पशुओं के मुकाबले में भी गयी- बीती है। यदि मनुष्य उनसे कुश्ती लड़ने लगे, तो निश्चय ही वह शारीरिक ताकत में हार मानेगा। शारीरिक शक्ति प्रत्यक्ष में एक सीमा तक ही फायदेमंद सिद्ध हो सकती है, लेकिन मानवीय उर्वरा बुद्धि की ताकत अति व्यापक है। वह दूर तक भी प्रभाव डाल सकती है। शास्त्रकार कहते हैं- 
‘दीर्घ बुद्धिस्ततो बाहू याभ्या दूरहिनास्ति सः।’ अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति की भुजाएँ बड़ी लम्बी होती हैं, जिनकी ताकत से वह दूर तक वार कर सकता है। महर्षि व्यास ने भी कहा है- बुद्धि श्रेष्ठानि कर्माणि। अर्थात् मनुष्य की बुद्धि से विचारपूर्वक किये गये कार्य ही श्रेष्ठ होते हैं। 
बुद्धि मनुश्य के लिए दैवी विभूतियों में उच्चकोटि का वरदान है। इसके सहारे मनुष्य अपने जीवन को अधिक उन्नत, समादृत और प्रभावशाली बना सकता है। समाज और इस समुन्नत संसार में जो कुछ मनुष्य द्वारा किया हुआ अद्भुत काम मिलता है, वह उसकी बुद्धि की ही देन है। कहावत है- ‘बुद्धिमान का एक दिन मूर्ख के जीवनभर के बराबर होता है।’ तात्पर्य यह है कि समझदार आदमी अक्ल के ठीक उपयोग से वह काम कर डालता है, जो साधारण आदमी जिन्दगी भर नहीं कर पाते। अतः हमें आज से, अभी से ही अपनी बुद्धि का विकास करना शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि जैसे- जैसे बुद्धि बढ़ती जाती है, हानि- लाभ, अच्छाई- बुराई, उन्नति- अवनति का भेद- ज्ञान भी बढ़ता जाता है। 
बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हमारे अपने मन में नये ज्ञान को ग्रहण करने, नयी बात सीखने और अपनी बुद्धि को बढ़ाने की तीव्र और उत्कट लगन होनी चाहिए। सीखने के लिए मानव जाति का संचित अब तक का ज्ञान कुछ कम नहीं है। नाना क्षेत्रों में मानवीय बुद्धि अर्जित ज्ञान का अथाह भण्डार भरा पड़ा है। एक- एक विषय पर असंख्य पुस्तकें मौजूद हैं। ढेरों पत्र- पत्रिकाएँ प्रतिदिन छप रही हैं। इसके अतिरिक्त संसार की खुली पुस्तक- इस समाज से हर समय कुछ न कुछ सीखने को मिलता ही रहता है। दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाने की लालसा होनी चाहिए। 
दूसरी बात है, दूसरों को सिखाने की। स्वयं अर्जित या स्वाध्याय से एकत्रित ज्ञान को दूसरे को सिखाने से हमारी बुद्धि का विकास होता है। वस्तुतः दूसरों के माध्यम से ही जो कुछ सीखा हुआ है, वह परिष्कृत होता है। 
ज्ञान कहीं से, किसी से, किसी मूल्य पर मिले, लेना ही अच्छा है। सीखने के क्षेत्र में दूसरों के विचारों से या दृष्टिकोण से परहेज नहीं करना चाहिए। जिससे हम सिखें, वही गुरु है। ऐसे अनेक गुरु हो सकते हैं। अपने देश भारत के व्यक्ति ज्ञान- प्राप्ति में हमेशा उदार रहे हैं। हमारी परम्परा के अनुसार ज्ञान की प्राप्ति में हमने किसी से परहेज नहीं किया है। संसार भर के विचारों का हमने प्रयोग किया और जो उपयुक्त लगा, उसे स्वीकार करने में आनाकानी नहीं की। बुद्धि की साधना करने वालों के लिए अपनी ग्रहणशक्ति को एकांगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए। जो ऐसी भूल कर बैठेते हैं, उनकी बुद्धि भी एकांगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध विचारक बेकन ने ठीक ही कहा है- ‘ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है।’ 
सचमुच बुद्धि के साधक के लिए, सद्ज्ञान, विवेक और सरस्वती की उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुँचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब पढ़ाई- लिखाई समाप्त हो चुकी है और अब सीखने जैसी कोई बात नहीं रही है। ज्ञान समुद्र की भाँति अनन्त और अगाध है। उसकी कोई सीमा नहीं है। ज्ञान नित- नूतन विकासक्रम की गोद में पलता है। इसलिए बुद्धि विकास और उन्नति की कोई सीमा नहीं हो सकती। प्रत्येक पढ़े- लिखे आदमी के लिए नया सीखने को बहुत कुछ शेष रहता है, क्योंकि मानव ज्ञान भी बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ता ही जाता है। जितना मनुष्य इस दिशा में प्रयास करेगा, प्रज्ञावान बनता चला जाएगा। 
ज्ञानवर्द्धन की अनेक शाखाएँ- प्रशाखाएँ हैं, नये- नये क्षेत्र हैं, बुद्धि को बढ़ाने के लिए सब प्रणालियों में घुसकर देखें ।। किसी एक संस्था, विचार प्रणाली या सम्प्रदाय विशेष के संकुचित नियम या क्षेत्र में बँधकर न देखें ।। जहाँ- जहाँ भी सद्ज्ञान के नये स्रोत प्रकाश में आयें, अपनी बुद्धि को उसमें प्रवेश करना चाहिए। अध्यात्म, समाजशास्त्र, अर्थ, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान,राजनीति, विज्ञान, धर्म- संस्कृति आदि अनेक क्षेत्रों में अपनी गति बढ़ायें तो हमारी योग्यता विशाल और व्यापक बनेगी। 

(शांतिकुंज फीचर्स, हरिद्वार) 


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