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‘सदा विजयी’ आत्मविश्वास का ध्येय वाक्य है। आत्मविश्वास विजय के रथ पर आरूढ़ होता है। यह तमस् के सघन कुहासे में तेजस्वी सूर्य- सा चमकता है। यह हर विपरीत परिस्थितियों को चीरकर निकल जाता है। आत्मविश्वासी कभी हार नहीं मानता। सदैव अपने लक्ष्यपथ पर बढ़ता रहता है। वह अपने पुरुषार्थ पर अपेक्षा रखता है, औरों पर नहीं। वह केवल परमात्मा के विधान के सामने नतमस्तक होता है, कभी कमजोरियों पर नहीं। 
आत्मविश्वासी का चट्टानी विश्वास अपनी आत्मशक्ति पर होता है। उसकी समस्त आस्था इस महान सत्य पर घनीभूत होती है। शुद्घोऽसि, बुद्घोऽसि, निरंजनोऽसि के इस परम ऋषिमंत्र का वह ध्याता होता है। विचारों की लौ को सदा प्रदीप्त किए रहता है। 
आत्मविश्वास का विकास अपने ही विचारों और मान्यताओं के आधार पर होता है। हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही हम बन जाएँगे। कायरता या प्रखरता, राख या अंगारे का चयन हमें करना है। आत्मविश्वासी इन दोनों में से उच्चतम का वरण करता है और उस पथ पर बढ़ चलता है, जिसके पदचिह्न औरों के लिए पाथेय बनते हैं। वह प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल कर अपने चारों ओर स्वर्गीय एवं सुंदर वातावरण विनिर्मित कर लेता है, ठीक इसके विपरीत दुर्बल तनःस्थिति का व्यक्ति ख्याली पुलाव पकाता रहता है, कोरी कल्पनाओं के संजाल में फँसा पड़ा रहता है। उसमें दृढ़ निश्चय तो दूर, कार्य की उमंग ही नहीं होती है। आत्मविश्वासी की दृढ़ता कठिन- से कठिनतम कार्य को सरल एवं आसान बना लेती है। 
आत्मविश्वासी का व्यवहार भी आकर्षक एवं लुभावना होता है। आत्मविश्वास एक ऐसी संजीवनी है जो व्यक्तित्व के तीनों पहलुओं- चरित्र, चिंतन और व्यवहार को प्रभावित करता है। लक्ष्य के प्रति विश्वास की प्रगाढ़ता हमारी कल्पनाओं और विचार- तरंगों को उसी ओर उन्मुख कर देती है। आत्मविश्वासी लक्ष्य का चयन करता है और सर्वदा उसी का चिंतन करता रहता है, उसकी योजना के बारे में सोचता रहता है तथा उसे क्रियान्वित करने का हर संभव प्रयास- पुरुषार्थ करता है। यह प्रक्रिया इतनी गहरी होती है कि चरित्र के रूप में अचेतन की गहराई में जमे हुए संस्कार एवं प्रवृत्तियाँ उसी के अनुरूप चलना प्रारंभ कर देती हैं। 
आत्मविश्वासी विचारों और भावनाओं के बीच सामंजस्य रखने में कुशल होता है। विचारों के क्षेत्र में तर्क की बनावट- बुनावट बड़ी ही सघन होती है और वह स्वयं को ही औरों के समान चुभती- टीसती रहती है, जबकि कोरी भावुकता एक उद्दाम उफान के समान होती है, जो अपने प्रवाह में विचारों को तिनके की तरह बहा ले चलती है। एक तर्क का कँटीला रेगिस्तान है, तो दूसरा भावुकता का धँसता दलदल। दोनों ही अधूरे- अपूर्ण हैं। आत्मविश्वासी की दृष्टि दोनों को समान रूप से देखती है। उसका व्यवहार दोनों को समग्र रूप से व्यवहृत करता है। अतः वह कर्त्तव्य के क्षेत्र में अत्यंत दृढ़ होता है तो भावना के क्षेत्र में उतना ही शालीन एवं विनम्र। इस प्रकार इसमें दृढ़ता एवं कोमलता का अनोखा और अद्भुत संयोग होता है, जो संपूर्ण सफलता की कुंजी है। 
सफलता का यह सूत्र अपने मूल में बीज के समान छोटा होता है, परंतु इस बीज में विराट् वृक्ष की अनंत संभावनाएँ एवं शक्ति- सामर्थ्य छिपी रहती हैं। आत्मविश्वासी इस बीज को उपयोगी पोषण देकर विशालकाय छायादार वृक्ष के रूप में विकसित करता है, जिसकी छाँव तले न जाने कितने थके- हारे पथिकों को शीतलता मिलती है, आगे बढ़ने से पूर्व थोड़ा विश्राम मिलता है। इस प्रकार वह स्वयं में तृप्त होता है एवं औरों को भी तृप्ति प्रदान करता है। आत्मविश्वासी का अंतर सजल भावनाओं से छलकता रहता है और अपने इर्द- गिर्द प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रखता है। इस आंतरिक अनमोल शक्ति एवं सामर्थ्य को जान- परख लेने पर कोई भी सहज ही महानता के शिखरों पर पहुँच सकता है, कामयाबी की बुलंदियों को छू सकता है। 
आत्मविश्वास विकसित करने के कुछ दिव्य सूत्र हैं, जिनका अनुपालन- अनुसरण कर कोई भी आत्मविश्वास रूपी संपदा को उपलब्ध कर सकता है। 
१. दूसरों पर आश्रित रहने के बजाय स्वयं पर भरोसा करना चाहिए। 
२. संदेह, शंका एवं संशय से सदा दूर रहना चाहिए, क्योंकि इनसे आत्मविश्वास घटता है। 
३. स्वयं को हीन, दुर्बल एवं कमजोर तथा दूसरे को श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए। यह मनःस्थिति ईर्ष्या को जन्म देती है। 
४. सफलता मिलने पर अहंता तथा असफलता से निराशा नहीं आनी चाहिए। असफलता के मूल कारणों का पता लगाते समय यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। 
५. दुर्गुण,कुटेव, बुरी आदतों से सदैव सतर्क- सावधान एवं सजग रहना चाहिए। 
६. सदा शिष्ट, विनम्र एवं आदरयुक्त व्यवहार करना चाहिए। 
७. नित्यप्रति नियमपूर्वक निर्धारित समय में स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था बनानी चाहिए। 
इन सूत्रों में आत्मविश्वास बढ़ाने- विकसित करने की समस्त संभावनाएँ दबी- छिपी हुई हैं। इन्हें अपनाकर निर्विवाद रूप से हर कोई आत्मविश्वासरूपी अक्षय, अमूल्य विभूति से सराबोर हो सकता है। 

(शांतिकुंज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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