एक फ्रेम में मढ़ा हुआ एने फ्रैंक का वाक्य ‘प्रकृति बदलेगी और मनुष्य पुनः अच्छा बनेगा। बुरा दिन समाप्त हो जायेगा और संसार एक बार फिर देख सकेगा शान्ति, व्यवस्था और सुख’ आफिस की उस दिवार पर टंगा था, जहाँ पायर सैनिक अफसर की हैसियत से काम करते थे। 
पायर का जन्म बेल्जियम में हुआ था। रोम के डोमिसियम कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे बेल्जियम में प्रोफेसर हो गये थे। इसी बीच द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ और वे सेना में भर्ति हो गये। 
हम आये दिन महापुरुषों के सूक्त, वेदवाक्य और सुभाषित पढ़ते और सुनते रहते हैं, पर हमारे जीवन में उनकी प्रेरणाएँ और प्रभाव कहाँ उतर पाते हैं? जबकि पायर को इन शब्दों ने ही सोचने के लिए एक नई दिशा और जीवन का कार्यक्षेत्र चुनने की नयी सूझ दे दी। 
वे इन वाक्यों पर विचार करने लगे, क्या सचमुच युग बदल सकता है? युद्ध और आतंक की वर्तमान विभीषिकाएँ, मनुष्य का मनुष्य के प्रति द्वेष, दुर्भाव, स्वार्थपरता, अनुशासनहीनता, सामाजिक और पारिवारिक जीवन के कष्ट- कलह भी, क्या कहीं शान्ति, सदाचार, व्यवस्था और सुख में बदल सकते हैं? क्या कोई ऐसी सत्ता है, जो यह स्वयं कर दे? 
उन्होंने इतिहास के पृष्ठ पलट कर देखे, तो उन्हें एक ही बात सूझी, जिस तरह अपनी भूल, पाप और व्यक्तिगत दोषों के कारण मनुष्य पतित होता है और काल- चक्र को कलंकित करता है, उसी प्रकार यदि संसार के सब आदमी अच्छे बन जायें, तो संसार स्वर्गीय परिस्थिति में क्यों नहीं बदल सकता? 
बदला है, पर उसके लिए अनेक संत और समाज सुधारकों ने लोगमंगल के लिए त्याग और संघर्ष किये हैं। तब कहीं वह परिस्थितियाँ बन पाई हैं। अपने आप युग क्या, एक दिन की परिचर्या तक नहीं बदल सकती। 
फिर करे कौन? इस प्रश्र का सबसे अच्छा उत्तर यही था- हमारे पास जो भी शक्ति और योग्यता है, उसे इस प्रयोजन में जुटाने के लिए हमें तो लग पड़ना ही चाहिए, शेष की बात शेष जानें, यह विचार आते ही भरी आजीविका को ठोकर मारकर, बड़े सम्मान को हाथ जोड़कर पायर पादरी हो गये और सामाजिक जीवन को अच्छा व सुव्यवस्थित बनाने के कार्य में जुट गये। 
बीमारों की सेवा, जहाँ स्कूल न थे, वहाँ स्कूलों की स्थापना और रूस से आये हुए शरणार्थी की सेवा में उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ लुटा दिया। शरणार्थियों की समस्या उन दिनों बेल्जियम पर भार थी। १,५०,००० तो केवल बूढ़े, बीमार व बच्चे थे। २०,००० टी. बी. केमरीज, ३५,००० बच्चे और और ९,५७, ००० वृद्ध। उनके निवास, औषधि तथा शिक्षण के लिए दिन- रात काम करके उन्होंने यह दिखा दिया कि असहायों की सेवा और दलितों के उत्थान कार्य से बढ़कर और पुण्य नहीं। इससे मनुष्य को सच्ची शान्ति मिलती है। 
पायर पादरी थे, पर उनमें धार्मिक असहिष्णुता का किंचित मात्र भी भाव न था। वे मानवता के सेवक और संत थे। जिस कार्यालय में बैठकर वे काम करते थे, उसकी चार दीवालों में एक में महात्मा गाँधी, दूसरे में अल्बर्ट स्वीत्जर, तीसरे में फ्रायड जाक नैन्सेन और चौथे में जर्मनी के एने फ्रैंक के चित्र टंगे थे और उनसे सत्याग्रह, संघर्ष, समभाव और प्राणिमात्र के प्रति प्रेम की प्रेरणा ग्रहण करते थे। एक दिन वह था, जब उन्हें अपने लक्ष्य का चुनाव करना पड़ा था। तब उन्होंने यह अनुभव किया था कि कोई मूल्यांकन करे या न करे, शहीद, सुधारक और संत से बड़ा सम्मान और कुछ नहीं है; और जब वे उन पर निष्ठापूर्वक चल पड़े, तो उनका विश्वास सत्य में बदलता दिखाई दिया। 
एक बार वे अपने कमरे में बैठे थे, तब टेलीफोन की घंटी बजी। चोंगा उठाकर कान में लगाया, उधर से किसी ने बधाई भेजी थी कि ‘आपको यह जानकर हर्ष होगा कि आपको इस वर्ष का शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है।’ 
किन्तु पायर को इससे कोई ऐसी प्रसन्नता न थी कि उछलते फिरते। कर्त्तव्यनिष्ठ के लिए तो कर्त्तव्य ही सुख है। मान- अपमान, यश- अपयश की उसे चिन्ता ही क्या? अपनी सम्पत्ति वे पहले ही जनता जनार्दन की सेवा में सौंप चुके थे। नोबेल पुरस्कार में प्राप्त धनराशि उन्होंने शरणार्थियों के हित के लिए दान कर दी। 
आज वे स्थूल शरीर से नहीं हैं, तो भी अपने कर्तृत्व से सबके लिए प्रेरणा दे गये हैं कि मनुष्यो! यहाँ आने- जाने का खेल तो लगा ही रहता है, पर कुछ ऐसा करके जाना चाहिए, जो पीछे भी उससे प्रकाश फैलता रहे और लोगों को चलने के लिए राह दिखाए। वस्तुतः औरों के लिए जो जीता है, वही सार्थक जीवन है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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