मानवता के पीछे पागल हो जाने वाले और उसकी सेवा में अपने को बर्बाद कर देने वाले मानव- देवताओं को अभिनन्दन करना जिस दिन संसार भूल जायेगा, वह दिन संसार में सभ्यता के सूर्यास्त की सन्ध्या होगी और जब तक अभिनन्दन होता रहेगा, उनके पागलपन का अर्थ लगाया जाता रहेगा, मानव सभ्यता का सूर्य अपने तेज के साथ चमकता रहेगा। 
फ्राँस के डॉक्टर फिलिप पिनेल को अगर लोग पूरा नहीं तो आधा पागल तो समझते ही थे और उन्हें अयोग्य डॉक्टर की उपाधि दे रखी थी। इसका वास्तविक कारण यह नहीं था कि उनके दिमाग में कोई खराबी हो। बात दरअसल यह थी कि उन्हें पागलों के साथ बहुत अधिक सहानुभूति थी और वे चाहते थे कि इन मुग्ध मनुष्यों के साथ भी मनुष्य जैसा व्यवहार किया जाये। 
१७९१ में उस जमाने में पागलों के साथ न तो आज जैसा सद्व्यवहार किया जाता था और न कोई वैज्ञानिक उपचार। हर पागल को भारी- भारी जंजीरों में जकड़ दिया जाता था और जब तब उनका दिमाग ठीक करने के लिए हन्टरों से मारा जाता था। पागलों के उपचार की यह एक आम व्यवस्था थी। 
डॉ. फिलिप पिनेल निरपराध पागलों की यह यातना देखकर रो उठते थे और उनके लिए परमात्मा के नाम पर दया की भीख माँगने लगते थे। अच्छे- खासे डॉक्टर को ऐसा करते देखकर लोग उन्हें भी पागल या सनकी समझने लगे। उन्हें अपने इस दयाभाव के लिए न जाने कितनी बार अपमानित, तिरस्कृत और उपहासास्पद होना पड़ा। किन्तु उन्होंने अपनी पुकार बन्द नहीं की। जब वे अपना सारा काम- धन्धा छोड़कर पागलों के उद्धार का प्रयत्न करते रहे, तो लोगों ने सोचा कि सुन लो आखिर यह पागल डॉक्टर चाहता क्या है। 
निदान पागलों की रखवाली करने वाले अफसरों के पूछने पर उन्होंने कहा कि पागल भी आदमी हैं और इस नाते वे अत्याचार अथवा घृणा के नहीं, सहानुभूति के पात्र हैं। पागल होने में इनका अपराध क्या है, जो इनको इस बुरी तरह मारा जाता है? जिसको अपना होश ही नहीं, उसे दोषी ठहराना कहाँ की मानवता है? मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि इनके साथ सहानुभूति का व्यवहार किया जाये, तो निश्चय ही इनमें से बहुत से ठीक हो सकते हैं। 
बात सरकार तक पहुँची और उसने डॉ.फिलिप पिनेल को पागल समझकर पागलखाने का इस विचार से प्रबन्धक बना दिया कि पागलों की मार खाकर इसकी मानवता का भूत उतर जायेगा। 
पागलखाने में पहुँचकर वहाँ के अधिकारियों से अनुरोध कर डॉ. फिलिप पिनेल ने पागलों की हथकड़ियाँ, बेड़ियाँ खुलवा दीं और मारने की सख्त मुमानियत कर दी। उन्होंने उनके साथ सच्ची सहानुभूति क साथ सद्व्यवहार और मानसिक उपचार शुरू किया। यद्यपि उन्हें इसी सत्कार्य में काफी कष्ट उठाने पड़े, किन्तु वे अपने प्रयत्न में लगे ही रहे, जिसका फल यह हुआ कि सद्व्यवहार की शालीतना से बहुत से पागल पूर्वापेक्षा अधिक शान्त रहने लगे और अनेक साधारण पागल तो अच्छे भी हो गये। 
डॉ. फिलिप पिनेल की इस सफलता से बुद्धिमानों का विश्वास बढ़ता गया और पागलों के उपचार की मनोवैज्ञानिक विधि का श्रीगणेश हो गया। 
आज पागलखाने और पागलों के मानसिक उपचार का जो विकास दिखाई देता है और पागलों के प्रति जनमानस में जो सहज दया, क्षमा एवं सहानुभूति का भाव दिखाई देता है, इसका श्रेय उन्हीं डॉ. फिलिप पिनेल को है, जिन्होंने उनके उद्धार के लिए अपने को पागल बना डाला। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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