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सम्पूर्ण समर्पण 
श्री रामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वे समझा रहे थे कि जीवन में आये अवसरों को साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण लोग खो देते है। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्त्व नहीं समझ पाते। समझकर भी उसके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उसमें अपने आपको पूरी शक्ति से लगा नहीं पाते। शिष्यों की समझ में यह बात ठीक ढंग से न आ सकी। तब श्रीरामकृष्ण देव बोले, ‘नरेन्द्र! कल्पना कर कि तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा रखा है। तुझे यह पता है कि यह अमृत है। अब बता, उसमें एकदम कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करेगा?’ 
उत्तर मिला, ‘किनारे बैठकर स्पर्श करने का प्रयास करूँगा। बीच में कूद पड़ने से तो जीवन अस्तित्व के लिए खतरा हो सकता है।’ नरेन्द्र के इस उत्तर को साथियों ने भी सराहा। किन्तु परमहंस जी हँस पड़े। बोले- ‘मूर्ख, जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में कूदकर, उसमें स्नान करके, सरावोर होकर भी मृत्यु से भयभीत होता है।’ 
चाहे भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक, जब तक आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता, सफलता नहीं मिलती, यह रहस्य शिष्यों ने उस दिन समझा। 
ध्यान की बात 
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के समय दक्षिणेश्वर में श्री प्रताप हाजरा नाम के एक महाशय रहते थे। उन्होंने साधुओं जैसा जीवन अपना रखा था। वे कभी- कभी रामकृष्ण परमहंस के साथ कलकत्ता सत्संग का लाभ उठाया करते थे। 
एक बार वे स्वामी जी के साथ कलकत्ता जाकर जब लौटे, तो अपना अँगोछा वहीं एक भक्त के घर भूल आये। 
स्वामी रामकृष्ण को जब यह पता चला, तो उन्होंने हाजरा महाशय से कहा, ‘ऐसे भुलक्कड़ स्वभाव के कारण तो तुम कभी- कभी भगवान् को भी भूल जाते होंगे। जो नित्य प्रति सांसारिक व्यवहार में सतर्क नहीं रह सकता, वह आध्यात्मिक क्षेत्र में सावधानी बरत सकता है, इसमें संदेह है।’ 
हाजरा महाशय स्वामी जी के कथन का अभिप्राय समझ न सके और सफाई देकर बोले- ‘क्या बताऊँ महाराज, भगवान् के भजन में लीन रहने से मुझे कुछ याद नहीं रहता।’ 
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने हाजरा महाशय की झूठी आत्मश्लाघा समझ ली। वे दुखी होकर सोचने लगे, साधु का नाम धारण कर इतनी आत्मप्रशंसा! फिर प्रकट में बोले- ‘हाजरा, तू धन्य है, जो थोड़े से जप से ही इतना पहुँच गया कि सांसारिक विषयों की याद ही नहीं रहती। एक मैं ऐसा तुच्छ प्राणी हूँ जो दिन- रात भगवान् के चरणों में ध्यान दिये रहता हूँ, फिर भी आज तक न कभी अपना बटुआ कहीं भुला हूँ और न कोई अँगोछा।’ 
अब हाजरा महाशय को अपनी भूल का भान हुआ। वे स्वामी जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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