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योग अपने आप में एक अनोखा व शक्तिशाली विज्ञान है। यह आज के भौतिक विज्ञान से कई गुना अधिक प्रभावशाली तथा रहस्यमय है। आज के अणु- परमाणु की शक्तियों से कहीं ज्यादा शक्तियाँ इस विज्ञान में समायी हैं। आज से लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषि- मनीषि इस विज्ञान से, उसकी सम्यक् प्रयोग विधियों से परिचित थे। आज धर्मशास्त्र का जो विशाल ढाँचा देखने को मिलता है, वह इसी विज्ञान की व्याख्या- विवेचन मात्र है। वेद, उपनिषद् आदि तमाम आर्ष साहित्य इसी विज्ञान के विकास- विस्तार हैं। इस विज्ञान को साधने, उसकी शक्तियों को हस्तगत करने के लिए कठिन साधनाएँ करनी पड़ती हैं। इसकी एक- एक शक्ति को प्राप्त करने लिए वर्षों ही नहीं, कभी- कभी जन्मों तक लग जाते हैं। इसके लिए अग्रि परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं, तब जाकर इस महासागर के कुछ बूँद हाथ लगते हैं। 
इस विज्ञान को साधने के कई तरीके हैं, कई विधि और उपविधियाँ हैं। वे अति ही गूढ़ हैं। मुख्य रूप से ये दो भागों में विभक्त हैं- योग और तन्त्र के रूप में। यहाँ हम इन विधियों को, योग के प्रकारों को सरल रूप से समझने की कोशिश करते हैं जिससे साधना- मार्गों में बढ़ने वाले साधकों के लिए सुविधा होगी। 
हठयोग- अर्थात् प्राणायाम साधना के अन्तर्गत बन्ध, मुद्रादि कठिन क्रियायों को दृढ़ता के साथ अभ्यास में लाकर उनके माध्यम से आत्मसाक्षात्कार करने का प्रयास। 
राजयोग- यह वह मार्ग है, जिसमें चाल भले ही धीमी हो, पर बिना जोखिम के लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार कर उसे प्रखर बनाते हुए जीवन- लक्ष्य की ओर ले चलने वाली यम- नियमादि की साधना पद्धतियाँ इसी के अन्तर्गत आती हैं। 
जपयोग- अपने इष्ट के नाम या किसी मन्त्र की बार- बार आवृत्ति के द्वारा अभीष्ट की प्राप्ति कराने वाली एक विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया। 
लययोग- इष्ट में तल्लीनता साधकर अभीष्ट की प्राप्ति करने वाली प्रक्रिया। इस प्रक्रिया में संपूर्ण वृत्तियों को इष्ट में विलीन कर दिया जाता है। 
तन्त्रयोग- मन्त्र विशेष को विधि विशेष द्वारा सिद्ध कर अथवा किसी विशिष्ट वैज्ञानिक प्रक्रिया का निष्ठा व साहस के साथ अभ्यास करके वाञ्छित फल प्राप्त करने का विशेष प्रयास। यह आशु फलदायी होते हुए भी खतरों से भरा मार्ग होता है जिसमें चलने के लिए योग्य गुरु के प्रभावी मार्गदर्शन के साथ ही विशिष्ट स्तर का धैर्य व साहस की भी माँग करता है। 
भक्तियोग- यह द्वैत साधना पद्धति है। किसी को अपना इष्ट मानकर उनके प्रति मन, वचन तथा कर्म से श्रद्धा ज्ञापन करना, उनके प्रति समर्पित रहना इस पद्धति का मुख्य अंग है। 
ज्ञानयोग- अर्थात् तत्त्वचिन्तन, लक्ष्य का अन्वेषण, रहस्य की गहराई में प्रवेश। यह विधि पूर्णतया खोजी वृत्तियों पर निर्भर है। इसकी अन्तिम परिणति आत्मसाक्षात्कार है। 
कर्मयोग- ऐसा कुशलतापूर्ण नैष्ठिक कर्म जो निर्लिप्तता का भाव पैदा कर मन को भोग से योग की ओर मोड़ दे, कर्त्तापन से अकर्त्ता की, मोक्ष की भूमिका प्रस्तुत करे। 
स्वरयोग- यह प्राणायाम विज्ञान के अन्तर्गत होते हुए भी एक स्वतन्त्र वैज्ञानिक विधा है। इसमें श्वास- प्रश्वास पर ध्यान केन्द्रित करके उसकी अवधि विशेष में उदित होने वाले अपग्रि- वायव्यादि महाभूतों के सूक्ष्म तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है और उनके माध्यम से आत्मतत्त्व जानने का प्रयत्न किया जाता है। 
ऋजुयोग- अर्थात् मन, वचन एवं कर्म से सत्य का अनुसरण करना। अपने को इतना सहज- सरल बना लेना कि सहजता के शिखर उस परमात्मा से तार जुड़ जाए। यह निष्कपटता की, सहज जीवन की, सत्य से ओत- प्रोत होने की व्यावहारिक साधना है। गाँधीजी इसी मार्ग पर चलकर महात्मा बने। 
सहयोग- अर्थात् परमात्मा को सदा ही अपने साथ होने का भाव बनाए रखना। यह भाव कि ‘वे मेरे साथ हैं, मैं उनके साथ हूँ’, निरन्तर बनाए रखना इस विधि की विशेषता है। यह द्वैत को अद्वैत में रूपान्तरित करने वाली एक अति प्रभावशाली विधा है। 
कुण्डलिनी योग- मूलाधार चक्र निकटस्थ एक विशेष चैतन्य शक्ति जिसका नाम कुण्डलिनी है। यह शक्ति साधारणतया प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। इसे जागृत करने की विशेष साधना- विधि भी है, पर चक्र ध्यान, प्राणायाम साधना, मन्त्र साधना आदि विधियों द्वारा भी इसे जाग्रत् किया जा सकता है। 
बुद्धियोग- अर्थात् चिन्तन- मनन की प्रक्रिया को परिष्कृत- परिमार्जित करते हुए साधारण बुद्धि को असाधारण प्रज्ञा के रूप में परिवर्तित करने वाली विशेष विधा। 
समत्वयोग- ईश्वर को सर्वव्यापी मानकर दृष्टिकोण को उस स्तर पर विकसित करना, सबके साथ उस स्तर से व्यवहार- बर्ताव करना, सभी भूतों में ईश्वर को देखना। 
प्राणयोग- मनुष्य केवल वायु की साँस ही नहीं लेता, वह वायु के अन्दर प्रच्छन्न किसी और अलौकिक तत्त्व को भी ग्रहण करता है। यही ‘प्राण’ कहलाता है। प्राणयोग द्वारा रेस्पिरेशन के, श्वसन क्रिया के ऊपर सूक्ष्म नजर रखते हुए इसी विराट् प्राण तत्त्व का बोध प्राप्त किया जाता है। 
ध्यानयोग- ईश्वर या आत्मतत्त्व में गहन अनुशीलनात्मक दृष्टि जमाना। एकाग्रता को विकसित करते हुए उस स्तर तक ले जाना जहाँ ध्येय का साक्षात्कार हो सके। 
सांख्ययोग- गम्भीर अनुशीलन द्वारा प्रकृति की रहस्यात्मक प्रक्रियाओं को समझते हुए उसे अतिक्रमण करने वाली एक दार्शनिक विधा। इस विधा में व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता से शुरू होकर ज्ञान की प्रगाढ़ता में पदार्पण तथा ज्ञान का संज्ञान में, फिर प्रखर प्रज्ञा में रूपान्तरण होकर प्रकृति से परे पुरुष के साक्षात्कार करने का प्रयत्न किया जाता है। 
जड़योग- इसमें शवासन, शिथिलीकरण जैसे प्रारम्भिक उपक्रमों से शुरू होकर साधक क्रमशः विषयों के प्रति भी शिथिल, अर्थात् निस्पृह- निर्लिप्त रहने की चेष्टा करता है एवं अन्ततः उस निर्लेपावस्था की चरमता को प्राप्त कर लेता है। यह एक ऐसी जड़ता है, जो चेतना के रहस्यों को उजागर कर देती है। 
सूर्ययोग- इसमें प्रकाशकणों की शोध और उनका जीवन विकास, आत्मिक प्रगति में उपयोग कर लक्ष्य सिद्ध किया जाता है। द्वितीयतः सविता देवता की उपसना- आराधना करके उनकी कृपा से तेजस्- वर्चस् की प्राप्ति की जाती है। 
चन्द्रयोग- यह भी किरण विज्ञान के अन्तर्गत आता है। इस विद्या के सहारे सोमतत्त्व की खोज की जाती है। 
सहजयोग- ऐसी गतिविधियाँ, दिनचर्याएँ, चिन्तनाएँ, विचारणाएँ एवं प्रक्रियाएँ जिन्हें अपनाकर सामान्यता से असामान्यता की ओर, लघु से विराट् की ओर, अणु से विभू की ओर बढ़ा जाता है एवं अन्ततः स्वाभाविक रूप से स्रोत का स्पर्श प्राप्त हो जाता है। 
प्रणवयोग- यह ध्वनिविज्ञान से संबंधित है। जप- ध्यान की प्रक्रिया द्वारा भी इसे साधा जा सकता है। ‘ॐ’ को परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मानकर श्रद्धा- विश्वास के साथ उसकी उपासना से अभीष्ट लाभ प्राप्त किया जा सकता है। 
नित्ययोग- यह पद्धति विशेष को नियमितता के साथ आचरण में लाने की विधि है। नियमितता का अपना प्रभाव होता है। उस प्रभाव के कारण ही नित्याचरण की सामान्य विधि असामान्य परिणाम दायक योग बन जाती है। 
योग- विधियों की यह सरल व्याख्या है। इसकी प्रायोगिक स्वरूप को योग्य मार्गदर्शक से समझना चाहिए। फिर भी आत्मसाधना के जिज्ञासुओं के लिए यह भी समझ लेना जरूरी है। 

(शांतिकुंज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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