img


वास्तव में प्रत्येक मनुष्य के तीन पहलू होते हैं- कर्मात्मक, ज्ञानात्मक और भावात्मक। इसलिए एक ही व्यक्ति कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अनुसरण करता है। इन तीनों को अलग- अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं किया जा सकता। अर्जुन एक ही व्यक्ति थे। 
गीता के दूसरे अध्याय में उन्हें बताया गया है कि निष्काम कर्मयोगी स्थित प्रज्ञ होता है और स्थित प्रज्ञ की पहचान उन्हें कराई गई। बारहवें अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी में आत्मसमर्पण की भावना होती है और भक्ति के लक्षण उन्हें बताए गए। तेरहवे अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी को प्रकृति- पुरुष का ज्ञान होता है और उन्हें ज्ञान के लक्षण बताये गये। चौदहवे अध्याय में उन्हें यह बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी दैवी सम्पदा सम्पन्न होता है और आसुरी संपदा ग्रहण नहीं करता, इसलिए दैवी और आसुरी संपदा के गुण बताए गए। यद्यपि अलग- अलग अध्यायों में वर्णित होने के कारण अलग- अलग मार्गों और व्यक्तियों के लक्षण मालूम होते हैं, पर वास्तव में वे सब एक ही योगी के लक्षण हैं। निष्काम कर्मयोगी के लक्षण और अर्जुन को निष्काम कर्मयोगी बनने का उपदेश पूरी गीता में किया गया है। 
इस प्रकार गीता में सभी अध्यात्य एक ही निष्काम कर्मयोग की माला में मोतियों की तरह पिरोये हुए हैं और गीता का प्रतिपाद्य विषय योग है जैसा कि प्रत्येक अध्याय के अन्त में लिखा गया है। उस योग अर्थात् आत्मा का परमात्मा में मिलन का उपाय निष्काम कर्म है। बार- बार योगी बनने और युद्ध करने के लिए तो गीता में कहा गया है। सकाम कर्म और आसुरी निषिद्ध कर्म की भर्त्सना की गई है। 
वास्तव में गीता में एक ही योग है, एक ही मार्ग है, एक ही ज्ञान है, एक ही भक्ति है और विश्व को देखने का एक ही दृष्टिकोण है। निष्काम कर्मयोगी का वही मार्ग, वही ज्ञान, वही भक्ति और वही दृष्टिकोण होता है। उसी मार्ग का अनुसरण करने के लिए मानव मात्र का आवाहन किया गया है। वह मार्ग सबके लिए खुला है। कोई पापी या दुराचारी ही क्यों न हो, इस मार्ग का अनुसरण करके वह पवित्रात्मा हो जाता है। 
गीता एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जिसमें प्रत्येक मानव को स्वतन्त्रता और समानता का अधिकार है। मनुष्य- मनुष्य के बीच, धर्म, जाति, वर्ण लिंग और धन की दीवारें नहीं हैं। प्रत्येक मानव अपने स्वभाव के अनुसार अनासक्त और निष्काम होकर मानव जाति की सेवा में लगा रहना अपना कर्त्तव्य समझता है तथा अकर्मण्यता, आलस्य और असुरता को त्याज्य मानता है। उसकी अपनी कामनाएँ और आवश्यकताएँ नहीं हैं। समाज की प्रगति और सम्पन्नता ही उसकी प्रगति और सम्पन्नता है। इस प्रकार के समाज का निर्माण करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डालना और उन्हें अपनाने के लिए जन साधारण को प्रेरित- प्रोत्साहित करना गीता का उद्देश्य है। इसी को गीता प्रतिपाद्य अनासक्त योग कहा जाता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....