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कोई भी किसान खेत में बीज डालने से पूर्व पहले उसे पानी से भरकर उसकी अच्छी तरह जुताई करता है, कूड़ा- कचरा निकालता है, खाद डालता है, तब भूमि इस योग्य हो पाती हे कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनाएँ सुनिश्चित होती हैं। उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है, उसके फलने- फूलने की आशा तभी की जा सकती है, जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाए, जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है। मनोभूमि को शुद्ध किए बिना डाला गया उपासना का बीज झाड़- झंखाड़, बाढ़ में पड़े बीज की तरह होगा, जो या तो स्वयं सड़- गलकर नष्ट हो जाता है या जिसे चिड़िया, चूहे और जंगली जीव चुनकर ले जाते हैं। 
जितना महत्त्व उपासना का है, उतना ही साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं, साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना- पूजा तो निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घंटे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है? जहाँ भूल दिखाई दी, तुरंत उसे सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरंत उससे लड़ पड़े, यही साधना है। जिस प्रकार समीक्षात्मक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है, यही तत्परता साधना है। 
यह सोचना ठीक नहीं है कि भजन करने मात्र से पाप कट जाएँगे और ईश्वर प्रसन्न हो जाएगा, अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अथवा कुमार्गकामता से बचाने की आवश्यकता नहीं। इस भ्रमपूर्ण मान्यता ने अध्यात्म के लाभों से हमें वंचित रखा है। यह भ्रम दूर हटाना चाहिए और भारतीय अध्यात्म का तत्त्वज्ञान एवं ऋषि अनुभवों के आधार पर यही निष्कर्ष अपनाना चाहिए कि उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं। दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है, उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म के मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है। 
गायत्री उपासक का जीवन क्रम उत्कृष्ट आदर्शवादी एवं परिष्कृत होना ही चाहिए। नशा पीने पर मस्ती आनी ही चाहिए। भक्ति का प्रभाव सज्जनता और प्रगतिशीलता के रूप में दिखना ही चाहिए। इसलिए हमारा उपासना क्रम सांगोपांग होना चाहिए और उसमें आत्मनिरीक्षण एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए। उपासना और साधना का स्वतंत्र अस्तित्व है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जाएगी, यह सोचना उचित नहीं। 
गायत्री की भावनात्मक पूजा की तरह ही सदाचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है। हम निष्पाप बनें, इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनाएँ और उसके द्वारा अपने और समाज का कल्याण करकें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ते है और पूर्णता प्राप्त करने में सफल होते हैं। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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