मनुष्य में इच्छा, आकांक्षा और उन्नति करने की भावना होनी ही चाहिए। जो व्यक्ति संकट के भय से प्रगति करने का साहस नहीं करते, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इस जड़ता से वे सर्वथा बच जाएँगे? किसी महत्त्वपूर्ण कार्य में हाथ डालने पर तत्सम्बंधी कठिनाइयाँ और प्रतिकूलताएँ निश्चित ही आएँगी, क्योंकि संसार का कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य संकट और विघ्न से रहित नहीं होता। 
संसार का सारा विकास, सारी उन्नति, जिसे देखकर आज हम खुश हो रहे हैं और जिसका लाभ उठाकर अधिकाधिक आनंद अनुभव कर रहे हैं, सब उन्हीं पुरुषार्थियों की कृपा और उनके साहस का फल है, जिन्होंने संकट की सम्भावना का भय ताक में रखकर अपना जीवन महान और उपयोगी कामों को समर्पित कर दिया। प्रगति की ओर बढ़ना केवल अपना व्यक्तिगत नियम नहीं है, उसका सम्बन्ध संसार और समाज के विकास से भी है। जो अप्रगतिशील है वह परोक्ष रूप से समाज का विरोधी है। 
वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और समाज- सुधारकों को ले लीजिये। इन तीनों वर्गों के संसार- सेवियों ने संसार के विकास और उसकी प्रगति में सदा से सराहनीय योगदान किया है। इन क्षेत्रों में साधारण संकटों के साथ प्राणों का संकट तक बना रहता है। तब भी संसार का उपकार करने वाले वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और सुधारकों की कभी कमी नहीं रही है। बड़े- बड़े भयंकर संकट उठाकर इन लोगों ने संसार की सेवा की है। यदि यह लोग संकटों की संभावना से भयभीत होकर अपना कर्त्तव्य न करते तो क्या यह संसार आज जैसा उन्नत और विकसित दिखलाई देता। अपनी और समाज की प्रगति के लिए पुरुषार्थ करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य है। संकटों से डरकर अगति में पड़ा रहना अशोभनीय वृत्ति है। 
यह संसार सम्पत्ति- विपत्ति और सुख- दुःख के दो सूत्रों से निर्मित हुआ है। जिसने इस संसार में जन्म लिया है, वह केवल अनुकूलता की ही अपेक्षा नहीं कर सकता; उसे प्रतिकूलता का भी अपना भाग ग्रहण करना होगा। इस प्रतिबन्ध के रहते हुए इस बात में कोई बुद्धिमानी नजर नहीं आती कि संकट के भय से प्रगति के पथ पर न बढ़ा जाए। 
अपना वास्तविक जीवन लक्ष्य पाने के लिए मनुष्य को सामान्य जीवन से ही प्रगति का उद्योग प्रारम्भ कर देना चाहिए। जो स्थूल उन्नति के क्षेत्र में पुरुषार्थ और पराक्रम नहीं दिखला सकता, वह अध्यात्म के सूक्ष्म क्षेत्र में तो और कुछ भी नहीं कर सकता है। दुःख उठाकर ही सुख और संकट उठाकर ही सफलता मिलती है। इसी में उसका महत्त्व भी है। जो सफलता जितना अधिक संघर्ष और संकट सहन करने के बाद मिलती है, उसका आनन्द उतना ही अधिक, यथार्थ और स्थायी होता है। यह बात इस छोटे- से उदाहरण से इस प्रकार समझी जा सकती है। 
एक सम्पन्न व्यक्ति के सामने खाने- पीने की विविध वस्तुएँ बिना कुछ किए आती रहती हैं, लेकिन उसमें उसे उतना आनन्द कभी नहीं मिलता, जितना आनन्द एक श्रमजीवी को दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद मिली सूखी रोटी में मिलता है। इसी प्रकार जो दिनभर आराम ही करता रहता है, उस व्यक्ति को आराम अथवा नींद का वह स्वर्गिक सुख नहीं मिलता, जो दिन में दस घण्टे मेहनत करता और थकान से चूर होकर सोता है। आनन्द की पूरी और सच्ची अनुभूति उसी उपलब्धि में होती है जो कठिनाइयों और कष्टों के बीच से अर्जित की गई है। ऐसी उपलब्धि में ही संतोष भी होता है और आत्म- गौरव भी। 
सफलता एक उपलब्धि है और उससे आनन्द भी होता है। आनन्द वास्तव में उस कष्ट का मूल्य होता है जो पुरुषार्थी हँसता- खेलता उठाया करता है। पुरुषार्थ नाम सिद्धि का नहीं, बल्कि उसके मार्ग में आने वाले संकटों की सहनशीलता का है। सफलताएँ यदि आसानी से मिलने लगें तो क्या अन्तर रह जाए एक सामान्य पुरुष और महापुरुष में। 
दुर्लभता तथा दुःसाध्यता के कारण ही सफलता में एक अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त होता है। सोना स्पृहणीय क्यों है? इसीलिये कि वह कठिनता से मिलता है और दुर्लभ होता है। यदि वह भी अन्य खनिज पदार्थों की तरह आसानी से प्रचुर मात्रा में सबको मिलने लगे तो उसका क्या मूल्य- महत्त्व रह जाए? अतः मनुष्य को कष्ट और संकटों की सम्भावना से निरपेक्ष रहकर जीवन में उन्नति और विकास में सफल होने का प्रयत्न करना ही चाहिए। 
सच्चे पुरुषार्थी सत्पथ पर आने वाली विपत्तियों को अपने धैर्य, सहिष्णुता और पुरुषार्थ की परीक्षा से अधिक कुछ नहीं मानते। वे तो हँस- हँसकर उनका स्वागत करते हैं, खेल- खेल की तरह सहन करते और विश्वासपूर्वक उन पर विजय प्राप्त करके श्रेय के अधिकारी बनते हैं। संकट और आपत्तियों का अस्तित्व जितना बाहर नहीं होता, उससे अधिक कहीं कायर मनुष्य के हृदय में होता है। 
कठिनाइयाँ और संकट ही मनुष्य जीवन को सक्रिय तथा सरस बनाए रखने में सहायक होते हैं। एकरस सुख मृत्यु की तरह जड़ और शीतल होता है। उसमें रुचि तथा आनन्द की ऊष्मा का संचार संकटों तथा कठिनाइयों का यही होता है। अस्तु, संकट की भावना को त्यागकर अपनी- अपनी स्थिति- परिस्थितियों के अनुसार सबको प्रगति तथा उन्नति का प्रयत्न करना चाहिए। 

(शांतिकुंज फीचर्स,गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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