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आइए, मिल- जुलकर जीना प्रकृति से सीखें 
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य )) 

वनों में कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, जो अपनी सीमा में छोटे- छोटे पौधों को पनपने नहीं देते हैं। सारे जंगल में दो- चार ऐसे हिंसक जन्तु भी होते हैं, जो छोटे- छोटे जीव- जन्तुओं को खा डालते हैं। अफ्रीका के कुछ पौधे ऐसे धोखेबाज होते हैं कि उनमें कोई चिड़िया आश्रय के लिए आई और उन्होंने अपने नुकीले पत्तों से उसे जकड़कर खून पी लिया। समुद्र में एक- दो मछलियाँ, एक- दो जन्तु जैसे मगर और घड़ियाल ऐसे भी होते हैं, जो किसी का पनपना देख नहीं सकते। अपने से कम शक्ति का जो भी दाँव में आ गया, उसी को चट कर लिया। 
विविधा- विपुला प्रकृति में ऐसे दुष्ट प्रकृति के जीव- जन्तु हैं तो, पर उनकी संख्या, उनका औसत थोड़ा है; पर मनुष्य जाति के दृष्टि- दोष को क्या कहा जाय, जिसने इन दो चार उदाहरणों को लेकर ‘उपयोगितावाद’ जैसा मूर्खतापूर्ण सिद्धांत ही तैयार कर दिया। ढूँढ़े तो अधिकांश संसार ‘आओ हम सब मिलकर जियें’ के सिद्धांत पर फल- फूल रहा है। यदि छोटों को मारकर खा जाने वाली बात ही सत्य रही होती, तो कुछ ही शताब्दियों में विश्व की आबादी दो गुनी से भी अधिक न हो गई होती। 
प्रस्तुत प्रसंग यह बताता है कि संसार के बुद्धिमान न समझे जाने वाले जीव- जन्तु भी परस्पर मिलकर रहना कल्याणकारक मानते हैं। जंगल की नदियों में रोडियश नामक एक मछली पाई जाती है, एक साथ ही ‘सीप’ नामक जीव भी पाया जाता है। सीप के शरीर को कछुये की सी तरह का मोटा और कड़ा आवरण धेरकर रखता है, जिससे वह अपने अण्डों की सेवा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में रोडियश मछली और सीप दोनों मिलते हैं और ‘आओ हम- आप दोनों मिलकर जियें’ के अनुसार समझौता कर लेते हैं। 
रोडियश अपने अण्डे सीप के खोल में प्रविष्ट कर देती है, इसी समय सीप अण्डे देती है, वह रोडियश अपने शरीर से चिपका लेती है। रोडियश घूम- घूमकर अपने लिए भोजन इकट्ठा करती है, उसी के दाने- चारे पर सीप के बच्चे पल जाते हैं, जबकि उसके अपने बच्चों को सीप पाल देती है। विभिन्न जातियों में सहयोग और संगठन की आचार संहिता से लगता है, भारतीय समाज शास्त्रियों ने प्रकृति की इस मूक भाषा को पढ़कर ही तैयार किया था। आज भी उसका मूल्य और महत्त्व सामाजिक जीवन में उतना ही है। इस सिद्धांत के आधार पर ही संसार सुखी रह सकता है। शोषण, छल, कपट, बेईमानी, अनीति और मिलावट पर नहीं, वह यदि दूसरे के साथ यह दुष्टता करेगा तो शेष वातावरण उसके लिए भी वैसा ही तैयार मिलेगा। 
यह उदाहरण कोई अपवाद नहीं। ‘एल्गी’ जाति के ‘प्रोटोंकोकस’ पोधे और फंगस जाति के एक्टीनो माइसिटीज’’ पौधे भी आपस में मिलकर एक दूसरे को बहुत सुन्दर ढंग से पोषण की वस्तुएँ प्रदान करते है। हमे शिक्षा ज्ञान देता है पर हम अपनी अनपढ़ धर्मपत्नी या अशिक्षित पड़ौसी के लिये एक घण्टा भी नहीं निकाल सकते,हमारे माता- पिता हम जब बच्चे थे,तब आधे पेट गीले वस्त्रों में सोकर हमारी परवरिश करते थे,पर आज जब वे वृद्ध हो गये, तब हम उनकी क्या उतनी सेवा कर पाते हैं? दुकानदार, रेल वाला, बस वाला, सारा संसार यों कहिये अपनी सेवाएँ हमें देने को तत्पर है, तब यदि हम दूसरों को धोखा देने की बात सोचें कृतघ्नता दिखायें तो ऐसे व्यक्ति से नीच और घृणित कौन होगा? 
पौधों का क्या अस्तित्त्व, पर वे मनुष्य जाति से अच्छे हैं। ऊपर के दोनों पौधे मिलकर एक चपटे आकार का ढाँचा बना लेते हैं, उसे ‘जूलॉजी’ में ‘लाइकन’ कहते हैं। इसमें से होकर एल्गी की जड़ें फंगस के पास पहुँचती है और फंगस की एल्गी के पास। एल्गी के पास जिस तत्त्व की कमी होती है, उसे फंगस पूरा कर देता है और फंगस की कमी को एल्गी- दोनों के आदान- प्रदान में यह थैला भी विकसित होता रहता है। औरों के कल्याण में अपना कल्याण, सबकी भलाई में अपनी भलाई अनुभव करने वाले समाज इसी तरह विकास और वृद्धि करते हैं और अपने साथ उन छोटे- छोटे दीन- हीन व्यक्तियों को भी पार कर ले जाते हैं, जो सहयोग के अभाव में दबे पड़े पिसते रहते हैं। 
स्कारपियन नामक एक मछली अपने शरीर के ऊपर छोटे- छोटे हाइड्रा जाति के जीवों को फलने- फूलने देती है, वे छोटे- छोटे जन्तु हजारों की संख्या में एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरी सतह में फैले रहते हैं। देखने में यह हरे रंग के होते हैं। मछली के शरीर के ऊपर इनका पूरी तरह पोषण होता रहता है। 

जब एक अविकसित मछली दूसरे दीन- दुर्बलों की सहायता में इतना योगदान दे सकती है, तो हम समाज के दलिल माने- जाने वाले वर्गों हरिजनों, आदिवासियों, दहेज के अभाव में पीड़ित बहनों, दवा के अभाव में पिसते रोगियों के लिए जो अपने ही समाज के अंग है, कल्याण की योजनाएँ क्यों नहीं बना सकते। जीव- जीव, पेड़- पौधों तक में जब एक दूसरे के प्रति सेवा और सहयोग का भाव पनप रहा हो, तब मनुष्य जाति उससे पीछे हटे, यह उसका दुर्भाग्य ही कहना चाहिये। 
परोपकारिता घाटे का सौदा नहीं, व्यक्ति का महान् स्वार्थ है। जब हम दूसरे की सेवा करते हैं, तब सही मानों में अपनी ही सेवा करते हैं। मछली इन हरे जीवों को पालते समय कोई मूल्य नहीं माँगती। वह पूर्ण निष्काम होती है, पर उसे क्या पता कि यह किड़े अस्वादिष्ट होते हैं और अपने शरीर से एक ऐसी दुर्गन्ध निकालते हैं, जिनके कारण हिंसक मछलियाँ और जन्तु उनसे दूर ही भागते हैं, इससे वह मछली जो इन्हें पालती है, स्वयं भी शिकार होने से बच जाती है। 
ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी निष्काम सेवा और परस्पर मिल- जुलकर रहने के इस तत्त्व- ज्ञान को समझ पाता तो वह इसी पृथ्वी पर स्वर्गीय सुखों की अनुभूति कर रहा होता, इसमें राई- रत्ती भी संदेह नहीं है। 

(शांतिकुंज फीचर्स,गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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