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यह उपनिषद् सामवेदीय परम्परा से सम्बद्ध है। अतिलघुकाय इस उपनिषद् में सविता- सावित्री के विविध रूपों की परिकल्पना करके उनमें एकत्व प्रतिपादित किया गया है। 
सर्वप्रथम सविता- सावित्री के युग्म एवं उनका कार्य- कारणत्व का प्रतिपादन है। तदुपरान्त सावित्री के तीन पादों, सावित्री (विद्या) के ज्ञान का प्रतिफल तथा उससे मृत्यु पर विजय, बला- अतिबला मन्त्रों का निरूपण और अन्त में उपनिषद् विद्या की महिमा बताते हुए उपनिषद् को पूर्णता प्रदान की गई है। 
॥ शान्तिपाठः॥ 
ॐ आप्यायन्तु .................. इति शान्तिः॥ (द्रष्टव्य- महोपनिषद्) 
कः सविता का सावित्री अग्रिरेव सविता पृथिवी सावित्री स यत्राग्रिस्तत्पृथिवी यत्र वै पृथिवी तत्राग्रिस्ते द्वे योनिः तदेकं मिथुनम्॥ १॥ कः सविता का सावित्री वरुण एव सविताऽऽपः सावित्री स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वा आपस्तद्वरुणस्ते द्वे योनिः तदेकं मिथुनम्॥ २॥ कः सविता का सावित्री वायुरेव सविताकाशः सावित्री स यत्र वायुस्तदाकाशो यत्र वा आकाशस्तद्वायुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ३॥ कः सविता का सावित्री यज्ञ एव सविता छन्दांसि सावित्री स यत्र यज्ञस्तत्र छन्दांसि यत्र वा छन्दांसि स यज्ञस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ४॥ कः सविता का सावित्री स्तनयित्नुरेव सविता विद्युत्सावित्री स यत्र स्तनयित्नुस्तद्विद्युत् यत्र वा विद्युत्तत्र स्तनयित्नुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ५॥ कः सविता का सावित्री आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री स यत्रादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वा द्यौस्तदादित्यस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ६॥ कः सविता का सावित्री चन्द्र एव सविता नक्षत्राणि सावित्री स यत्र चन्द्रस्तन्नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि स चन्द्रमास्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ७॥ कः सविता का सावित्री मन एव सविता वाक् सावित्री स यत्र वा मनस्तद्वाक् यत्र वा वाक् तन्मनस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥८॥ कः सविता का सावित्री पुरुष एव सविता स्त्री सावित्री स यत्र पुरुषस्तत्स्त्री यत्र वा स्त्री स पुरुषस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम्॥ ९॥ 
सविता कौन है तथा सावित्री कौन है? अग्रि ही सविता है, पृथिवी ही सावित्री है। वे अग्रिदेव जहाँ पर स्थित हैं, वहीं पर पृथिवी भी प्रतिष्ठित है। जहाँ पृथिवी है, वहीं अग्रिदेव हैं। वे दोनों योनि अर्थात् विश्व को उत्पन्न करने वाले हैं। उन दोनों का एक ही युग्म है। सविता कौन है और सावित्री कौन है? वरुणदेव ही सविता हैं, आपः (जल) ही सावित्री है। जहाँ पर वरुणदेव हैं, वहाँ पर ही आपः देवता हैं और जहाँ आपः (जलदेवता) हैं, वहाँ ही वरुण हैं। वे दोनों एक ही युग्म हैं। सविता कौन है तथा सावित्री कौन है? वायु देवता सविता है और आकाश ही सावित्री है। जहाँ वायु है, वहीं पर आकाश है, जहाँ आकाश है, वहाँ पर ही वायु है। वे दोनों योनि स्वरूप हैं, उन दोनों का एक ही युग्म है। सविता कौन है और सावित्री कौन है? यज्ञदेव सविता हैं और छन्द ही सावित्री हैं। जहाँ पर यज्ञ देवता हैं, वहीं पर छन्द है और जहाँ छन्द है वहीं पर यज्ञदेव हैं। वे दोनों योनिस्वरूप हैं, उन दोनों का एक ही युग्म है। सविता किन्हें कहते हैं और सावित्री किन्हें कहते हैं? गर्जन करने वाले मेघ को सविता कहते हैं और विद्युत् को ही सावित्री कहते हैं। जहाँ गर्जन करने वाले मेघ हैं, वहीं पर ही विद्युत् है और जहाँ विद्युत् है, वहीं गर्जन करने वाले मेघ स्थित रहते हैं। वे दोनों योनिस्वरूप हैं, उन दोनों का एक युग्म है। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे कहते हैं? आदित्य सविता और द्युलोक ही सावित्री हैं। जहाँ पर आदित्य हैं, वहाँ ही द्युलोक और जहाँ द्युलोक है, वहीं पर आदित्य स्थित हैं। वे दोनों योनि स्वरूप हैं, उन दोनों का एक ही युग्म है। सविता कौन है और सावित्री कौन है? चन्द्रमा ही सविता और नक्षत्र सावित्री हैं। जहाँ पर चन्द्रमा देवता हैं, वहीं नक्षत्र हैं और जहाँ पर नक्षत्र हैं, वहाँ पर ही चन्द्रमा देवता हैं। वे दोनों योनिस्वरूप हैं, वे दोनों एक युग्म हैं। सविता कौन है और सावित्री कौन है? मन ही सविता और वागिन्द्रिय सावित्री है। जहाँ पर मन है, वहीं पर वाक्शक्ति है और जहाँ वाक्शक्ति है, वहीं पर मन है। वे दोनों योनिस्वरूप हैं,उन दोनों का एक युग्म है। सविता कौन है और सावित्री कौन है? पुरुष ही सविता और स्त्री को ही सावित्री कहा गया है। जहाँ पर पुरुष है, वहीं पर स्त्री और जहाँ पर स्त्री है, वहाँ पर ही पुरुष है। वे दोनों एक योनि हैं और उनका एक ही युग्म है॥ ९॥ 
तस्या एव प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमित्यग्रिर्वै वरेण्यमापो वरेण्यं चन्द्रमा वरेण्यम्॥१०॥ तस्या एव द्वितीयः पादो भर्गमयोऽपो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीत्यग्रिर्वै भर्ग आदित्यो वै भर्गश्चन्द्रमा वै भर्गः॥ ११॥ तस्या एष तृतीयः पादः स्वर्धियो यो नः प्रचोदयादिति। स्त्री चैव पुरुषश्च प्रजनयतः॥ १२॥ यो वा एतां सावित्रीमेवं वेद स पुनर्मृत्युं जयति॥ १३॥ 
उस सावित्री महाशक्ति का प्रथम पाद ‘भू्ः -तत्सवितुर्वरेण्यं’ है। अग्रि वरण करने योग्य है। आपः (जल) वरणीय है। चन्द्रमा भी वरण करने योग्य है। उस सावित्री महाशक्ति का द्वितीय पाद प्रकाशस्वरूप आपः (जल) ‘भुवः- भर्गो देवस्य धीमहि’ है। अग्रि ही वह भर्ग (तेजः स्वरूप है),आदित्य ही भर्ग (प्रकाशस्वरूप) है। उस सावित्री महाशक्ति का यह तृतीय पाद ‘स्वः- धियो यो नः प्रचोदयात्’ है। इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष दोनों प्रजोत्पादन (गृहस्थ- धर्म का पालन) करते हुए जानते हैं, वे पुनः मृत्यु को नहीं प्राप्त करते अर्थात् वे मृत्यु को अपने वश में कर लेते हैं तथा उन्हें अमृतत्व की प्राप्ति हो जाती है॥ १०- १३॥ 
बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः। गायत्री छन्दः। गायत्री देवता। अकारोकारमकारा बीजाद्याः। क्षुधादिनिरसने विनियोगः। क्लीमित्यादिषडङ्गन्यासः। ध्यानम्। अमृतकरतलार्द्रौ सर्वसंजी- वनाढ्यावघहरणसुदक्षौ वेदसारे मयूखे। प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ। ॐ ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितु- र्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुद्भ्रमोपनाशिनि धीमहि धियो यो नो जाते प्रचुर्यः या प्रचोदयादात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहा॥ १४॥ एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां जयतीत्युपनिषत्॥ १५॥ 
बला और अतिबला नामक दोनों विद्याओं के ऋषि विराट् पुरुष हैं। छन्द गायत्री है। देवता भी गायत्री ही है। अकार बीज, उकार शक्ति और मकार कीलक है। क्षुधा आदि की निवृत्ति के निमित्त इसका विनियोग किया जाता है। क्लीं बीज मंत्र के द्वारा इनका षडङ्गन्यास करे। (षडङ्गन्यास की प्रक्रिया इस प्रकार है- ‘ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट्) अब इसके पश्चात् ध्यान का उल्लेख करते हैं- जिनके हाथ अमृत के द्वारा आर्द्रित (गीले) हो रहे हैं। सभी तरह की सञ्जीवनी शक्तियों से जो ओत- प्रोत हैं, पापों को विनष्ट करने में जो पूर्णरूपेण सक्षम हैं और जो वेदों के सारस्वरूप रश्मिमयात्मक, ॐकाररूप विकार से युक्त तथा भगवान् सूर्यनारायण के समान दीप्तिमय शरीर वाले हैं। उन बला और अतिबला विद्याओं के अधिष्ठातास्वरूप देवों की मैं सदैव अनुभूति करता हूँ। (बला- अतिबला विद्याओं के अधिष्ठाता देव का मन्त्र ऊपर संस्कृत में अंकित है, जिसका संकेत निम्रवत् है- )) ‘ॐ ह्रीं बले महादेवि .............. हुं फट् स्वाहा’॥ १४॥ 
इस प्रकार से इस सावित्री महाविद्या को समझने वाला मनुष्य पूर्णरूपेण कृतकृत्य हो जाता है। वह सावित्री देवी के लोक को प्राप्त कर लेता है। ऐसी ही यह (रहस्यमयी) उपनिषद् है॥ १५॥ 
ॐ आप्यायन्तु ........ इति शान्तिः॥ 
॥ इति सावित्र्युपनिषत्समाप्ता॥ 


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