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समाज निर्माण की बात सोचने वालों को यह तथ्य भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि समाज की स्वतंत्र सत्ता कुछ नहीं है, वह परिवारों का समुच्चय मात्र है। परिवार जैसे हों, उनका मिला- जुला स्वरूप ही समाज का भला- बुरा स्तर बनकर सामने आ खड़ा होगा। सरकारी कर्मचारी और प्रजाजन दोनों ही परिवारों की फैक्टरियों में ढलते हैं। शिल्पी, व्यवसायी, श्रमिक, कलाकार, बुद्धिजीवी के अग्रणी समझे जाने वाले लोग भी अपनी कुशलता पर पारिवारिक दृष्टिकोण की छाप लादे रहते हैं। 
समाज निर्माण की बात दार्शनिक दृष्टि से किसी भी रूप से कही जा सकती है और उसकी व्याख्या, विवेचना, योजना प्रस्तुत करते हुए प्रतिपादन तो कुछ भी हो सकता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ करना ही हो, तो परिवारों की अकाइयों को सुधारने का काम हाथ में लेना होगा। पकी हुई ईंटों का समुच्चय ही सुदृढ़ इमारत के रूप में खड़ा हो सकता है। नदियों का सम्मिलित केन्द्र समुद्र कहलाता है और परिवारों का समुच्चय समाज। समाज निर्माण का स्वर- संगीत, वस्तुतः परिवार के स्वर- सप्तकों की झंकार से ही निनादित होता है। 
परिवार निर्माण ‘हृदय’ एवं उसका क्षेत्र- विस्तार ‘धड़’ है। व्यक्ति उसका ‘सिर’ और समाज हाथ- पैर का ‘ढाँचा- ढकोसला’ है। यदि विश्व- मानव की स्थिति सुधारनी है, तो रुग्ण हृदय की चिकित्सा करनी होगी, अन्यथा धड़कन, रक्तचाप, शोथ से लेकर गतिरोध होने पर मरण संकट की आशंका बनी ही रहेगी। व्यक्ति निर्माण के लिए धर्मतन्त्र को और समाज निर्माण के लिए शासन- तन्त्र को प्रखरता अपनानी होगी। वे दोनों पहले से भी साधन सम्पन्न हैं, आवश्यकता केवल इतनी ही है कि उन्हें सुनियोजित कर दिया जाय। बड़ा काम परिवार निर्माण का है, जो नये सिरे से सँजोना पड़ेगा। इस दिशा में योजनाबद्ध कार्य महिला जाग्रति अभियान के अन्तर्गत ही हो सकता है। नये युग के निर्माण का यह पक्ष इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसकी गरिमा को ध्यान देने पर यह स्पष्ट दिखता है कि व्यक्ति निर्माण और परिवार निर्माण की दोनों ही महती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए परिवार निर्माण को अनिवार्य माध्यम मान कर चलना होगा। 
समाज निर्माण व राष्ट्र निर्माण, जिसे युग निर्माण कहा जा सकता है, का मेरुदण्ड परिवार निर्माण है। मोटी दृष्टि से व्यक्ति और समाज का दायित्व दीखता है, धर्म और शासन पर बहुत ध्यान दिया जाता है, पर यह एक प्रकार से भूला ही दिया जाता है कि परिवार के उस खदान का कितना अधिक महत्त्व है जिसमें से अपने समय और समाज को गौरवास्पद बनाने वाले नर- रत्न उपलब्ध होते हैं। 
आज देश व राष्ट्र को उन्नति के पथ पर अग्रसर कराना हो, तो परिवार निर्माण की ओर ध्यान केन्द्रित करना होगा। इसके बिना एक सर्वांगीण विकसित समाज की कल्पना असम्भव है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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