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बच्चों के बढ़ने के साथ ही माँ- बाप में उनका विवाह करके घर बसाने की, सुखी- समृद्ध बनाने की बड़ी- बड़ी कल्पनाएँ उठने लगती हैं। माँ सोचती है- नई बहू का मुँह देखकर कब सौभाग्यवान बनूँगा? उधर पिता भी सोचते हैं- नई बहू आकर घर को स्वर्ग बनायेंगी। घर का प्रत्येक सदस्य नई बहू के लिए किसी न किसी सुखद कल्पना में अवश्य खोया रहता है। स्वयं लड़के- लड़कियाँ भी संसार के अनुभव से शून्य अपनी मधुर कल्पनाओं में कुछ कम खोये- खोये नहीं रहते। कई तो इस सम्बन्ध में अनजान भी रहते हैं। माँ- बाप की लालसा तीव्र हुई कि झट से सम्बन्ध तय हो जाते हैं। बाजे बजते हैं, उत्सव मनाया जाता है, शहनाइयाँ गूँजती हैं और धूमधाम के साथ विवाह आयोजन सम्पन्न होते हैं; नई बहू घर में आती है। 
समय के बीतने के साथ ही नई बहू का आकर्षण भी कम होने लगता है। कुछ ही समय बीतता है कि कई बातें ऐसी पैदा हो जाती हैं जिनसे सास- बहू में खटकने लगता है। परस्पर ताने, फटकारें, दुर्वचनकों का व्यवहार होने लगता है। घर की बेटी भी अपनी माँ का पक्ष लेकर अपने भावज पर बरसती है। 
राज- दिन घर में होने वाली चख- चख जो पहले नहीं होती थी, उसका कारण बहू को बहू को समझ कर कुलपति श्वसुर भी बहू और उसके कुल की बुराइयाँ बखानने लगते हैं। स्त्री और बेटी द्वार कान भर देने पर तो उनकी स्थिति और असंतुलित हो जाती है। 
गृह- कलह, माँ- बाप द्वारा आरोप- प्रत्यारोप, उधर बहू द्वारा अपने कष्टों की शिकायत सुनकर प्रति भी परेशान हो जाता है। वह दोनों ही पक्ष से अनन्यता के नाते कुछ नहीं कह पाता। समय के बीतने के साथ ही रात- दिन की अशांति से वह और भी अधिक असंतुलित हो जाता है और माँ- बाप तथा बहू पर अपनी अशांति प्रकट करता है। 
उधर बहू जो अपने माता- पिता, भाई- बहिन, घरवालों से बिछुड़कर पति- गृह में सुख के स्वर्णिम स्वप्न लेकर आई थी, यह सब देखकर घबड़ा जाती है। पति की ओर से बरसने वाली गालियाँ, तिरस्कार, आरोप- प्रत्यारोप, आलोचनाएँ, तिरस्कार आदि उसके धैर्य को विचलित कर देते हैं। संसार की कठिनता से अनजान, अनभिज्ञ, कोमल भावनाशील युवती इन परिस्थितियों में अधिक दिन संतुलित नहीं रह पाती और एक न एक दिन उसका मानस उद्वेलित हो उठता है। अपने स्वातन्त्र्य, मौलिक अधिकार, माँ- बाप के गौरव, स्वाभिमान पर चोट पड़ने से उसकी कोमल भावनाएँ कठोर और विद्रोही बन जाती हैं और फिर उसका उद्वेलित मानस गृह- कलह की आग में घी का काम देता है। कई तेज मिज़ाज बहुएँ तो बड़ी लड़ाका और रुद्र रूप बन जाती हैं। सारे घर की शांति काफूर हो जाती है। जो बहुएँ बहुत ही संकोची और सुशील होती हैं, वे चिन्ता, क्लेश, अवसाद, मानसिक घुटन में घुल- घुल कर अपना जीवन नष्ट कर लेती हैं। कई विक्षिप्त हो जाती हैं तो कई अन्य माध्यमों से अपने जीवन की इतिश्री तक कर लेती हैं। इन सभी परिस्थितियों में हमारे गृहस्थ जीवन की दुर्दशा, तपन, विनाश निश्चित है। 
गृहस्थ जीवन की इन दुर्दशा से अधिकांश परिवार ग्रस्त हैं। इन सबके चलते हमारे पारिवारिक जीवन की सुख- समृद्धि, उन्नति- प्रगति के मार्ग अवरुद्ध हो गया है। गृहस्थ जीवन की इस दुर्दशा ने व्यक्ति की शक्तियों को नष्ट कर उसे पंगु बना दिया है। जीवित होते हुए भी वह गृहकलह के विष- दंश से पीड़ित होकर निर्जीव सा बनता जा रहा है। निराशा, उदासी, मानसिक घुटन से घुल- घुलकर उसका जीवन- सत्व नष्ट होता जा रहा है। 
व्यक्ति से ही समाज और समाज से ही राष्ट्र बनते हैं। ऐसा व्यक्ति जिसका परिवार अन्तर्कलह से ग्रस्त है, समाज और राष्ट्र के निर्माण में क्या योगदान हो सकता है? गृहस्थ जीवन, जिसके ऊपर समाज और राष्ट्र की स्थिति निर्भर है, उसकी इस दुर्दशा का समाधान किए बिना सुख- शांति, उन्नति- विकास की कल्पना करना एक विडम्बना होगी। जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन की दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी के मलवे में दबा हुआ सिसक रहा है, वेदना से छटपटा रहा है, वह समाज अथवा राष्ट्र कल्याण के लिए सोच ही क्या सकता है और क्या कर सकता है? 
पारिवारिक जीवन की गाड़ी सदस्यों के त्याग, प्रेम, स्नेह, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और परस्पर आदर भाव पर चलती है। परिवार को सहअस्तित्व, सामूहिक जीवन, सेवा और सहिष्णुता की पाठशाला माना गया है। किन्तु परस्पर के सम्बन्ध स्वार्थपूर्ण आपापूती, संकीर्णता, असहिष्णुता से भर जाते हैं, तो परिवार नरक की साक्षात् अभिव्यक्ति के रूप में परिणत हो जाते हैं। 
पारिवारिक जीवन की दुर्दशा का मुख्य कारण है व्यावहारिक जीवन की शिक्षा का अभाव। लड़के- लड़कियों को अनुभवी वृद्ध गुरुजनों के सम्पर्क में रहकर व्यवहारिक जीवन में जीने की जो शिक्षा मिलनी चाहिए, उसका आजकल सर्वथा अभाव है। विवाह से पहले कन्या को यह शिक्षा नहीं मिलती कि उसे पति गृह में जाकर कैसे जीवन यापन करना है। उसका कर्तव्य उत्तरदायित्व क्या है? उसे किन- किन सद्गुणों के द्वारा परिवार की गाड़ी को चलाना है? यही बात लड़कों के सम्बन्ध में भी है। पारिवारिक जीवन की शिक्षा का अभाव ही गृहस्थ जीवन की दुर्दशा का मूल कारण है। यदि अभिभावक इस अभाव के बारे गम्भीर होकर उसका निराकरण कर सकें, तो पारिवारिक जीवन निश्चित रूप से सुख- शांति से सराबोर हो सकता है। 
(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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