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आदर्श परिवार की स्थापना और आदर्श परिवार व्यवस्था का अनुपम लाभ उठाने के लिए हर व्यक्ति के मन में आकांक्षा उठती है। उसके अनेक नियम, उपनियम बनाये गये हैं। परिवार के सदस्यों में कतिपय गुणों के विकास और शिष्टाचारों के निर्वाह की बात भी कही जाती है। यह सभी आवश्यक तथा उपयोगी है, किन्तु इन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है पारिवारिक भावना, भावनात्मक एकरूपता। अन्य सब नियमोपनियम, गुण, शिष्टाचार आदि उसके आवश्यक कलेवर हैं, जिनके आधार पर उसका स्वरूप सुंदरतम बनाया जाता है। परन्तु भावनात्मक एकरूपता उसका प्राण है। 
भावनात्मक एकरूपता का अर्थ है परिवार के सदस्यों में गहन आत्मीयता की अनुभूति। हम सब एक हैं, एक- दूसरे के हैं, साथ- साथ मरने- जीने के लिए हैं, एक- दूसरे के दुःख से दुःखी, सुख से सुखी हैं आदि बातें कहना- सुनना और बात है तथा उसकी गहरी अनुभूति होना और बात है। सोचा, समझा और कहा जाना तो बुद्धि के आधार पर भी संभव है, किन्तु उतना मात्र पर्याप्त नहीं। बुद्धि से आगे बढ़कर अन्तःकरण की गहराईयों के स्पर्श से, स्नेह, आत्मीयता जैसी भाव संवेदनाओं के विकास से ही उन सशक्त भाव- सूत्रों का निर्माण होता है, जिनमें बँधकर कठिन से कठिन परिस्थिति तथा कठोर से कठोर परीक्षाओं में परिजन टूटकर बिखरते नहीं। न तो वैभव उनके अपनत्व को प्रभावित कर पाती है और न अभावग्रस्त कठिनाइयाँ उन्हें डिगा पाती हैं। 
भावनात्मक स्तर सबल अथवा हीन होने का प्रत्यक्ष प्रभाव समाज में कहीं भी देखा जा सकता है। उसके अभाव में लोग नगण्य- सी साधन- संपदा अथवा पद प्रतिष्ठा पाते ही अपने को परिजनों से भिन्न मानने लगते हैं। उनकी दृष्टि तथा व्यवहार में स्वजनों के प्रति हीन भावना तथा तिरस्कार के भाव प्रकट होने लगते हैं। दूसरे पक्ष में भी उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप द्वेष- दुर्भाव पैदा होने लगते हैं, किन्तु जहाँ भावनात्मक सूत्र सबल हैं, वहाँ बड़े से बड़ा पद एवं वैभव पाकर भी आत्मीयता उतनी ही सघन बनी रहती है। अपनत्व का अधिकार सारे सांसारिक अधिकारों से बड़ा सिद्ध होता है। 
इसी प्रकार कष्ट- कठिनाइयों में भी उसका प्रभाव देखा जा सकता है। भाव हीन परिजन अपना व्यक्तिगत सुविधाओं में नाम मात्र की कमी अथवा जरा- सी कठिनाई सहन नहीं करना चाहते। उनके बचने के लिए स्वयं को शेष परिवार से अलग करने के लिए छटपटाने लगते हैं। किन्तु दूसरी ओर भावसंपन्नों का ढंग और ही होता है। वे अपनत्व के नाते बड़े से बड़े संकटों का सामना मिल- जुलकर ही करते हैं तथा आत्मीयता के स्नेहसिक्त वातावरण में बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को हँसते- खेलते पार कर जाते हैं। 
अस्तु, परिवार संस्था का पुनर्जीवन करने के लिए जहाँ अनेक नियम, गुण, शिष्टाचार के शिक्षण का अभ्यास कराया जाना है, वहाँ आत्मिक संवेदनाओं के विकास को भी ध्यान में रखना होगा। संयुक्त परिवार जैसी श्रेष्ठ प्रणाली इसी के अभाव में तिरस्कृत, बहिष्कृत होती जा रही है। मानवीय विकास की दृष्टि से संयुक्त परिवार बड़े ही उपयोगी और अनुकरणीय है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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