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मनुष्य के कायिक और मानसिक इकाई में अद्भुत क्षमताओं के एक से एक भण्डार भरे पड़े हैं। उनका सुव्यवस्थित सदुपयोग बन पड़े, तो सामान्य समझा जाने वाला व्यक्ति भी ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है, जिन्हें चमत्कारी देव वरदानों की तरह गिना जाने लगे। दुर्भाग्य इसी बात का है कि मनुष्य बाहर की वस्तुओं का मूल्य और उपयोग तो जानता है, पर अपनी सामर्थ्य को उभारने तथा उसका सदुपयोग करने की जानकारी से प्राय: वंचित ही रहता है। पिछड़ी हुई दीन- दयनीय परिस्थिति में पड़े रहने का प्राय: यही प्रधान कारण होता है। 
      अभीष्ट प्रगति के लिए साधन, परिस्थिति एवं सहयोग की भी आवश्यकता पड़ती है, पर उनका जुटाया जाना तथा जो उपलब्ध है, उसे ठीक से काम में लाया जाना उन्हीं से बन पड़ता है, जो अपने व्यक्तित्व को व्यवस्थित बनाने और अपनी क्षमताओं को परिष्कृत करने में सफल होते हैं। इतनी बात बने बिना सभी अनुकूलताएँ निरर्थक चली जाती हैं। कई बार तो सुविधा- साधनों का दुरुपयोग ही होता रहता है और उत्थान की अपेक्षा पतन का ही पथ- प्रशस्त होता है। 
      जितना ध्यान धन उपार्जन और वैभव प्रदर्शन का ताना- बाना बुनने पर दिया जाता है, उतना ही यदि आत्म- चिन्तन, आत्म- सुधार, आत्म- निर्माण और आत्म- परिष्कार की प्रक्रिया पर दिया जा सके, तो निश्चय ही आत्म- विश्वास की मात्रा अनेकों गुनी बढ़ सकती है। प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित हो सके, अपने से लड़- झगडक़र शरीर और मन को आलस्य, प्रमाद त्यागने के लिए सहमत किया जा सके, तो प्रतीत होगा कि किसी नये देव दानव की सामर्थ्य अपने साथ जुड़ गयी। बिखराव की बाल चंचलता यदि छोड़ी जा सके और निर्धारित लक्ष्य पर एकाग्र भाव से चला जा सके, तो कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो सकते हैं। 
      आत्म- ज्ञान की सामान्य भूमिका में जाग्रत् होने वाले सामान्य मनुष्य आत्म- विश्वासी, स्वावलम्बी और स्वाभिमानी पाये जाते हैं। अहंकारी होना एक बात है और आत्मविश्वासी होना बिल्कुल दूसरी। अहंकारी उद्धत होता है, दूसरों को अपने से तुच्छ समझता है, आत्म- प्रशंसा के लिए आतुर होने के कारण चापलूसों द्वारा ठगा जाता रहता है, मतभेद अथवा असहमति को सहन कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं होता। उसे बात- बात में आग बबूला होते और दूसरों के साथ उद्धत व्यवहार करते देखा जा सकता है। आत्म- विश्वासी में इस प्रकार की एक भी विकृति नहीं होती। उसका आत्मबोध सिखाता है कि ईश्वर की तरह ही उसके पुत्र मनुष्य को भी शालीनता, सज्जनता, पवित्रता, सरलता, नम्रता सहिष्णुता जैसी सत्प्रवृत्तियों का उत्तराधिकारी होना चाहिए। इतना ही नहीं आत्म विश्वासी सोचता है कि किसी भी दिशा में बढ़ चलने की प्रचण्ड सामर्थ्य मानवीय सत्ता में भरी पड़ी है। उसका उपयोग ठीक से न बन पड़ना ही पिछड़ापन है। मनोयोग और एकाग्र- पुरुषार्थ का समन्वय हो सका, तो फिर हाथ में लिए हुए कार्य उत्कृष्ट स्तर के बनते चले जायेंगे और इस क्रम का चलते रहना एक दिन उच्चस्तरीय सफलता प्रस्तुत किये बिना रहेगा नहीं। अहंकारी केवल उन्हीं कार्यों में रस लेता है, जो सस्ती वाहवाही दिला सकें। आत्म- विश्वासी, आत्म- गौरव को ध्यान में रखकर उन आदर्शवादी प्रयत्नों को अपनाता है, जिनसे आत्मा- परमात्मा और विश्वात्मा को संतोष मिल सके। इसी अंतर को देखते हुए अहंकारी की निन्दा और आत्मविश्वासी की प्रशंसा होती है। यों अंतर बारीकी से ही पकड़ में आता है। अन्यथा कई बार मोटी दृष्टि से देखने वालों को अहंकारी एवं आत्म- विश्वासी एक जैसे दीखने लगते हैं। 
      उच्चस्तरीय आत्मबोध में मनुष्य अपने आपको ईश्वर का तेजस्वी अंश विश्वात्मा का एक घटक समझता है और सुरदुर्लभ मानव जन्म का लक्ष्य पूरा करने वाले व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने वाले लोकमंगल का प्रयोजन पूरा करने वाले कार्यों में ही हाथ डालता है। अन्य किसी भटकाव में उसका मन नहीं फिसलता। सामान्य स्तर का आत्म विश्वास भी इस आत्मबोध का प्रथम चरण है। इस प्रवेश द्वार में पैर रखते ही मनुष्य उत्थान और पतन के उत्तरदायित्वों को अपने कन्धे पर ओढ़ता है। दूसरों को दोष देने अथवा दूसरों से याचना करने की ओछी दृष्टि उसके पास नहीं फटकती। इस तथ्य को समझते हुए वह अपने में वे विशेषताएँ उत्पन्न करने में संलग्न होता है, जिनके कारण सफलता खिंचती चली आती है, उन दुर्बलताओं से जूझता है, जो अवरोधों और संकटों का प्रधान कारण बनी होती है। अतएव अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आत्म विश्वासपूर्वक निरन्तर आगे कदम बढ़ाते रहना चाहिए। 


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