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मनुष्य की सारी गतिविधि और क्रिया- कलापों का संचालन केन्द्र मनःसंस्थान है। सागर की लहरों की भाँति मनःक्षेत्र में भी कितने ही उतार चढ़ाव आते रहते हैं। कभी तो वह समुद्र- सा शान्त, आकाश- जैसा नीरव और शीतल वायु का स्पर्श करता हुआ बहता है, तो कभी समुद्र में आने वाले ज्वार- भाटे जैसा उफनता- उबलता रहता है। इच्छाएँ, आकांक्षाएँ विचारणाएँ, भावनाएँ मन में ही उठती हैं तथा उन्हें पूरा करने की योजना बनाने का कार्य भी उसके जिम्मे आता है। स्वस्थ मनोभाव ही व्यक्ति के जीवन को सुयोग्य, सुसंस्कारी और हृष्ट- पुष्ट बनाने में सक्षम है। मानसिक संतुलन- सामंजस्य ही वस्तुतः स्वास्थ्य के चिह्न है। 
      चेतन प्राणियों की चेतन सत्ता ही नहीं, अपितु व्यक्ति और परिस्थिति की दिशा भी सदैव एक जैसी नहीं रहती। प्रकृति जड़ वस्तुओं को भी नचाती रहती है। प्रकृति चक्र के अनुसार समय- समय पर उनमें परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है और वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। वह व्यक्ति की अपनी मनोदशा एवं मानसिक बनावट पर निर्भर है कि वह इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करे और क्या न करे। जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाने से ही व्यक्ति मानसिक संक्षोभों, संवेगों को तटस्थ या संतुलित भाव से ग्रहण कर सकता है। 
      संतुलन के चार पक्ष हैं- सतर्कता- सजगता, विचार- प्रवाह कल्पना, व्यवहार- अभ्यास तथा रुझान- उत्साह। इन चारों का सुव्यवस्थित क्रम चल पडऩे से मनुष्य मानसिक दृष्टि से समर्थ एवं सुविकसित बनता है। 
      मानसिक संतुलन न केवल जीवन की एक अनमोल निधि है, वरन् यह जीवन जीने की एक कला भी है। इस कला के द्वारा जीवन को हरा- भरा पल्लवित, पुष्पित और सुखी शांत बनाया जा सकता है। मन की गरिमा एवं विशालता पर विचार करने से प्रतीत होता है कि जीवन का अस्तित्व, स्वरूप, स्तर और भविष्य उसी केन्द्र बिन्दु के साथ जुड़ा हुआ है। देखने में जो कुछ प्रत्यक्ष दिखाई देता है, उसमें शरीर की भूमिका प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। मन ही पूरी तरह शरीर पर छाया हुआ है, उसके भीतर भी वही रमा है। पर्दे के पीछे बैठे बाजीगर मन की अँगुलियाँ ही व्यक्ति के अन्दर से अपनी करामात दिखाती रहती है। 
      संतुलन और सामंजस्य ही स्वस्थ रहने तथा तनाव मुक्त जीवन जीने का चिह्न है। तनाव तभी उत्पन्न होता है, जब विचार- प्रवाह में गड़बड़ी पड़ जाने से कल्पनाएँ अनियंत्रित हो जाती है। क्या सोचना और करना उपयुक्त है, क्या नहीं, क्या संभव है या असंभव, साधन और परिस्थितियाँ क्या है? इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही कोई ठोस या अंतिम निर्णय करना उपयुक्त होता है। 
      शांतिमय एवं तनावमुक्त जीवन जीने के लिए यह आवश्यक है कि अस्त- व्यस्त बहुत सी बातें सोचने और बेसिलसिले काम करने की बजाय पूरे दिन की एक योजना बनाकर यह निर्धारित कर लिया जाय कि कौन- कौन से कार्य सबसे जरूरी है। निर्धारित कार्यक्रमों पर ही चित्त को एकाग्र कर लिया जाय एवं बाकी चीजों को दिमाग से निकाल दिया जाय तो उस दिन का कार्य आसानी से निबटाया जा सकता है। समय और शक्ति, जो तमाम चीजों के सोचते रहने, आधे- अधूरे मन से काम करते रहने मे अपव्यय हो रही थी, आसानी से बचाई जा सकती है और यही वह रहस्य है, जिस पर चलकर महापुरुषों ने अनेकों महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। 
      एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के चक्कर में मनोयोग से कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। आधा- अधूरा कार्य छोडक़र मन दूसरे कामों की ओर दौडऩे लगता है। यहीं से श्रम और समय की बर्बादी प्रारंभ होती तथा मन में खीझ उत्पन्न होती है। विचार और कार्य सीमित एवं संतुलित कर लेने से श्रम और शक्ति का अपव्यय रुक जाता है और व्यक्ति सफलता के सोपानों पर चढ़ता चला जाता है। 
      महत्त्वाकाँक्षी होना प्रगतिशीलता की निशानी है। उनका होना किसी भी प्रकार अनुचित नहीं है। पर वे मात्र संकीर्ण स्वार्थपरता पर ही सीमित नहीं होनी चाहिए। स्व के साथ पर का भी समन्वय होना चाहिए। महत्त्वाकाँक्षाएँ जब समाज कल्याण एवं परोपकार की भावना से प्रेरित होती है, तब व्यक्ति के मार्ग में आने वाले अवरोध क्षोभ, तनाव, खीझ जैसे उत्पात पैदा नहीं कर पाते, बल्कि प्रस्तुत अवरोध, स्वयं आगे बढक़र उस व्यक्ति का पथ- प्रशस्त करने लगते हैं। तुरन्त सफलता मिल जाने का भूत सवार होना, अपने बन्धु मित्र और परिचितों के सिर पर पैर रखकर आगे निकलने का नशा चढ़ जाना व्यक्ति को परेशान करके रख देता है। जब आतुर इच्छाओं के अनुकूल कार्य योग्यताओं, साधनों एवं परिस्थितियों के अभावों में ही नहीं हो पाता और असफलता मिलने लगती हैं, बाधाएँ सामने खड़ी दीखती हैं, तब मन तनावग्रस्त होने लगता है और सारी महत्त्वाकाँक्षाएँ धूल में मिलने लगती हैं। 
      महत्त्वाकाँक्षाओं को कम करके ईमानदारी से इस बात पर विचार किया जाय कि हम क्या- क्या काम कर सकते हैं, अपनी वर्तमान परिस्थितियों, साधनों और योग्यताओं के आधार पर क्या कार्य, कितनी मात्रा में, किस तरह कर सकते हैं? इस आधार पर किये गये निर्णय प्राय: असफल नहीं रहते। फलतः: निरर्थक उद्विग्नता का भी सामना नहीं करना पड़ता। युक्ति- युक्ति महत्त्वाकाँक्षाओं को सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। 
     अस्त- व्यस्त जीवन जीना, जल्दबाजी करना, रात दिन व्यस्त रहना, हर क्षण को काम- काज में ही ठूँसते रहना भी मन: क्षेत्र में भारी तनाव पैदा करते है। अत: यहाँ यह आवश्यक हो जाता है कि अपनी जीवन- विधि दैनिक जीवन को विवेकपूर्ण बनाकर चलें। ईमानदारी, सज्जनता, संयमशीलता, सुव्यवस्था से भरा- पूरा हल्का- फुल्का जीवन जीने से ही मन: शक्ति का सदुपयोग होता है और उस ईश्वर प्रदत्त क्षमता से समुचित लाभ उठा सकने का सुयोग बनता है। 


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