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आज प्राय: प्रत्येक व्यक्ति, समाज, सरकार और सम्पूर्ण विश्व भयग्रस्त है। इस भय का मुख्य कारण उस शारीरिक, मानसिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक या राजनैतिक स्थिति की कल्पना है, जो हमारी आशाओं और आकांक्षाओं के विपरीत है। न चाहते हुए भी जिसके घटित हो जाने की आशंका रहती है। मूर्धन्य मनीषियों ने इस आशंका के निम्नलिखित कारण बताये हैं- 
१- कर्तव्य में आस्था का न होना तथा आदर्श कर्तृत्व का अभाव। 
२- संसार के अटल नियमों की या तो जानकारी न होना या जानकारी होते हुए भी उनमें दृढ़ विश्वास और आस्था का अभाव। 
३- भौतिक पदार्थों में सुख की अनुभूति और उसके वियोग में दु:ख का भाव। ४- ईश्वरीय की न्याय, व्यवस्था तथा दयालुता में अविश्वास। 
यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को सुख- दु:ख, हानि- लाभ, यश- अपयश आदि को समान समझकर केवल कर्तव्य के लिए पालन नहीं करता, तो उसे हानि, दु:ख, अपयश का भय लगा ही रहेगा। भय के सभी कारण ऐसे होते हैं, जिन्हें हम स्वयं उत्पन्न करते हैं और मकड़ी के जाल की तरह उसमें कैद होकर रह जाते हैं। 
शास्त्रकारों ने संसार के पाँच अटल नियम बताये हैं- 
१- भौतिक जगत में निरंतर परिवर्तन के फलस्वरूप जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म, सुख के बाद दु:ख और दु:ख के बाद सुख, लाभ के बाद हानि और हानि के पश्चात् लाभ, विजय के बाद पराजय और पराजय के बाद विजय, यश के बाद अपयश और अपयश के बाद यश, अमीरी के बाद गरीबी और गरीबी के बाद अमीरी, इस प्रकार वृत्ताकार घूमते हैं, जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है। जिसे जीवन, सुख, लाभ, विजय, यश, धन आदि में आसक्ति रहती है, उसे मृत्यु, दु:ख, हानि, पराजय, अपयश और निर्धनता का भी भय लगा रहेगा। 
२- केवल आत्मा या विश्व की संचालक शक्ति ही अजर, अमर और अपरिवर्तनशील है। आत्मा में स्थित हो जाने पर भय नहीं रहता। 
३- उत्पत्ति, पालन और प्रलय, जन्म, जीवन और मृत्यु संसार का नियम है। इस नियम को न जानने के कारण मृत्यु का भय लगा रहता है और यह सताता रहता है। 
४- संसार के सारे काम, सहयोग, प्रेम, सद्भावना, विश्वास, ईमानदारी से चलते हैं। इनके विपरीत आचरण से भय लगता है। 
५- जैसा कर्म किया जाता है, उसी के अनुसार फल मिलता है। जैसा बीज बोते हैं, वैसा पौधा उगता है। 
वेदों में कहा गया है कि यद्यपि भौतिक पदार्थों में वास्तविक सुख नहीं है, फिर भी यदि मनुष्य सुख का साधन समझकर उनका संग्रह करता है, तो उनके विग्रह पर उसे दु:ख का भय बना रहना स्वाभाविक है। 
इस सृष्टि का एक मात्र संचालक ईश्वर है। सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड उसके नियोजन और नियमों के अनुसार चलता है। जो भी व्यक्ति उसके सहारे अच्छा काम करता है, वह प्रगति पथ पर आगे ही बढ़ता जाता है। संयोगवश यदि मार्ग में संकट पड़ भी जाते हैं, तो वह दया करके उसे संकट से निकालता है और यदि वह नहीं निकालता है, तो भी उसमें हमारा और विश्व का कल्याण निहित रहता है। यदि हमें ईश्वर की दयालुता पर विश्वास नहीं है, तो कोई भी कठिन काम प्रारंभ करने और उसे पूरा करने में असफलता का भय बना रहता है। 
भय के उपर्युक्त कारणों को दूर कर दिया जाय, तो प्रत्येक मनुष्य में निर्भीकता का दिव्य गुण आ जाएगा। यह निर्भीकता तीन प्रकार से आती है- १- विज्ञ निर्भीकता, २- विवेक निर्भीकता और ३- ईश्वरनिष्ठ निर्भीकता। 
विज्ञ निर्भीकता- यदि मनुष्य आसन्न कठिनाइयों और खतरों के समाधान का मार्ग जान लेता है, तो वह उनकी ओर से निर्भीक हो जाता है। वस्तुतः: मनुष्य में अनंत शक्तियों का भाण्डागार भरा पड़ा है। जब वह संकल्पबद्ध हो सुनियोजित ढंग से आगे बढऩे का प्रयत्न करता है, तो पर्वत जैसी ऊँची बाधाएँ भी मार्ग देने के लिए बाध्य हो जाती है। 
विवेक निर्भीकता- जो विवेक से काम लेते हैं, सत्- असत् को जानते हैं और मन तथा बुद्धि को संतुलित रखते हैं, उनमें इतना आत्मविश्वास विकसित हो जाता है कि फिर उन्हें किसी प्रतिकूल परिस्थिति में से भय नहीं लगता। भय की उत्पत्ति विवेकहीनता से होती है। कथा सरित्सागर में कहा गया है निर्विमर्शा हि भीख: अर्थात् भय से भीत होने वाले अविवेकवान हुआ करते हैं। 
ईश्वरनिष्ठ निर्भीकता- जिस व्यक्ति को ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वशक्ति सम्पन्नता, दया और न्याय पर पूर्ण विश्वास है, जो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का स्वरूप देखता है, जो सृष्टि को ईश्वर की अभिव्यक्ति मानता है, भय उसके पास तक नहीं फटकता। 
मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए निर्भीकता परम आवश्यक है। इसके बिना कोई व्यक्ति या राष्ट्र महान नहीं बन सकता। निर्भयता से मनुष्य को इतना बल मिलता है कि वह बड़े से बड़ा त्याग कर सकता है और कठिन से कठिन परिस्थितियों का भी सामना करने में सक्षम हो सकता है। 


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