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आज हमारे राष्ट्र को आजाद हुए अर्धशतक से अधिक समय बीत चुका है। एतदर्थ लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी, किसी ने परिवार खोया, किसी ने अपना जमा जमाया व्यवसाय, कारोबार एवं किसी ने शहादत द्वारा स्वयं को राष्ट्र देवता की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया। इतनी बड़ी कीमत अदा करने के बाद आज जब हम अपने राष्ट्र को पुनः आर्थिक दासता की, परावलम्बन की, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों की गिरावट लाने वाली, प्रतिगामी बनाने वाली बेड़ियों से जकड़ा पाते हैं, तो लगता है कि एक सांस्कृतिक क्रान्ति अभी और जरूरी है, जिसमें समर्पित भाव के सृजेताओं की अधिक आवश्यकता है। 
      महर्षि अरविन्द को इस स्थिति का पूर्वाभास हो गया था, तभी तो उन्होंने कहा था- ‘यदि भारत को अपना अस्तित्व बनाए रखना है, तो उसे फिर से युवा बनाना होगा। ऊर्जा के धारा प्रवाह तरंगायित स्रोत उसमें उड़ेलने होंगे, उसकी आत्मा को फिर से वैसी ही बनाना होगा जैसी वह पुरातन काल में थी। लहरों जैसी विशाल, शक्तिशाली, इच्छानुसार शांत अथवा विक्षुब्ध कर्म, अथवा बल का एक महासागर।’ 
      यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि राष्ट्र का आधार है समर्थ- सशक्त भावी पीढ़ी, जो संस्कारवान् हो। आज के आस्था संकट व सांस्कृतिक प्रदूषण के युग में यह एक अनिवार्य आवश्यकता है कि भौतिक विकास के साथ युवा वर्ग के भावनात्मक नवनिर्माण एवं सर्वांगीण विकास पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए। वस्तुतः व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज एवं समाज से राष्ट्र बनता है। वर्तमान परिवेश में हमारी समाज- व्यवस्था सर्वतोमुखी अस्त- व्यस्त नजर आती है। नीति- नियम और मर्यादा की कसौटी पर व्यक्ति के निजी चिंतन- चरित्र को कसकर देखा जाए, तो वह खरा कम, खोटा अधिक दिखाई देता है। पारस्परिक सहयोग एवं सद्भाव समाप्त सा हो गया प्रतीत होता है। सम्पन्नता कुछ गिने चुने लोगों के हाथ में सिमट गयी है। सुविधा साधनों की चमक- दमक चकाचौंध पैदा करती एवं कौतूहल बढ़ाती दिखाई देती है। वह ठोस आधार कहीं दिखाई नहीं देता, जिसे प्रगति का मूलभूत आधार कहते हैं। व्यक्ति का निजी जीवन उच्च आदर्शों पर आधारित न होकर जब तक परिस्थितियों पर टिका रहेगा, समाज परावलम्बी ही बना रहेगा तथा उसकी प्रगति- समृद्धि की दिशा में वांछित उत्थान कर पाना नितांत असंभव प्रतीत होता है। 
      स्वामी विवेकानन्द के अनुसार किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र को महान् बनाने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- १ की शक्ति में विश्वास, २- ईर्ष्या और सन्देह का अभाव एवं ३- जो धर्म पथ पर चलने में और सत् कर्म करने में संलग्न हो, उनकी सहायता करना। उन्होंने आगे धर्म को राष्ट्रीय जीवन का प्राण निरूपित करते हुए चिरकाल के लिए उसी का अवलम्बन ग्रहण करने की आवश्यकता प्रतिपादित की है। उनका कथन है कि भविष्य के भारत का पहला कार्य भारत की धार्मिक एकता ही है। हमारी आध्यात्मिकता ही हमारा जीवन रक्त है। हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यही नहीं हमारे राष्ट्रीय जीवन की मूल भित्ति है। हमारा देश ही हमारा जाग्रत् देवता है। 
भारत वर्ष अनेक धर्म, सम्प्रदायों का देश है, इससे इनकार नहीं करते, किन्तु राष्ट्रीय एकता के लिए साम्प्रदायिक संकीर्णता खतरनाक होती है, अतः जहाँ ऐसा विवाद दिखाई दे, वहाँ धर्म और जातीय संकीर्णता को मिटाकर राष्ट्र की अखण्डता और भावनात्मक एकता की रक्षा करनी चाहिए। राष्ट्र सुरक्षित है, तो धर्म भी सुरक्षित है। अतः धार्मिक संकीर्णता या साम्प्रदायिक विविधता के द्वारा उसकी प्रभुता को आँच नहीं आने देना चाहिए। 
      भारत कभी संसार का अग्रणी ही नहीं, जगद्गुरु माना जाता रहा है। यहाँ की सभ्यता एवं संस्कृति से प्रकाश लेकर ही संसार के अधिकांश देश सभ्य बनकर अपने समाजों में नागरिक चेतना जाग्रत् कर सके हैं, तो अब सीखने वाला आगे निकल जाये और सिखाने वाला पीछे रह जाये, तो यह बात कुछ जँचती नहीं। आज संसार की सभ्यता- संस्कृति में सर्वप्रमुख स्थान पाने के लिए देशों में स्पर्धा बनी हुई है। हर देश अपनी सभ्यता का सिक्का संसार में जमाना चाहता है। तब कोई कारण नहीं मालूम होता है कि विद्या- बुद्धि में किसी देश से कम न रहने वाला भारत इस प्रतियोगिता में भाग न ले और मैदान जीतकर न रहे; किन्तु यह होगा तब जब भारतवासी अपने में उच्चकोटि की नागरिक चेतना जगायेंगे और ठीक- ठीक उसके अनुसार व्यवहार करना सीखेंगे। 
      राष्ट्रीयता का क्षेत्र बढ़कर अंतरराष्ट्रीय में बदल रहा है। संसार के सारे देश एक दूसरे के घनिष्ठ सम्पर्क में आ रहे हैं। देशकाल की दूरियाँ मिटती जा रही है। एक देश के लोग दूसरे देशों की सभ्यता और संस्कृति का गहन अध्ययन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में जहाँ एक ओर भारत का धार्मिक साहित्य ही नहीं, समग्र वाङ्मय नागरिकता, मानवता, सभ्यता एवं संस्कृति के संदेशों से भरा पड़ा हो, वहाँ उसके निवासियों के व्यावहारिक जीवन में उससे विपरीत लक्षण दिखाई दें, तो भारतीयता पर मुग्ध विदेशी विद्वान् अध्येता क्या कहेंगे? वे तो निश्चित रूप से भारतवासियों को मिथ्यावादी मानेंगे और उनका बहुमूल्य जीवन दर्शन नगण्य सा होकर संसार की दृष्टि में गिर जायेगा। कदाचित् कोई भी भारतवासी ऐसा न होगा, जो यह चाहे कि उसके देश, दर्शन तथा सभ्यता व संस्कृति की इस प्रकार अवमानना हो। तब उसे शपथपूर्वक अपने में और अपने आस- पास एक स्थायी आदर्श नागरिक चेतना का विकास करना ही होगा। 
      राष्ट्र और उसकी प्रतिष्ठा को बनाये रखने का कार्य नागरिकों द्वारा पूरा होता है। राष्ट्र की एक विशाल परिभाषा है, जिसके अंतर्गत धर्म, जाति तथा संस्कृति आदि सभी आ जाते हैं। राष्ट्र की मर्यादाओं का पालन सर्वोच्च धर्म है। इस धर्म का पालन समुचित रीति से होता चले, इसके लिए आवश्यक है कि उसका प्रत्येक नागरिक एक कुशल नागरिक बने और उसकी आवश्यकताओं के लिए अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को छोटा समझे। जिस देश में ऐसे नागरिक होते हैं, वह देश कभी पराजित नहीं होता, धन- धान्य की भी उसे कोई कमी नहीं रहती। राष्ट्र के सामने आक्रमणकारी शत्रुओं से आत्मरक्षा, खाद्य संकट, मँहगाई, भ्रष्टाचार, चोर बाजारी, बेकारी, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, अपराधवृत्ति, प्रांतवाद, भाषावाद, जातिवाद, विघटन, देशद्रोह, आंतरिक कलह, प्रजा में बढ़ता असंतोष आदि अगणित समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हैं। इनका समाधान छुटपुट उपायों से नहीं हो सकता। मुरझाये पेड़ के पत्ते सींचने से काम न चलेगा, उसकी जड़ को कुरेदना और सींचना पड़ेगा। तभी कोई ऐसा हल निकल सकना संभव है, जिससे हमारी विकास आकांक्षा वस्तुतः सफल हो सके ।। 
      हमें यह ध्यान रखना ही चाहिए कि मनुष्य जड़ नहीं है और न उसकी समृद्धि जड़- पदार्थों के अधिक इकट्ठा कर लेने पर संभव हो सकती है। मनुष्य चैतन्य आत्मा है और उसका आंतरिक स्तर जब ऊँचा उठेगा, तभी उसकी सच्ची शक्ति एवं सामर्थ्य का विकास होगा और तभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति होगी, जिसे समृद्धि के नाम से आज पुकारा जा रहा है। व्यक्ति सद्गुणी एवं चरित्रवान् हो, तो वह शक्तिपुंज है और यदि वह निकृष्ट मनोभूमि का हो, तो वह अपना ही नहीं, समस्त राष्ट्र एवं समाज का भी अधःपतन करता है। हमें यह जान ही लेना चाहिए कि दौलत खेतों और कारखानों में ही नहीं, मनुष्य के अंतःकरण में उत्पन्न होती है और समग्र विकसित व्यक्तित्व ही दौलत के अक्षय भण्डार सिद्ध होते हैं। गांधी, नेहरू, तिलक, मालवीय, दयानंद आदि युग पुरुषों के व्यक्तित्वों का मूल्य हजारों कारखानों से अधिक था। 
       कर्त्तव्य धर्मों में तीन प्रमुख माने गये हैं- वैयक्तिक धर्म, समाज धर्म और राष्ट्र धर्म। वैयक्तिक धर्म व्यक्ति की सुख- सुविधा और विकास हेतु होता है। समाज धर्म में व्यक्ति और समाज की गति- प्रगति की बात सोची जाती है, जबकि राष्ट्र धर्म में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों की उन्नति निहित होती है। अतः सिर्फ एक राष्ट्र धर्म के पालन से शेष दोनों धर्मों का निर्वाह स्वतः होता रहता है। इसलिए तीनों धर्मों में राष्ट्र धर्म को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। अस्तु तन, मन, धन, श्रम, साधन, व्यवसाय, विचार, कला, विज्ञान और धर्म अध्यात्म के प्रसार द्वारा राष्ट्र की सेवा करना, उसकी सुख- शांति, समृद्धि- प्रगति बढ़ाने का निष्ठापूर्वक प्रयास करना, यह राष्ट्र धर्म है। इसे आज का सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। वस्तुतः जिन कार्यों से युग- धर्म का निर्वाह होता हो, देश प्रगतिशील बनता हो, समाज में एकता- समता, स्नेह, प्रेम की आधारशिला खड़ी होती हो, उन सबको राष्ट्र धर्म माना गया है। हर व्यक्ति को ऐसे कार्यों में संलग्न होकर सेवा धर्म का निर्वाह और राष्ट्र धर्म का परिपालन करना चाहिए। इसे आपत्तिकाल का सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ माना गया है। 
       आज की समस्त समस्याएँ जो राष्ट्र को क्या समूचे विश्व को ग्रसित किए हुए हैं, किस कारण जन्मी हैं व उसका समाधान किस प्रकार संभव है, इस पर बड़ी व्यापक दृष्टि डालकर युगद्रष्टा परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण के लिए समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी तथा बहादुरी के साथ साधना, उपासना, संयम एवं सेवा के क्षेत्र में दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ने के लिए जन- जन को प्रेरित किया। इसके साथ उन्होंने नशा उन्मूलन, स्वास्थ्य संवर्धन, पर्यावरण संशोधन ,, नारी जागरण, शिक्षा- विद्या का समन्वय, आर्थिक सामाजिक स्वावलम्बन जैसे सप्तआन्दोलन की दिशाधारा पर दूरदर्शिता पूर्ण विवेचना करते हुए विभिन्न समस्याओं के निदान हेतु वे समाधान बताए हैं, जिनकी जड़ें हमारी संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों में विद्यमान हैं। आज की विषम परिस्थिति में आशावाद की झलक दिखाते हुए वे लिखते हैं कि नवसृजन की चेतना असमर्थ नहीं है। भ्रष्ट चिंतन व दुष्ट आचरण मिटकर ही रहेगा। यदि देवमानव संगठित हों, तो राष्ट्र को समर्थ सशक्त बनाने का बीड़ा जुटा लेंगे एवं यह भावनात्मक नवनिर्माण से आस्थाओं के परिशोधन से ही होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। 

(लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं आध्यात्मिक मासिक पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादक हैं।) 


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