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मनुष्य के विकास की संभावनाएँ असीम हैं। उसके अंतर्गत छिपी हुई क्षमता का पूरी तरह मूल्यांकन किया जा सकना कठिन है। महामानवों के अगणित इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि साधनहीन परिवारों में उत्पन्न होना तथा विपरीत परिस्थितियों का घेरा मनुष्य की प्रगति में देर तक बाधक नहीं रह सकता, यदि उसमें आगे बढ़ने की अदम्य आकांक्षा विद्यमान है। 
      देखा जाता है कि लोग ऐसी ही दीन- हीन परिस्थितियों में पड़े हुए हेय और गया- गुजरा असफल- जीवन जीते रहते हैं। किसी तरह मौत के दिन पूरे करते हैं, न कोई आशा न उमंग, न कोई योजना न दिशा। मानो वे पेट पालने और बच्चे पैदा करने भर के लिए जन्मे हों। उसी जंजाल को समेटने के लिए कुछ करते रहने के लिए विवशता में फँसे पड़े हों। 
      क्षमता रहते हुए भी इस प्रकार का नीरस जीवन जीने का कारण है- आकांक्षाओं का अवसाद, प्रगति के लिए उत्साह का अभाव और आशाजनक भविष्य चिन्तन की उपेक्षा। कुछ योजना ही सामने न हो, तो प्रयत्न किस प्रकार संभव होंगे और प्रयत्नों के बिना सफलता का आनन्द कैसे मिलेगा? योजना बनाने के लिए कुछ बनने और कुछ करने की इच्छा होनी चाहिए। यह इच्छा भी मात्र कल्पना- जल्पना बनकर रह जाय तो निरर्थक है। इच्छा जब उत्कृष्ट होती है, तब उसे आकांक्षा कहते हैं और आकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने सारे मनोयोग और पुरुषार्थ को नियोजित करने का नाम है- संकल्प। जब प्रगति के पथ पर संकल्पपूर्वक बढ़ा जाता है, तो प्रतिकूलता अनुकूलता में बदलती है और अँधेरे में प्रकाश उत्पन्न होता है। आरंभ में जो बात बहुत कठिन लगती थी, वह उतनी ही सरल होती चली जाती है। 
      श्रुति कहती है- संकल्पमयोऽयं पुरुषः अर्थात् व्यक्ति संकल्पों की प्रतिमूर्ति है। उसके पुरुषार्थ की सार्थकता संकल्प की उत्कृष्टता पर निर्भर है। जब अभीष्ट प्रयोजन के लिए साहसपूर्वक कमर कस ली जाती है और निश्चय कर लिया जाता है कि कठिनाइयों का धैर्य और साहसपूर्वक सामना करते हुए उनके निराकरण के लिए तत्पर रहा जायेगा, तो फिर वह निष्ठा भरी मनुष्य की सामर्थ्य देखते ही बनती है। मनुष्य की संकल्पशक्ति संसार का सबसे बड़ा चमत्कार है। उसके आधार पर छोटे स्तर पर खड़ा हुआ व्यक्ति ऊँचे से ऊँचे स्थान तक पहुँच सकता है। 
      असफलताओं के पीछे एक ही प्रधान कारण रहता है कि जितनी तत्परता और जितने मनोयोगपूर्वक प्रयत्न किया जाना चाहिए था, उतना नहीं हुआ। असफलता यही उपदेश देने आती है कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अधिक हिम्मत, अधिक बहादुरी और अधिक निष्ठा की जरूरत थी, जो पिछली बार पूरी नहीं की जा सकी। अगली बार अधिक निष्ठा सतर्कता और मेहनत के साथ तत्पर होना चाहिए, ताकि संभावना संदिग्ध रहने का कोई कारण शेष न रह जाये। 
      सोच- समझकर लक्ष्य निर्धारित करना और फिर मनोयोग एवं पुरुषार्थ से एकत्रित इस प्रयोजन में लगा देना, यही संकल्प की प्रखरता का चिह्न है। सफलता उन्हें वरण करती है, जो धैर्यवान् हैं, देर तक अभीष्ट कार्य की पूर्ति का इंतजार कर सकते हैं और तब तक निर्धारित पथ पर चलते रहने की हिम्मत रखते हैं, जब तक कि मंजिल तक पहुँच न जाया जाय। विजयश्री ऐसे ही धैर्यवान् पुरुषार्थी लोगों को नसीब होती है। 


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