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पदार्थ विज्ञान, जिसे भौतिक विज्ञान भी कहा जाता है, के आविष्कार निश्चय ही सराहनीय एवं आश्चर्यजनक है, पर जब चेतना विज्ञान, जिसे योग विज्ञान भी कहा जाता है, की उपलब्धियों से तुलना की जाय, तो दोनों के बीच काफी अंतर दिखाई देता है। यदि चेतना विज्ञान प्रखर सूर्य है, तो पदार्थ विज्ञान एक साधारण टिमटिमाता हुआ दीपक। 
      चेतना विज्ञान में प्रगति और परिवर्तन जैसी क्रियाओं में चेतना शक्ति का प्रयोग होता है, जबकि पदार्थ विज्ञान में विद्युत् ताप, गैस एवं परमाणु ऊर्जा जैसी पदार्थगत शक्तियों का प्रयोग किया जाता है। पदार्थ विज्ञान के जितने भी कौशल है, ऊर्जाएँ है, पदार्थ स्तर की होती है, इसलिए इनके द्वारा लाये गये परिवर्तन भी पदार्थगत होते हैं। जबकि चेतना विज्ञान के प्रभाव से क्षण भर में रूपांतरित कर किसी वस्तु को दूसरे तीसरे पदार्थ में बदला जा सकता है। इसमें पदार्थ सत्ता के साथ किसी प्रकार की छेड़खानी नहीं करनी पड़ती, उसे धारण करने वाली चेतना के अणुओं को सक्रिय मात्र कर देना होता है। इतने में ही एक वस्तु का लोप होकर दूसरे का निर्माण हो जाता है। चेतना विज्ञान में योगियों द्वारा केवल व्यक्तिगत चेतना- अणुओं को विशेष प्रकार से उत्तेजित कर दिया जाता है। इतने से ही शरीर तंत्र एवं अंग- अवयव प्रभावित होकर उच्च स्तरीय ढंग से स्वमेव क्रिया करने लग जाते हैं। इस क्रम से कई बार वस्तु तो अपरिवर्तित बनी रहती है, पर उसकी कार्य पद्धति बदलकर असाधारण हो जाती है और अनेक बार क्रिया के साथ- साथ वस्तु में भी थोड़ा बहुत रूपांतरण हो जाता है। 
      चेतना विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें चेतना कणों को सक्रिय निष्क्रिय कर देने मात्र से एक वस्तु का तिरोभाव होकर उसमें दूसरे का आविर्भाव हो जाता है। दूसरे शब्दो में किसी भी पदार्थ से दुनिया के किसी भी पदार्थ को प्रकट किया जा सकता है। पदार्थ विज्ञान में यह सुविधा नहीं है। उसमें एक द्रव्य को दूसरे द्रव्य में परिवर्तन करने के लिए उच्च स्तर की साधन सुविधाएँ चाहिए। इतने पर भी इस बात की गारंटी नहीं कि इच्छित पदार्थ को प्राप्त किया जा सकता है। 
      इस मूलभूत अंतर को जान लेने के बाद यह निश्चय करना हम पर निर्भर करता है कि हम किसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि मानें एवं जीवन में किसकी महत्ता को स्वीकार करें- पदार्थ विज्ञान को या चेतना विज्ञान को। 
      यह चेतना ही है, जो मनुष्य शरीर से लेकर सृष्टि के स्थूल कणों तक में व्याप्त हो रही है। जहाँ तक चेतना का अंश प्राकृतिक परमाणुओं से शक्तिशाली होना है वहाँ तक तो जड़ और चेतन का अंतर स्पष्ट प्रतीत होता रहता है। पर एक अवस्था ऐसी आती है, जब जड़ता चेतनता पर पूरी तरह घटाघोप हो जाती है। यही अवस्था है, जब चेतना पूर्ण रूप से जड़ गुणों वाली कंकड़, पत्थर जैसी स्थिति में चली जाती है। मुख्य रूप से सृष्टि की चेतना एक ही है, पर वह गुणों के द्वारा क्रमशः जड़ होती चली गयी है। जो जितना जड़ हो गया, वह उतना ही उपभोग्य हो गया, पर जिसने अपनी चेतना का जितना अधिक परिष्कार कर लिया, वह उतना ही उपभोक्ता अर्थात् महामानव- देवमानव होता चला जाता है। 
      आत्मा एक दिव्य चेतना स्फुल्लिंग है। जिसका विकास ही मानव के लिए अभीष्ट है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन- मनन से लेकर और जप- तप एवं योगाभ्यास परक ध्यान, धारणा, समाधि की समस्त प्रक्रियाओं का निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये हैं। इस प्रकार अपूर्णता से पूर्णता की ओर जब कदम बढ़ चलते हैं, तब जीवन का वह स्वरूप बन जाता है, जिसमें आत्मा भाव बंधनों से मुक्त होकर नर- नारायण बनने की ओर प्राणि यात्रा को अग्रगामी कर पाती है। 


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