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विश्वविख्यात तीर्थ नगरी हरिद्वार में करीब- करीब सभी धर्म- सम्प्रदायों के मठ, मंदिर एवं आश्रम देखने को मिलते हैं। समय- समय पर इनसे जुड़े भक्त गण यहाँ आकर तीर्थ यात्रा का लाभ प्राप्त करते हैं। तीर्थ नगरी की सबसे बड़ी विशेषता है पतित पावनी भागीरथी का अविरल प्रवाह। जिसका अवगाहन करके लोग अपने आपको धन्य हुआ अनुभव करते हैं। 
      तीर्थ यात्रा की हमारी प्राचीन परंपरा रही है, इसलिए भारत को तीर्थों का देश कहा जाता है। इस तीर्थ परंपरा को हमारे पूर्वज ऋषियों ने गहन चिंतन- मनन करके प्रचलित किया था। तीर्थ यात्रा का उद्देश्य मनुष्य से जाने- अनजाने में हुई गलतियों का परिमार्जन एवं भविष्य का सुनिश्चित निर्धारण करना था, ताकि मनुष्य सांसारिक जीवन में रहकर भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति कर सके और मनुष्य जीवन के लक्ष्य की ओर द्रुतगति से बढ़ सके। लेकिन आज इस पुण्य परंपरा के मूल उद्देश्य को भुला दिया गया जैसा लगता है। कुछ लोग तीर्थों में पिकनिक मनाने जैसे उद्देश्य को लेकर जाते हैं और तीर्थ यात्रा के मूल लाभ से वंचित रह जाते हैं, इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। 
      प्राचीन काल में तीर्थ ऐसे साधना- केन्द्रों के रूप में स्थापित एवं विकसित किये गये थे, जिनसे अंतराल की गहरी परतों का उपचार, परिष्कार एवं उत्कर्ष संभव हो सके। इस प्रक्रिया को एक प्रकार से उपयोगी वातावरण में बने हुए साधना सम्पन्न मूर्धन्य चिकित्सकों से भरे- पूरे सैनेटोरियम की उपमा दी जा सकती है। अंतर इतना ही है कि वे उपचार केन्द्र स्वास्थ्य लाभ भर दे सकते हैं, जबकि तीर्थों से न केवल चिंतन को मोड़ने- मरोड़ने वाली स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्चा चलती है, वरन् मेजर आप्रेशनों, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अंतःकरण को- अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्र को सुधारने व सँभालने का कार्य तीर्थों में होता रहता है। उसकी कुछ- कुछ तुलना ब्रेन वाशिंग से की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमता को उभारने वाले, व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बनाने वाले एवं उपचार व अभ्यास केन्द्रों के रूप में महामनीषियों ने तीर्थों की स्थापना की थी और यह स्थापना पूर्ण तथा सफल भी रही थी। 
      अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रणेता पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा ने अपने कठोर तपःशक्ति से ऐसे ही एक तीर्थ की स्थापना की, जो सारी दुनिया में गायत्री तीर्थ- शांतिकुंज के नाम से विख्यात है। इस तीर्थ की विशेषता यह है कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के उन्नयन के जो पाँच सशक्त आधार हैं- उन पाँचों का समन्वित स्वरूप यहाँ प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। सांस्कृतिक चेतना के पाँच आधार हैं- १- तीर्थ, २- गुरुकुल, ३- आरण्यक, ४- आश्रम एवं ५- देवालय। 
      तीर्थ अर्थात् जो वातावरण से शिक्षण देते हैं। अथर्ववेद में लिखा है- ‘जिस प्रकार यज्ञ कर्त्ता, यज्ञ के माध्यम से बड़ी- बड़ी आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करता है, उसी प्रकार श्रद्धालु तीर्थयात्रा, तीर्थसेवन द्वारा निष्पाप बनता है।’ तीर्थ की जीवंतता वहीं सिद्ध होती है, जिस परिसर में गहन तप विद्यमान हो, उस तप को प्रवाहित बनाने के लिए अखण्ड दीपक एवं अखण्ड अग्रि प्रज्वलित हो। प्रातः, मध्याह्न व सायं तीनों संध्याएँ तथा तीनों संध्याओं के साथ सत्संग सम्पन्न होता हो। गायत्री तीर्थ- शांतिकुंज में यह सभी सहज उपलब्ध है। यहाँ आने वाले साधक विभिन्न साधनाओं के माध्यम से तीर्थ चेतना को आत्मसात् करते हैं। 
      गुरुकुल उसे कहते हैं, जहाँ बाल्यावस्था से ही शिक्षण क्रम चलता रहता है। शांतिकुंज में चलने वाले विविध प्रशिक्षण सत्रों यथा- संजीवनी साधना सत्र, युग शिल्पी सत्र, व्यक्तित्व परिष्कार आदि सत्रों के माध्यम से भारतीय ऋषि परंपरा का शिक्षण लेकर लोग अपने जीवन का कायाकल्प करते हैं। 
      आरण्यक विद्या विस्तार हेतु व्यक्तित्व- सम्पन्न शिक्षकों का निर्माण तंत्र है। प्राचीन काल में लोग आरण्यक परंपरा के माध्यम से अपने जीवन का स्वर्णिम समय समाजहित में नियोजित करते थे, उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए वानप्रस्थ संस्कार कराकर शांतिकुंज में प्रति माह चलने वाले परिव्राजक प्रशिक्षण सत्र एवं वानप्रस्थ सत्र में भाग लेकर के समाज हित, राष्ट्रहित की भावना के साथ साधक देश- विदेश में भारतीय संस्कृति की पुनः स्थापना हेतु प्रव्रज्या करते हैं। जीवन का गहन शोध कर सद्गृहस्थों से लेकर मानव मात्र के लिए व्यावहारिक अध्यात्म के सूत्र देने वाली व्यवस्था का नाम आश्रम है। 
      आश्रम एक प्रकार से अन्वेषण केन्द्र माने गये हैं। आश्रमवासी मुनि- मनीषी कहलाते हैं, जो अपने समाज की विकृतियों को दूर करने और उसके सतत विकास के लिए विविध प्रकार के प्रयोग- परीक्षण करते हैं। देवालय उन्हें कहते हैं, जो जन जागृति का केन्द्र हैं, जहाँ से सत्प्रवृत्ति संवर्धन की प्रक्रिया सतत चलती रहती है। 
देवालय का कर्त्तव्य- उत्तरदायित्व दो भागों में बँटा रहता है। पहला स्थानीय गतिविधियों को लोक शिक्षण परक बनाये रहना। साथ ही पाठशाला, व्यायामशाला, कथा सत्संग, धर्मानुष्ठान, पुस्तकालय, चिकित्सालय आदि रचनात्मक गतिविधियों को प्रखर बनाये रखना। दूसरा सम्पर्क क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति संवर्धन का पौरोहित्य करना। इस निमित्त उस क्षेत्र की जनता के साथ सम्पर्क साधने और घनिष्ठता रखने की आवश्यकता पड़ती है, जिसके लिए देवालय के संचालक निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं। वे स्थानीय व क्षेत्रीय व्यवस्था को समान महत्त्व देते हैं। सांस्कृतिक चेतना उन्नयन के उक्त पाँचों आधारों की समस्त गतिविधियों को पूरे विश्व में तेजी से पहुँचाकर विश्व शांति एवं वसुधा पर स्वर्ग सृजन की भूमिका में सतत संलग्न हैं 

गायत्री तीर्थ- शांतिकुंज। 


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