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भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है- जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन को सार्थक बनाने हेतु संस्कारों द्वारा सतत शोधन तथा आत्मसत्ता के अभिवर्धन की अभिनव व्यवस्था। मानव कल्याण की महान् परंपराओं में जितने भी आयोजन एवं अनुष्ठान हैं, उनमें सबसे बड़ी परंपरा संस्कारों की है। यह वे आध्यात्मिक उपचार हैं, जिनके माध्यम से मनुष्य को सुसंस्कृत बनाना अधिक सम्भव और सरल है। संस्कृति के अंतर्गत जीवनक्रम में इन्हें इस प्रकार समाविष्ट कर दिया गया है कि यथासंभव वांछित श्रेष्ठ संस्कार व्यक्ति को स्वयमेव मिलते रहें और वह अनगढ़ नर- पशु से ऊँचा उठकर नर- मानव और नर- नारायण स्तर तक पहुँच सके ।। 
      भारतीय तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने समय- समय पर मनुष्य को विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों द्वारा सुसंस्कृत बनाने की महत्त्वपूर्ण पद्धति विकसित की। वे इस तथ्य से भली- भाँति परिचित थे कि बार- बार तपाये जाने- सुसंसकारित किये जाने से मनुष्य के संचित कुसंस्कार नष्ट होते और उनके स्थान पर उत्कृष्टता की पक्षधर दैवी विशेषताओं के अंकुर उगते, पल्लवित, पुष्पित होते हैं, जिससे मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता है। यों तो किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ- बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यतः ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त तत्त्ववेत्ताओं ने मनुष्य की अंतःभूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसित करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का आविष्कार किया है, जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अंतःकरण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर बढ़ने की सहायता मिलती है। 
      प्राचीन गुह्य सूत्रों में संस्कारों के विधि- विधानों का सुविस्तृत वर्णन है। संस्कारों का मुख्य उद्देश्य ही आध्यात्मिक जीवन और धार्मिकता के भावों की वृद्धि करना है। वस्तुतः संस्कार- प्रक्रिया का एक ही अर्थ है सद्गुणों को आधीन करना और दोष- दुर्गुणों को निकालना। संस्कार पद्धति को एक प्रकार से मनोविकारों के निराकरण की विज्ञान सम्मत आध्यात्मिक चिकित्सा प्रणाली भी कहा जा सकता है। प्राचीन ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। यही संस्कारों का सांस्कृतिक प्रयोजन भी है। 
      आर्य संस्कृति के अनुसार वेद, स्मृति, तन्त्र में सब मिलाकर ४८ संस्कार पाये जाते हैं, किन्तु इनमें १६ प्रमुख हैं। परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने षोडश संस्कारों को युगानुकूल बनाकर इन्हें धर्मतंत्र से लोकशिक्षण का एक अनिवार्य अंग बनाते हुए न केवल प्रगतिशील बनाया, अपितु विज्ञान सम्मत प्रतिपादनों द्वारा इन्हें व्यापक स्तर पर संपन्न किए जाने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया को भी जन्म दिया। एक तरह से खर्चीले कर्मकाण्डों व अनावश्यक भागदौड़ से भरे इन कृत्यों को सस्ता एवं जन सुलभ बनाकर इनको पुनर्जीवन दिया। इन संस्कारों को युगानुकूल बनाते हुए अब इनकी संख्या घटाकर दस कर दी गयी है, जो आज की दृष्टि से अत्यंत अनिवार्य एवं व्यावहारिक है। दो संस्कार नए जोड़े गये हैं, जो आज के प्रचलन के अनुरूप है। वे हैं जन्मदिवस और विवाह दिवसोत्सव संस्कार। 
      गायत्री परिजनों ने जिन बारह संस्कारों को जन- जन तक लोकप्रिय बनाया तथा इन्हें सम्पन्न किए जाने की विराट् स्तर पर व्यवस्था की है- वे इस प्रकार हैं।            १ पुंसवन संस्कार, 
२ नामकरण संस्कार,
३ अन्नप्राशन संस्कार,
४ मुण्डन (चूड़ाकर्म) संस्कार, 
५ विद्यारंभ संस्कार, 
६ यज्ञोपवीत संस्कार, 
७ विवाह संस्कार, 
८ वानप्रस्थ संस्कार, 
९ अंत्येष्टि संस्कार, 
१० मरणोत्तर श्राद्ध संस्कार, 
११ जन्म दिवस संस्कार, 
१२ विवाह दिवस संस्कार। 
      ये सभी संस्कार गायत्री परिवार के तत्त्वावधान में शांतिकुंज तथा विश्व के कोने- कोने में फैले गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों में तथा प्रज्ञा मण्डलों द्वारा हजारों की संख्या में निःशुल्क परन्तु पूर्ण विधि- विधान के साथ सम्पन्न कराये जाते हैं। शांतिकुंज में यह प्रक्रिया नित्य संचालित होती है। एतदर्श संस्कार प्रकोष्ठ की पृथक् व्यवस्था है। देश विदेश के कोने- कोने से काफी संख्या में लोग विविध संस्कार कराने हेतु शांतिकुंज आते हैं। शांतिकुंज में नित्य प्रातःकाल यज्ञ के साथ ही निर्धारित स्थानों में सभी तरह के संस्कार समूह में कराये जाते हैं। 
      गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में जुलाई २००३ में कुल ३५७९- संस्कार सम्पन्न कराए गये। इसमें २२७ वानप्रस्थ, १४४ मुण्डन तथा १०५ शिखा स्थापन के संस्कार सम्पन्न हुए। साथ ही पुंसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारंभ, उपनयन, विवाह, जन्मदिवसोत्सव, विवाह दिवसोत्सव के संस्कार भी सम्पन्न कराए गये। इसके अतिरिक्त १५८३ परिजनों ने गायत्री मंत्र की विधिवत् दीक्षा ली तथा कुछ परिजनों ने देव स्थापन एवं वेदस्थापन भी कराए। सर्वाधिक संस्कार गुरू पूर्णिमा के पावन पर्व पर १२ जुलाई को सम्पन्न कराए गये। 


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