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किसी भी राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है, उसे ही जनमानस की भी भाषा होनी चाहिए। जब तक राष्ट्रभाषा, लोकभाषा का रूप नहीं ले लेती, तब तक उस भाषा का पूर्ण विस्तार संभव नहीं होता। राष्ट्रभाषा उस देश की सांस्कृतिक अस्मिता होती है और उसमें उस राष्ट्र की प्रगति समाहित होती है। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, जो विश्व की सशक्त भाषाओं में से एक है। हमें स्वतंत्र हुए, आधी शती से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी हम राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रगति के मामले में वही कदम ताल करते नजर आते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी के नाम पर ढोल तो बहुत पीटा जाता है, काफी हो हल्ला, शोरगुल भी होता है, लेकिन सब कुछ ढाक के तीन पात होकर रह जाता है। हिन्दी हमारी मजबूरी की सीमाओं के आगे एक कदम भी आगे खिसक नहीं पाती और थोड़ी बहुत मजबूरी में आगे बढ़ती दिखाई जाती है, तो वह भी दिन भर में चले अढ़ाई कोस की विवशतापूर्ण स्थिति नजर आती है। यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मामले में सर्वथा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। 
      हिन्दी अपनी राष्ट्रभाषा है। भारत के बहुसंख्यक समुदाय की मातृभाषा हिन्दी है। इसलिए हिन्दी को भारत की लोकभाषा कहना अतिशयोक्तिपूर्ण कथन नहीं होगा। हिन्दी सशक्त तो है ही, साथ ही समृद्धिशाली भी है। हिन्दी का एक बृहत् शब्दकोष है, जो कि दुनिया की दूसरी भाषाओं की तुलना में कमजोर नहीं है। हिन्दी आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। हिन्दी का एक महत्त्वपूर्ण आधार है, उसके द्वारा राष्ट्र की संस्कृति और परम्पराओं को विकासशील दिशा में आगे बढ़ाना है। भारतीय लोक संस्कृति और राष्ट्रीयता में एकरूपता हिन्दी के माध्यम से ही संभव दिखाई देती है। वैसे भी हिन्दी इस देश की सशक्त प्रभावी लोकसम्पर्क भाषा तो है ही इसके साथ ही उसे राष्ट्रभाषा के साथ राजभाषा का भी दर्जा प्राप्त है। यदि हमें आने वाली पीढ़ी को प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर सौंपनी है, तो हिन्दी का ही सहारा लेना होगा। भारत की आत्मा का स्वर अमर भारती की यह लाडली हिन्दी ही सुना सकती है, समझा सकती है। 
      अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में भारतीय गौरव का सम्मान करने वाले ओडोलेन स्मेकल ने सहज कहा था- हिन्दी और संस्कृति में समस्त भारत की आत्मा मुखरित होती है। किसी भी राष्ट्र के एकीकरण के लिए सर्वमान्य भाषा से अधिक बलशाली कोई तत्त्व नहीं है। किसी भी राष्ट्र को राष्ट्रध्वज की तरह राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। सिद्धान्त रूप में हिन्दी को अग्रणी स्थान प्राप्त है, लेकिन क्या यह व्यवहार में आ पाया है? 
      अपनी सम्पूर्ण विशेषताओं और उपयोगिताओं के बावजूद व्यवहारतः हिन्दी राष्ट्रीय एकता का एक सशक्त माध्यम नहीं बन पायी है, यह दोष किसका है? राष्ट्र को राष्ट्रीयता की संजीवनी देने वाली हिन्दी तो स्वतंत्रता के पूर्व ही उद्भावित हो गयी थी, फिर पल्लवित क्यों नहीं हुई? 
      इन प्रश्रों के उत्तर में हमारे कथित विज्ञजन हिन्दी की सामर्थ्य को दोष देते हैं। आज भी अनेक भारतवासियों को हिन्दी की सुग्राह्यता अंग्रेजी से कम लगती है। उन्हें शायद मालूम नहीं कि अंग्रेजी थोपने के असफल प्रयासों के बावजूद अंग्रेज शासकों ने इसकी सामर्थ्य को स्वीकारा था। सन् १९०१ की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया था- हिन्दी में अभिव्यक्ति की ऐसी सामर्थ्य है,जो अंग्रेजी से किसी प्रकार कम नहीं है। आज शब्द भण्डार, साहित्य और अभिव्यक्ति की सामर्थ्य में हिन्दी श्रेष्ठतम स्थान रखती है। उपलब्ध साहित्य की विविधता, चिंतन के प्रवाह के स्तर और ज्ञान- विज्ञान की परिधि, विभिन्न विषयों में अभिव्यक्ति क्षमता, समानान्तर शब्दों का अकूत भंडार को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि हिन्दी किसी भी भाषा से कम नहीं है। हिन्दी की सामर्थ्य का द्योतक है इसकी देवनागरी लिपि। विश्व प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी आइजक पिटमेन के शब्दों में संसार में यदि कोई सर्वांगपूर्ण अक्षर है, तो देवनागरी के हैं। 
      आज अंग्रेजी और हिन्दी का द्वन्द्व जिस तरह भारतीय जनमानस में छाया है, उसका मूल कारण मात्र यही है कि हर एक के मन- मस्तिष्क में यह धारणा गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं कि अंग्रेजी की बैसाखी के लगाये बिना प्रगति की दौड़ में शामिल नहीं हुआ जा सकता, पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि बैसाखी के सहारे चला जा सकता है, दौड़ा नहीं जा सकता। दौड़ना है तो स्वयं के डगों में शक्ति और सामर्थ्य चाहिए। यहाँ स्वयं के डगों की बात इसलिए कहना पड़ता है कि किसी की मातृभाषा ही उसकी स्वयं की वह शक्ति हो सकती है, जिसके आधार पर सृजन योग्य मौलिक चिन्तन का जन्म होता है। दूसरी भाषा लादने से उसका अपेक्षित विकास नहीं हो पाता। 
       पर किसे लेना- देना है? बच्चे के मौलिक विकास से या उसकी विद्वत्ता से। खैर, दोष मात्र अभिभावकों का ही नहीं है, क्योंकि अंग्रेजी की जकड़ दिन प्रतिदिन इतनी मजबूत होती जा रही है कि उससे बचना कम संभव लगता है। कार्यालयों से लेकर सड़क तक अंग्रेजी इस तरह हावी हो गयी है कि अब लगता है कि जैसे हिन्दी विदेशी भाषा हो। 
      यह सोचकर और अधिक कष्ट होता है कि संस्कृति की जिस महानता के बल पर भारत सिरमौर रहा, कहीं वह गौरव इस अंग्रेजियत की आँधी में लुप्त न हो जाये। प्रश्र भाषा का कम, भावों का अधिक है। इस बहुरंगी देश में बहुरूपों में बिखरी हिन्दी जो कहीं ‘तुम्हारे को आना पड़ेगा’ तो कहीं ‘का जा रिया है,’ के अपने टूटते रूपों से एक दूसरे को जोड़ देती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक गुजरात से असम तक हिन्दी इस देश के जन- जन की सम्पर्क भाषा है। इसका विकास- विस्तार हो, इसका भण्डार और समृद्ध हो, इस हेतु यदि सकारात्मक प्रयास किये जाते हैं, तो हिन्दी दिवस की सार्थकता है। अन्यथा मात्र आयोजन कर उसका गुणगान कर लेने मात्र से हिन्दी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ने वाला। हिन्दी अपने देश में जहाँ है, जैसे है, पड़ी रहेगी। लेबल जरूर लगा रहेगा राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा का लेकिन हकीकत में हिन्दी दिन ब दिन कुचलती जाएगी। हिन्दी के देश में हिन्दी की इतनी दुर्दशा शर्मनाक है। समय रहते इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए अन्यथा मैकाले का मकसद तो पूरा होकर ही रहेगा। 


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