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हमारे देश में कुल ३०६ विवि हैं। देवभूमि उत्तरांचल में कुल ७ विवि हैं। इनमें से तीन विवि प्रसिद्ध तीर्थ नगर हरिद्वार में ज्ञानदान का पुण्य कार्य कर रहे हैं। इन तीन में एक देसंविवि है जिसकी स्थापना अभी दो वर्ष पहले ही हुई थी। कम समयावधि में ही देसंविवि ने आदर्शों के उच्च मानक प्रस्तुत करते हुए एक कीर्तिमान स्थापित किया है। यह विवि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य की वैचारिक पृष्ठभूमि पर आधारित, विश्वविख्यात सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संस्था शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा संचालित एक अनुपम शिक्षण- प्रशिक्षण और शोध संस्थान है, जिसमें मानव जीवन से जुड़े- गुँथे विद्यापरक ज्ञान, विज्ञान और तकनीकी विषयों के अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान की व्यवस्था है। शरीर, मन, प्राण, आत्मा, प्रकृति, पदार्थ, व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के बहुमुखी विकास के शिक्षण की गौरव गरिमा इसका निहितार्थ है। 
      प्रतिभा परिष्कार, क्षमता विकास, सामर्थ्य वृद्धि, आत्मबल संवर्धन, चारित्रिक सम्पन्नता, व्यावहारिक निपुणता द्वारा बहुमुखी व्यक्तित्व विकास और आत्म निर्भरता इस विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की मौलिक विशेषता है। इसमें ज्ञान की विविध धाराओं धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य तथा विज्ञान की जीवन उपयोगी धाराओं, ज्योतिष, आयुर्वेद, मंत्र विज्ञान, योगशास्त्र, मनोविज्ञान आदि के सम- सामयिक विषयों पर शिक्षण- प्रशिक्षण और शोध की व्यवस्था है। 
      स्वस्थ जीवन के लिए शरीर की बाह्य और आन्तरिक जानकारी, चिकित्सा, परिचर्या, आहार, विहार, संयम, नियम, आसन, व्यायाम, प्राणायाम आदि के व्यावहारिक रूप यहाँ के दैनन्दिन क्रियाकलापों में सम्मिलित हैं, जिससे विश्वविद्यालय के विद्यार्थीगण सतत लाभान्वित हो रहे हैं। उनके लिए यहाँ का रहन, सहन आचार, विचार आहार- विहार, आमूल परिवर्तनकारी तथा अद्भुत रूप से लाभकारी तो है ही, एक अनुपम सार्थक अनुभूति भी है। 
      पाठ्यक्रम में ऐसे विषयों का समावेश किया गया है, जिससे विद्यार्थियों के स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता, विनम्रता, सज्जनता का सतत विकास हो। वे उत्साही, आशावादी, साहसी, उदार, धीर, गम्भीर, दूरदर्शी बनकर विजयश्री का वरण करने में समर्थ सिद्ध हो सकें। उनमें चिंता, भय, निराशा, हताशा, शोक, आवेश, अहंकार, ईर्ष्या- द्वेष के बीज अंकुरित न हो सकें। उनमें क्षुद्रता, संकीर्णता के स्थान पर विराट् विश्व दृष्टि का अभ्युदय हो। वे नर से नारायण बनने की ओर सतत अग्रसर रहें, यही विश्वविद्यालय की परिकल्पना है। 
      देवसंस्कृति विवि अपनी इस परिकल्पना के अनुरूप साकार स्वरूप धारण करता जा रहा है। चाहे विश्वविद्यालय परिसर का स्वरूप हो, अथवा आंतरिक कार्यकारी व्यवस्था, चाहे विश्वविद्यालयीन कर्मी हों या विद्यार्थी- शिक्षक समुदाय, सर्वत्र एक नवीनतम उत्साहवर्धक वातावरण दिखाई देता है। सभी देवसंस्कृति के आशावादी चिंतन के अनुरूप अपने आपको, अपने क्रियाकलापों को, अपने चिंतन को नवीनतम दिशाधारा की ओर ले जाने के लिए सतत सक्रिय नजर आते हैं। सभी में अनुपम उत्साह है, उमंग है और पूर्ण आत्मविश्वास है कि वे देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की गरिमामयी चिंतन धारा के अनुरूप अपने- आपको ढालने में निश्चित रूप से समर्थ होंगे। यही कारण है कि देवसंस्कृति विवि के परिसर में प्रवेश करते ही अन्य शिक्षण संस्थाओं की अपेक्षा एक नवीनतम अनुपम दैविक अनुभूति होती है, जो अन्यत्र दुर्लभ है। चाहे वेशभूषा हो या व्यवहार, चाहे शिक्षण व्यवस्था हो या कार्यालयीन व्यवस्था, सर्वत्र एक गरिमामय वातावरण नजर आता है। इसकी पृष्ठभूमि में है समर्पित आध्यात्मिक रुझान अपने- अपने कार्य दायित्व शिक्षण, अध्यापन, अध्ययन के प्रति। यही देवसंस्कृति विवि का सार्थक गरिमामय परिवेश है, जो एक आशावादी चिंतन को अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख एवं कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या जी के कुशल संरक्षण एवं मार्गदर्शन में साकार स्वरूप प्रदान करता स्पष्ट नजर आ रहा है। यह तो शुरुआत है, नूतन लक्ष्य दिशा की ओर उठा पहला कदम है,जो आने वाले समय के लिए निश्चित रूप से प्रेरणादायी सिद्ध होगी। वैसे भी देवसंस्कृति विश्वविद्यालय अपने अनूठेपन और सुषमा के कारण दर्शनीय स्थल के रूप में भी विख्यात हो गया है, जिसे देखने हजारों पर्यटक यहाँ आते रहते हैं। यहाँ के विद्यापरक शिक्षण और विद्यार्थियों के अनुशासन को देख सभी अभिभूत हो जाते हैं। यहाँ के विद्यार्थियों में जो उत्साह, उमंग और अनुशासन देखने को मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। निश्चय ही देवसंस्कृति विश्वविद्यालय अपने नाम के अनुरूप दिव्य संस्कार से ओत- प्रोत नजर आता है। 


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