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ईश्वरीय अनुभूति करने में प्रमाद कर रहे लोगों को महर्षि चेतावनी देते हैं कि विघ्नों के क्रम की इति यहीं तक नहीं है। ये और भी हैं। योग साधना के अन्य विक्षेपों का खुलासा करते हुए महर्षि अपना सूत्र प्रकट करते हैं- 
दुःखदौर्मनस्याङ्ग्रमेजयत्वश्वास- प्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥ १/३१ 

अर्थात्- दुःख, निराशा, कंपकंपी और अनियमित श्वसन विक्षेपयुक्त मन के लक्षण हैं। 
      महर्षि कहते हैं कि दुःख, निराशा, कंपकंपी एवं अनियमित श्वसन बीमार मन के लक्षण है। यानि कि यदि मन बीमार है तो ये पाँचों अनुभूतियाँ किसी न किसी तरह से होती रहेंगी। इन लक्षणों में प्रत्येक लक्षण मन की बीमार दशा का बयान करता है। उदाहरण के लिए दुःख- इसका मतलब है कि मन तनाव से भरा है, बंटा- बिखरा है। और यह बंटा- बिखरा मन निराश ही होगा और जो सतत उदास- निराश होता है उसकी जैविक ऊर्जा का परिपथ हमेशा गड़बड़ होता है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर में बहने वाली जैव विद्युत् कभी भी ठीक- ठीक नहीं बहती और देह में एक सूक्ष्म कंपकंपी शुरू हो जाती है। और जब प्राण ही कंपायमान है तो भला श्वास नियमित कैसे होगा? अब यदि इन सभी लक्षणों को दूर करना है तो उपाय एक ही है कि मन स्वस्थ हो जाय। मन की बीमारी समाप्त हो जाय। 

      इसके लिए उपाय एक ही है- मंत्र जप। मन यदि मंत्र के स्पर्श में आए अथवा मन में यदि मंत्र स्पन्दित होने लगे तो समझो कि मन की बीमारी ज्यादा देर तक टिकने वाली नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी अपनी आध्यात्मिक गोष्ठियों में इस सम्बन्ध में बड़ी अद्भुत बात कहते थे। उनका कहना था कि- बेटा, मंत्र मन का इन्जेक्शन है। देह की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक देह में इन्जेक्शन लगाते हैं। 

      पूज्य गुरुदेव कहते थे कि मंत्र ऐसा इन्जेक्शन है जो मन में लगाया जाता है। इस इन्जेक्शन का प्रयोग मंत्रविद्या के मर्मज्ञ या आध्यात्मिक चिकित्सक करते हैं। इसके प्रयोग के तीन तरीके हैं। १. स्थूल वाणी के द्वारा, २. सूक्ष्म वाणी के द्वारा एवं ३. मानसिक स्पन्दनों के द्वारा। इसमें से पहला तरीका सबसे कम असर कारक है। यदि कोई बोल- बोल कर जप करे तो असर देर से होता है। इसकी तुलना में दूसरा तरीका ज्यादा असरकारक है। यानि कि जप यदि अस्फुट स्वर में उपांशु ढंग से मानसिक एकाग्रता के साथ किया जाय तो असर ज्यादा गहरा होता है। इन दोनों तरीकों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है मंत्र जप का तीसरा तरीका कि वाणी सम्पूर्णता शान्त रहे और मंत्र मानसिक स्पन्दनों में स्पन्दित होता रहे। इसका असर व प्रभाव बहुत गहरा होता है। 

      इस अन्तिम तरीके की खास बात यह है कि मंत्र का इन्जेक्शन सीधा मन में ही लग रहा है। मन के विचारों के साथ मंत्र के विचार- स्पन्दन घुल रहे हैं। यदि मंत्र गायत्री है तो फिर यह असर हजारों- लाखों गुना ज्यादा हो जाता है। इसके प्रभाव के पहले चरण में मन की टूटी- बिखरी लय फिर से सुसम्बद्ध होने लगती है। मन में मंत्र के अनुरूप एक समस्वरता पनपती है। मानसिक चेतना में मंत्र नए प्राणों का संचार करता है। इसकी शिथिलता- निस्तेजता समाप्त होती है। एक नयी ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है। यह प्रक्रिया अपने अगले चरण से प्राणों की खोयी हुई लय वापस लाती है। जैव विद्युत् का परिपथ फिर से सुचारू होता है। और प्राणों की अनियमितता समाप्त हो जाती है। 

      मंत्र जप करने वाले साधक की सबसे पहले मानसिक संरचना में परिवर्तन आते हैं। उसका मन नए सिरे से रूपान्तरित, परिवर्तित होता है। इस रूपान्तरण में दुःख, प्रसन्नता में बदलता है और निराशा उत्साह में परिवर्तित होती है। प्रक्रिया के अगले चरण में प्राण बल बढ़ने से कंपकंपी दृढ़ता एवं बल में बदल जाती है। और श्वास की गति धीमी व सम होने लगती है। ये ऐसे दिखाई देने वाले अनुभव हैं- जिन्हें गायत्री मंत्र का कोई भी साधक छह महीनों के अन्दर कर सकता है। शर्त बस यही है कि गायत्री मंत्र का जप पं० श्रीराम शर्मा आचार्यजी द्वारा विरचित गायत्री महाविज्ञान में दी गई बारह तपस्याओं का अनुशासन मानकर किया जाय। यह हो सका तो अन्तर्यात्रा मार्ग पर प्रगति का चक्र और तीव्र हो जाएगा। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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