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समाधि की अवस्था को पाने के लिए पूर्व वर्णित तत्त्वों एवं सत्यों का जीवन में तीव्रतर होते जाना जरूरी है। सारा सुफल इस तीव्रता का ही है। महर्षि कहते हैं- तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ १/२१॥ 

अर्थात्- समाधि की सफलता उनके निकटतम होती है, जिनके प्रयास तीव्र, प्रगाढ़ और सच्चे होते हैं। 
       महर्षि के इस सूत्र में अनगिनत योग साधकों की सभी शंकाओं, समस्याओं, संदेहों एवं जिज्ञासाओं का समाधान है। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले साधकों के मन में कभी न कभी यह बात अंकुरित हो जाती है कि इतने दिन हो गये साधना करते, बरस बीत गये गायत्री जपते, अथवा साल गुजर गये ध्यान करते, पर कोई परिणाम नहीं प्रकट हुआ। वह बात नहीं पैदा हुई जो सारे अस्तित्व को झकझोर कर कहें कि देखो यह है साधना का चमत्कार और जब ऐसा नहीं होता है तो कई परमात्मा पर ही शक करने लगते हैं। मजे की बात यह कि उन्हें अपने पर शक नहीं होता- मेरी साधना में कहीं कोई भूल तो नहीं? नाव ठीक चलती तो मेरी पतवारें गलत तो नहीं है? दूसरा किनारा है या नहीं, इस पर संदेह होने लगता है। 
      मगर ध्यान रहे, जिस नदी का एक किनारा है, दूसरा दिखाई पड़े या न पड़े, होगा ही, बल्कि है ही। कोई नदी एक किनारे की नहीं होती। उस दूसरे किनारे का नाम समाधि है, इस किनारे का नाम संसार है। संसार और समाधि के किनारों के बीच जीवन की यह अन्तःसलिला, यह गंगा बह रही है। अगर ठीक से नाव चलाई जाय, सही ढंग से साधना की जाय तो समाधि निश्चित है। 
परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्यजी इस बारे में एक कहानी सुनाते थे। एक साधु थे बनारस में नाम था हरिबाबा। उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा कि मैं बहुत जप- तप करता हूँ, पर सब अकारण जाते हैं। भगवान् है भी या नहीं मुझे संदेह होने लगा है। हरिबाबा ने इस बात पर जोर का ठहाका लगाया और बोले- चल मेरे साथ आ, थोड़ी देर गंगा में नाव चलायेंगे और तेरे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा। 
      बाढ़ से उफनती गंगा में हरिबाबा ने नाव डाल दी। उन्होंने पतवार उठाई, पर केवल एक। नाव चलानी हो तो दोनों पतवारें चलानी होती हैं, पर वह एक ही पतवार से नाव चलाने लगे। नाव गोल- गोल चक्कर काटने लगी। शिष्य तो डरा- पहले तो बाढ़ से उफनती गंगा उस पर से गोल- गोल चक्कर। वह बोला- अरे आप यह क्या कर रहे हैं, ऐसे तो हम उस किनारे कभी भी न पहुँचेंगे। हरिबाबा बोले- तुझे उस किनारे पर शक आता है या नहीं? शिष्य बोला- यह भी कोई बात हुई, जब यह किनारा है तो दूसरा भी होगा। आप एक पतवार से नाव चलायेंगे तो नाव यूँ ही गोल चक्कर काटती रहेगी। यह एक दुष्चक्र बनकर रह जायेगी। 
       हरिबाबा ने दूसरी पतवार उठा ली। अब तो नाव तीर की तरह बढ़ चली। वह बोले- मैं तुझसे भी यही कह रहा हूँ, कि तू जो परमात्मा की तरफ जाने की चेष्टा कर रहा है- वह बड़ी आधी- अधूरी है। एक ही पतवार से नाव चलाने की कोशिश हो रही है। आधा मन तेरा इस किनारे पर उलझा है, आधा मन उस किनारे पर जाना चाहता है। तू आधा- आधा है। तू बस यूँ ही कुनकुना सा है। जबकि साधना में साधक की जिन्दगी खौलती हुई होनी चाहिए। 
      गुरुदेव कहते थे- साधना भी और वासना भी, बस आधा- आधा हो गया। यह आधापन छोड़ना ही पड़ेगा। साधना करनी है तो पूरी साधना करो। तीव्र, प्रगाढ़ और सच्ची। साधक की साधना धुएँ से धुधुँआती आग नहीं, धधकती हुई ज्वालाएँ होनी चाहिए। साधना जिस किसी तरह न करके उसे तीव्रतम और प्रचण्डतम होना चाहिए। 
      उन्माद की परिपक्वता के लिए- पागलपन पूरा होना चाहिए। कच्ची चाहत से काम चलने वाला नहीं है; चाहत पक्की होनी चाहिए। भला ऐसे धीरे- धीरे क्या चलना? एक पाँव इधर तो एक पाँच उधर। समय के नृत्य को और तेज करो। अब समय ज्यादा नहीं है, चूको मत- जल्दी करो तेजी लाओ। साधना अपनी पूरा त्वरा पर ही होनी चाहिए। सौ डिग्री पर पानी उबलता है तो भाप बन पाता है। साधना भी जब सौ प्रतिशत होती है तो अहंकार विलीन हो जाता है। सम्पूर्णता में पहुँचना ही होगा। इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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