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पदार्थ और चेतना सांसारिक रचना के दो मूलभूत तत्त्व हैं। पदार्थ का संबंध बाहरी ढाँचे से है, जबकि ढाँचे के संयोजन के पीछे काम करने वाली शक्ति चेतना है। साधना इसी चेतन क्षेत्र का व्यवसाय है। संसार के सभी व्यवसाय  पूँजी, परिश्रम और अनुभव के आधार पर चलते हैं और परिस्थिति के अनुरूप उनसे लाभ भी मिलता है। साधना व्यवसाय इन सबसे भिन्न, सरल और लाभप्रद है। इसमें न बाहर की सहायता अपेक्षित होती है, न साधन जुटाने पड़ते हैं और न परिस्थितियों के अनुकूलन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। अपने आपको समझा लेने और सुधार लेने भर से वह प्रयोजन पूरा हो जाता है। जिसमें लाभ ही लाभ है। वह भी इतना असाधारण जिसकी तुलना में अन्य सभी व्यवसायों का लाभांश हल्का पड़ता है। समर्थरामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द जैसे दूरदर्शी अनेक इस साधना व्यवसाय की महत्ता समझते, उसे प्रमुखता देते और समुचित लाभ उठाते रहे हैं। 

यद्यपि साधना के अभ्यासियों को देखते हुए यह भ्रम होता है कि कहीं बाहर से कुछ माँगने-पाने का यह उपक्रम तो नहीं है, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। आवश्यक उपार्जन के लिए स्वयं की पात्रता विकसित कर अपने खेत में ही फसल बोनी और काटनी पड़ती है। वस्तुतः पात्रता का सम्वर्द्धन ही साधना है। इसके लिए जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अंतरंग को परिष्कृत करना होता है। परिष्कृति को योग और व्यवस्थिति को तप कहते हैं। साधना के यही दो क्षेत्र हैं। इसी सिद्धान्त पर सरकस का प्रशिक्षक अनगढ़ जानवरों को प्रशिक्षित करता और उन्हें आश्चर्यजनक करतब दिखाने हेतु अभ्यस्त कर लेता है।  प्रकारान्तर से यही प्रक्रिया जीवन सम्पदा के अनगढ़ और अव्यवस्थित स्वरूप को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए करनी पड़ती है। साधना के समस्त उपचार इसी प्रयोजन के लिए सृजे गये हैं।

पिछड़े और समुन्नत वर्गों के मध्य एक बड़े अंतर को देखने में आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्य प्राणियों की स्थिति का इतना ऊँचा और नीचा  होने का  कारण क्या हो सकता है? इसे ईश्वर का पक्षपात एवं प्रकृति की अंधेर कहने से भी काम नहीं चलता? क्योंकि दोनों की व्यवस्थित एवं सुनियोजित सत्ता में पक्षपात के लिए कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। यदि व्यतिक्रम एवं पक्षपात रहा होता तो ग्रह-नक्षत्र अपनी धुरी पर न घूमते, परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर चूर-चूर हो गये होते। अंधेरगर्दी के रहते न यह सृष्टि बन पाती और न एक दिन चल पाती। अतः इतना तो स्पष्ट है कि सब कुछ पूर्ण व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है। फिर मनुष्यों के बीच पाये जाने वाले अंतर का क्या कारण है? इसका सुनिश्चित उत्तर यही निकलता है कि जीवन को साधा नहीं गया और उथली परतों तक ही उसका वास्ता रहा। इसलिए छिलका ही हाथ लगा, जबकि गहराई में उतरने पर अद्भुत रत्न हाथ लगते, अध्यात्म की भाषा में यही जीवन साधना है। जीवन प्रत्यक्ष फलदायी है। जो इसकी जितनी साधना कर लेता है, वह उतना ही श्रेष्ठ महान् बनता है। जीवन का मूल्य, महत्त्व और उपयोग न समझना ही वह अभिशाप है, जिसके कारण  गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं। 

दूसरे शब्दों में आत्म परिष्कार ही जीवन साधना है। सामान्य स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। यदि उसे उत्कृष्ट बना लिया जाये, उसकी सूक्ष्मता तक प्रवेश पा लिया जाये, तो ऐसा कुछ मिलता है, जिसे विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण कहा जा सके। समुद्र में खारा पानी भरा पड़ा है, पर उसकी गहराई में उतरने वाले मणि मुक्तक ढूँढ़ लेते हैं और निरर्थक दीखने वाला विराट जलाशय उनके लिए  सम्पदा का भाण्डागार बन जाता है। खनिज पदार्थ जब भूमि से निकलते हैं, तो अनगढ़ धूल मिश्रित होते हैं, उस रूप में उनका कोई उपयोग नहीं हो सकता, किन्तु जब उन्हें परिशोधित करके धातुओं के रूप में बना लिया जाता है, तो अति महत्त्वपूर्ण उपकरण बनाने में उनकी उपयोगिता सराहते ही बनती है। पानी भाप बनता है और प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार से स्थूल से सूक्ष्म में जितना गहरा उतरा जाता है, उतने ही रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन होता जाता है। इसी पद्धति से दृश्य जगत् के विज्ञान पर्यवेक्षकों ने विलक्षण शक्तियाँ पायी और उन्हें खोजते हुए सामर्थ्य के साम्राज्य पर आधिपत्य जमाया। 

भौतिक जगत के विभिन्न क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थीअनेकानेक सफलताएँ  इसी आधार पर अर्जित करते देखे जाते हैं। जीवन एक ऐसा ही क्षेत्र है, जिसे जड़-जगत् के किसी भी घटक एवं वर्ग से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। जड़ सीमित है, चेतन असीम है। जड़ से साधन मात्र मिलते हैं, चेतन में आनन्द और उल्लास के सभी भण्डार भरे पड़े हैं। साधना इन दोनों के सुनियोजन का एक सुविस्तृत विज्ञान है। जो भौतिकता के बीच जीवन के उल्लास का मार्गप्रशस्त करती है।

प्रस्तुति- शांतिकुंज


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