img


शब्द एवं ध्वनियों का हमारे जीवन से गहरा संबंध है, भारतीय ऋषियों ने इस संदर्भ में जितना गहन अध्ययन किया, शायद संसार में और किसी ने नहीं किया हो। इसलिए भारतीय मनीषियों  ने ‘शब्द’ को ब्रह्म कहा है- अक्षर ब्रह्म-अक्षरं परमं ब्रह्म। ब्रह्म सर्वव्यापी तेजस् सत्ता का नाम है-जिसकी शक्ति का कोई पारावार नहीं। साधारणतः ये शब्द एवं ध्वनियाँ  हर व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। बच्चे शेर की दहाड़, हाथी की चिघाड़ से घबरा जाते हैं, जबकि उन्हें पता नहीं होता कि शेर हिंसक जीव है। उसी तरह कोयल की कू-कू से प्रसन्नता और कौए की काँव-काँव से कर्कशता का स्वतः भान होता है। यह ध्वनियों का ही प्रभाव है। 

वैज्ञानिकों का मत है कि शब्दों के कंपन न केवल विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करते हैं, वरन् वह कंपन ‘संवहन’ की शक्ति भी रखते हैं। मनुष्य के शरीर में कुछ ऐसी ही चक्र, ग्रन्थियाँ, गुच्छक और उपत्तिकाएँ होती हैं, जो शब्दों की ध्वनियों को अपने-अपने ढंग से प्रभावित और प्रसारित करती हैं। अब तक इस पर अनेक गंभीर खोजें हुईं और मंत्र विज्ञान की एक स्वतंत्र शाखा की स्थापना हुई। 

‘रुद्रयामल’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में मंत्र को परिभाषित करते हुए कहा है- ‘‘जिसका मनन करने से संसार का यथार्थ स्वरूप विदित हो, भाव-बंधनों से मुक्ति मिले, जो सफलता के मार्ग पर अग्रसर करे, उसे ‘मन्त्र’ कहते हैं।’’

मंत्र शक्ति एक विशिष्ट प्रयोग है। इसमें असामान्य प्रभाव उत्पन्न करने के लिए मंत्र जप करने वाले व्यक्ति को सर्वप्रथम आंतरिक धुलाई करनी पड़ती है। परिष्कृत अंतःकरण में ही मंत्र शक्ति का असामान्य प्रभाव अनुभव किया जा सकता है। भाव संवेदना, श्रद्धा-संवेग का जितना उच्चस्तरीय समावेश मंत्र  साधना में होता है, उतना ही उसका सत् परिणाम सामने आता है। जिस आधार पर मंत्र जप द्वारा शक्तियाँ हासिल की जा सकती हैं, उस आत्मिक धरातल को भी सुदृढ़, विकसित और पवित्र बनाया जाना आवश्यक है। इसके अभाव में मंत्र विद्या का कुछ औचित्य नहीं हो सकता। 

अनुसंधानों एवं परीक्षणों के माध्यम से वैज्ञानिकों ने ध्वनि तरंगों से उद्भूत होने वाली विशेष शक्ति की  खोज कर चिकित्सा उपचार से लेकर अन्य कई महत्त्वपूर्ण कार्योंर्ं के लिए इसका इस्तेमाल किया है।  मंत्र जप के तहत भी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं। मंत्र के इन ध्वनि तरंगों के माध्यम से कई प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। 

प्रश्र उठता  है, लाभ के लिए कौन से मंत्र का जप किया जाय? क्योंकि धर्म ग्रंथों में सैकड़ों प्रकार के मंत्रों का उल्लेख मिलता है। इसके जवाब में मनीषियों का मत है कि चिकित्सकीय ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक लाभ के लिए गायत्री मंत्र जप ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मानवीय काया में संजीवनी शक्ति, प्राण शक्ति के गड़बड़ होने पर शारीरिक एवं मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है और अनेकानेक प्रकार की व्याधियाँ धर दबोचती हैं। गायत्री मंत्र  सूर्य का मंत्र है, जिसका प्राण (जीवनी शक्ति) से सीधा संबंध है। वेदों में सूर्य को संसार की आत्मा कहा है। सूर्य पृथ्वी पर जीवन के प्रकटीकरण का प्रतीक है। संसार का सम्पूर्ण भौतिक विकास सूर्य की सत्ता पर ही निर्भर है। गायत्री मंत्र में  २४ शब्दों के गुंफन कुछ इस प्रकार हैं कि उसके जप से शरीर के अनेक ग्रंथियों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और जप कर्ता प्राणवान् हो जाता है, जिससे कई प्रकार की बीमारियों का इलाज स्वतः हो जाता है।

गायत्री मंत्र की चिकित्सकीय लाभ के संदर्भ में हास्पिटल एण्ड रिचर्स सेण्टर, जबलपुर (म.प्र.) में हृदय रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. आर.एस. शर्मा ने विशेष शोध-अनुसंधान किये हैं। डॉ. शर्मा ने अध्ययन के लिए हृदय रोग और उससे संबंधित उच्च रक्त चाप संबंधी रोगियों को चुना और उसमें औषधि सेवन के साथ गायत्री मंत्र जप को भी अनिवार्य बना दिया। कई रोगियों पर अनेक परीक्षणों के उपरांत काफी उत्साहवर्धक नतीजे सामने आये। जिन रोगियों ने दवा और मंत्र जप दोनों को साथ-साथ अपनाया उनके तथा मात्र दवा पर आश्रित रोगियों के स्वास्थ्य में भारी फर्क था। 

डॉ. शर्मा का मानना है कि यह एक तरंग प्रधान चिकित्सा है।  उद्भूत तरंगें रोग ग्रस्त अंग की अव्यवस्थित तरंगों को पुनर्व्यवस्थित करती हैं। इस प्रकार कुछ काल तक इस मंत्र की उपासना के पश्चात् जब बीमार अवयव अपना स्वाभाविक स्पन्दन प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वस्थ  हो जाता है और व्यक्ति निरोग।

गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक लाभ के संबंध में अथर्ववेद (१९.७१.१) कहता है- ‘‘गायत्री मंत्र जप से दीर्घाष्यु (लम्बी आयु), प्राणवान् (साहस), प्रजावान् (सहयोगी), पशु-सम्पत्ति (धन-दौलत), कीर्तिवान् (यश), धन- सम्पदा और ब्रह्मवर्चस (आध्यात्मिक शक्ति) की प्राप्ति होती है।’’ इस संदर्भ में  गायत्री के विशेषज्ञ  पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं- ‘महामंत्र जितने जग माहीं, कोई गायत्री सम नाहीं।’ अतःउक्त बातों से यही सिद्ध होता है कि गायत्री मंत्र का जप ही सर्वाधिक लाभदायक है। 

(लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं।)


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....