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एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें  घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे वे चावल पीछे की ओर गिरते गये। जब पीछे देखा तो उसे होश आया। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन  दानों को फिर से पा सका होता, पर वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की भूख ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी, पर कोई उपाय नहीं था। हमारा वर्ष सन् २००२ कुछ इसी तरह बीता। एक-एक दिन चावल के दाने की तरह बिखरते गये और हम हाथ मलते रहे।
पीछे मुड़कर देखो, वर्ष २००२ अब भी हमें निहार रहा है। मुड़-मुड़ कर हमारी अकर्मण्यता, निष्क्रियता, ठालू प्रवृत्ति पर हँस रहा है। हमारी उपलब्धि पर हमें कोस रहा है। अरे आलसी, अज्ञानी मैं तो पूरे ३६५ दिन तेरे ही पास रहा, लेकिन तू छूँछ का छूँछ ही रहा।  यद्यपि पछतावा हमें  हो रहा है, पर अब पछताये होत क्या। हमारे राजनेता, प्रशासक, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, धर्माधीश, सभी दौड़ते रहे, पर अंतिम घड़ी खाली निकली। कोई कुर्सी के लिए दौड़ रहा था। कोई धन के लिए, कोई धर्म की ठेकेदारी में  फँसा था। शिक्षक और युवाओं से समाज को अपेक्षाएँ थीं, वे भी अपने अहम पोषण में जुटे रहे। सक्रियता सब जगह थी, पर शायद दिशा ठीक नहीं रही। इसलिए  पछताना पड़ रहा है। खैर कोई बात नहीं, लो अब अगले वर्ष २००३ का तहेदिल से स्वागत करें। वह हमारी ओर चला आ रहा है। दस्तक देने ही वाला है। अरे, उसने दस्तक भी दे दिया। सावधान! चलो हम सक्रिय हो जाएँ, परन्तु जरा सावधान होकर। दुनिया को ठीक कर पायें न सही। कम से कम अपनी गठरी ठीक से बाँध लें। अपने समय के दानों को बचा लें। 
अँगरेजी में एक कहावत है ङ्खद्गद्यद्य ड्ढद्गद्दह्वठ्ठ द्बह्य द्धड्डद्यद्घ स्रशठ्ठद्ग हकीकत में नये वर्ष की नई शुरुआत इस तरह से करें कि वह शुरुआत ही आधी सफलता बन जाय। लेकिन इसके लिए विशेष योजनाबद्ध तरीके से परिश्रम की आवश्यकता है। 
इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने भी व्यक्तित्व सफल हुए हैं। उनकी अपनी सुव्यवस्थित जीवन नीति थी। जिसे उन्होंने विश्वासपूर्वक अपनाई, पुनः उसी पर चलने की आवश्यकता है। उस नीति की शुरुआत दिनचर्या से होती है, उसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण नियम हैं, जिन्हें निष्ठापूर्वक दिनचर्या में शामिल किया जाना चाहिए। इनमें सर्वत्र भगवान् की दृष्टि का अहसास करना सबसे पहले है। इसी के साथ विषम परिस्थितियों को छोड़ सूर्योदय से पहले उठ जाना तथा आत्मबोध-तत्त्वबोध का अभ्यास करना। यह सोचना कि प्रभु कृपा से हमें आज का जीवन मिला है। इसके सार्थक उपयोग के लिए संकल्पित हैं। इसी तरह रात्रि सोते समय दिनभर के कामों की समीक्षा करते, इस चिंतन के साथ सोना की हमारा समूचा अस्तित्व प्रभु में समर्पित एवं विसर्जित हो रहा है। इस प्रकार प्रत्येक दिन अपने नए जीवन एवं प्रत्येक  रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना ही आत्मबोध-तत्त्वबोध का सार है। प्रातः उठकर ही दिन भर के कार्यों का निर्धारण, नियमित उपासना अर्थात् गायत्री मंत्र या अन्य उपदिष्ट मंत्र का कम से कम एक माला जप करना। रविवार या गुरुवार एक दिन साप्ताहिक उपवास रखना। पूरे दिन में कम से कम एक परोपकार परमार्थ का कार्य करना अथवा सबके कल्याण एवं उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करना। स्वाध्याय के क्रम में श्रेष्ठ साहित्य को विचारपूर्वक पढ़ना।
अपना जो भी कर्त्तव्य है, उसे कर्मठ भाव के साथ संकल्प एवं मनोयोगपूर्वकपूर्ण करना। बाह्य जीवन एवं आंतरिक जीवन के स्वच्छता एवं सुव्यवस्था के लिए सदा सचेष्ट रहना। दिनभर में कभी भी एक निश्चित समय पर १५ मिनट ध्यान के लिए निकालना। शयन से पूर्व नियमों का पालन हुआ कि नहीं यह जाँचना। भूल के लिए आवश्यक प्रायश्चित करना। 
इनके अलावा कुछ नियम जैसे जान-बूझकर कभी किसी का अहित न करना। स्त्री-पुरुष के प्रति परस्पर पवित्र दृष्टि रखना। किसी का हक न लेना। आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना और क्रोध- फैशन के अतिरेक से बचना। गंदी हँसी-मजाक न करना। किसी भी स्थिति में किसी से ईर्ष्या न करना। व्यसनों का त्याग- तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी, भाँग, गाँजा, चरस, शराब आदि का सेवन न करना। अभक्ष्य खानपान एवं समय नष्ट  करने की प्रवृत्ति का त्याग करना।
इस ढंग से यदि हम सच्चे मानव बन गये, तो अपने के साथ समाज, राष्ट्र सबका भला सम्भव होगा। बीता वर्ष  मुड़-मुड़कर हमें यही संदेश दे रहा था कि मनुष्यों तूने बड़ी  उपलब्धियाँ प्राप्त कर लीं। विश्व में धाक जमा ली, पर अपने को मनुष्य न बना पाया। वस्तुतः मानव जीवन की गरिमा प्राप्त करके अपने समय रूपी दानों को सम्हाल लेना ही नववर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। 

प्रस्तुति- शांतिकुंज 


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