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किसी समय महर्षि रमण से पश्चिमी विचारक पॉल ब्रँटन ने पूछा था, ‘मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा की जड़ क्या है?’ महर्षि रमण हँसकर बोले- ‘हीनता का भाव, बात थोड़ी अटपटी सी लगती है। हीनता का भाव और महत्त्वाकांक्षी चेतना परस्पर विरोधी दिखाई पड़ती हैं, लेकिन वे वस्तुतः विरोधी हैं नहीं। बल्कि एक ही भावदशा के दो छोर हैं। एक छोर से जो हीनता है, वही दूसरे छोर से महत्त्वाकांक्षा। हीनता स्वयं से छुटकारा पाने की कोशिश में महत्त्वाकांक्षा बन जाती है। इसे सुसज्जित हीनता कहना भी गलत नहीं है। हालाँकि बहुमूल्य से बहुमूल्य साज-सज्जा के बावजूद न तो वह मिटती है और न नष्ट होती है। थोड़ी देर के लिए यह हो सकता है कि दूसरों की दृष्टि से वह छिप जाए, लेकिन अपने आप को लगातार उसके दर्शन होते रहते हैं। वस्तुतः जब भी किसी जीवन समस्या को गलत ढंग से पकड़ा जाता है, तो परिणाम यही होता है। समस्या के समाधान, समस्या से बड़ी समस्याएँ बनकर आते हैं।’
इस संबंध में एक सच्चाई और भी है। व्यक्ति जब अपनी असलियत से भागना चाहता है, तो उसे किसी न किसी रूप में महत्त्वाकांक्षा का बुखार जकड़ लेता है। अपने आप से अन्य होने की चाहत में वह स्वयं जैसा है, उसे ढँकता है, लेकिन किसी तथ्य का ढक जाना और उससे मुक्त हो जाना एक बात नहीं है। हीनता की विस्मृति, हीनता का विसर्जन नहीं है। यह तो बहुत अविवेकपूर्ण प्रक्रिया है। इसीलिए ज्यों-ज्यों दवा जाती है, त्यों-त्यों रोग बढ़ता है। महत्त्वाकांक्षी मन की प्रत्येक सफलता आत्मघाती है, क्योंकि वह अग्रि में घृत का काम करती है, सफलता तो आ जाती है, पर हीनता नहीं मिटती, इसीलिए और बड़ी सफलताएँ जरूरी लगने लगती हैं। मूलतः यह हीनता का निरंतर बढ़ते जाना है। विश्व का ज्यादातर इतिहास ऐसे ही बीमार लोगों से भरा पड़ा है। तैमूर-सिकन्दर या हिटलर और भला क्या है? बात किसी एक की नहीं है। प्रायः सभी इस रोग से संक्रमित हैं। यही कारण है कि यह महारोग जल्दी किसी को नजर नहीं आ जाता, लेकिन नजर न आने पर भी रोग है, तो मृत्यु अवश्य ही। महत्त्वाकांक्षा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यह विध्वंस, हिंसा, रुग्ण चित्त से निकली घृणा और ईर्ष्या है। मनुष्य-मनुष्य के बीच सांसारिक संघर्ष यही तो है। युद्ध इसी का व्यापक रूप है। यह सांसारिक होती है, तो इससे पर-हिंसा जन्म लेती है। यदि यह आध्यात्मिक है, तो आत्म-हिंसा पर उतारू हो जाती है। अध्यात्म कहीं कुछ पाने की लालसा नहीं, बल्कि स्वयं को सही ढंग से जानने-पहचानने का विज्ञान है। यह सृजनात्मक चेतना में ही संभव है और केवल वही चेतना सृजनात्मक हो सकती है, जो महत्त्वाकांक्षा से मुक्त है। सृजनात्मकता केवल स्वस्थ और शांत चित्त में ही स्फुरित हो सकती है। स्वस्थ चित्त स्वयं में स्थित होता है। स्वयं को न जानना ही वह भूल और केन्द्रीय अभाव है, जिससे सारी हीनताओं का आविर्भाव होता है। आत्मज्ञानी के अतिरिक्त इस अभाव से और कोई मुक्त नहीं है। व्यक्ति के लिए चित्त से सभी महत्त्वाकांक्षाओं की विदाई अत्यंत आवश्यक है। इनके रहते तो जीवन की दशा और दिशा औंधी और उलटी ही रहेगी। मनुष्य जब स्वयं में किसी भी तरह की हीनता पाकर उससे भागने लगता है, तो उसकी दिशा अपने आप से विपरीत हो जाती है। वह इस विपरीत दिशा में तेजी से दौड़ने लगता है। बस यही भूल हो जाती है। मनोवैज्ञानिक एच.गिब्सन ने अपने शोध पत्र एंबीशनः एन इंटरगेशन टु मेंटल हेल्थ में इस भूल का खुलासा किया है। उनका निष्कर्ष है कि सब हीनताएँ बहुत गहरी आंतरिक अभाव की सूचनाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति ही आंतरिक अभाव में है। एक रिक्तता प्रत्येक को ही अनुभव होती है। इस आंतरिक रिक्तता को बाह्य उपलब्धियों से भरने की कोशिश चलती रहती है।
भला आंतरिक रिक्तता के गड्ढे को बाहरी उपलब्धियों से भरना किस तरह से संभव है, क्योंकि जो बाह्य है, वह भला आंतरिक कमी को किस भाँति पूरा करेगा और फिर सभी कुछ तो बाह्य है। धन, पद, प्रभुता और भी ऐसी बहुत चीजें बाहरी ही हैं। सवाल पूछा जा सकता है, तब आंतरिक क्या है? उस अभाव- उस रिक्तता, शून्यता को छोड़कर कुछ भी आंतरिक नहीं है। इस शून्यता से भागना स्वयं से भागना है। उससे पलायन स्वयं की सत्ता से पलायन है। उससे भागने से नहीं, वरन् उसमें जीने और जागने में ही कल्याण है। जो व्यक्ति उसमें जीने और जागने का साहस करता है, उसके समक्ष वह शून्य ही पूर्ण बन जाता है। उसके लिए वह रिक्तता ही परम मुक्ति सिद्ध होती है। वह सत्ता ही परमात्मा है, जिसकी एक झलक में ही सभी अभाव पूरे हो जाते हैं, सभी हीनताएँ  विलीन हो जाती हैं।

प्रस्तुति- शांतिकुंज 


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