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मनुष्य उन्नति करना चाहता है। हर किसी की इच्छा होती है कि मैं सुन्दर,स्वरूपवान्, स्वस्थ, बलवान् विद्वान्, बुद्धिमान्, तेजस्वी, प्रतापी, ऐश्वर्यवान् असाधारण शक्तियाँ रखने वाला बनूँ। परन्तु सर्वतो मुखी उन्नति के मार्ग पर बढ़ने का कार्य किस प्रकार आरम्भ किया जाय, यह विचारणीय है। सुनार एक साँचा तैयार करता है, चाँदी पिघलाकर उसमें ढाल देता है, तब वैसा ही गहना बन जाता है। बिना साँचा बनाये रुपया ढालने की टकसाल का काम कैसे चलेगा? इसलिए मनुष्य जैसा बनना चाहता है, अपने को वैसा ढालने के लिए एक साँचा तैयार करना पड़ेगा। ईश्वरीय ध्यानमूर्ति वह साँचा ही तो है।
शब्द के पीछे एक चित्र जुड़ा होता है।  हाथी शब्द को कहते ही वह विशालकाय जन्तु स्मरण हो आता है। यदि यह चित्र सामने न आवे, तो वह शब्द निरर्थक है। सुन्दर शब्द के साथ जो चित्र जुड़ा हुआ है। वह दिव्य नेत्रों के सामने नाचने लगता है। उसी प्रकार आप अपने में जो उन्नति देखना चाहते हैं, उन सबका एक सम्मिलित चित्र अवश्य बन जायेगा। यदि इच्छा निर्बल हुई, तो वह चित्र भी धुँधला, निर्बल, अस्थिर और उदासीन होगा। उन्नति की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, उतना ही चित्र अधिक स्पष्ट, सतेज, प्रकाशवान्, स्थिर एवं उत्सुकतापूर्ण होगा। आकांक्षा उस ध्येय को प्राप्त करने की लगी रहे और तन-मन से उसकी प्राप्ति का कर्त्तव्य करता रहे। 
कोलम्बस की आकांक्षा भारत भूमि की तलाश करने के लिए व्याकुल हो रही थी और सर्वस्व की बाजी लगाकर उसका तन मन जहाज का संचालन कर रहा था। तब कहीं वह एक स्वर्णभूमि को ढूँढ़ पाया। यदि यों ही बिना किसी तीव्र आकांक्षा के बिना किसी ध्येय प्रतिमा के समुद्र में जहाज चला देता, तो सफलता प्राप्त नहीं कर सकता था।
उसी प्रकार पूर्वजों ने अत्यन्त गहरे मानसिक तत्त्व ज्ञान के आधार पर ईश्वर की सुन्दर मूर्ति का ध्यान करने का पूजा विधान बनाया है। अपनी नाना प्रकार की उन्नति का बोध कराने वाली एक मनमोहक प्रतिमा का ध्यान करना आवश्यक है। इस प्रतिमा के साथ ईश्वर का पवित्र नाम जोड़ देने से यह विशेषता आ जाती है कि वह प्रतिमा केवल भौतिक, सांसारिक उन्नति तक ही सीमित नहीं रहती, वरन् आध्यात्मिकता, सतोगुणी दिव्य वृत्तियों के साथ भी सम्बन्धित हो जाती है। उस साँचे से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों उन्नतियों से युक्त हमारे भविष्य की रचना होती है।
ईश्वर को निराकार मानने वाले जो सज्जन परमात्मा का एक विशेष मूर्ति में ही होना स्वीकार नहीं करते, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे अपने मत को बदले बिना भी ध्येय प्रतिमा का ध्यान करने के लाभों के संबंध में विचार करें और उसके अन्दर जो बड़ा भारी जखीरा छिपा हुआ है, उसे ग्रहण करें। अपने वर्तमान शरीर की सभी कमियों को हटाकर अपने लिए जैसा उत्तम से उत्तम शरीर चाहते हों, जैसे गुण चाहते हों, जैसी शक्तियाँ चाहते हों, उन सबसे अपनी तस्वीर की सजावट कर डालो। बस यही ईश्वर की तस्वीर हो गयी। इसी का ध्यान किया करो। इस मूर्ति से तुम्हारा जितना प्रेम होगा, उतना ही तुम भृंग-कीट की तरह उस आदर्श प्रतिमा में तल्लीन होते जाओगे और वह आध्यात्मिक तल्लीनता इतनी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी कि बहुत अंश में तो वे इच्छाएँ इसी जन्म में पूरी हो जायेंगी। यह आध्यात्मिक ध्रुव सत्य है।
केवल ध्यान करने से कुछ नहीं होता, यह समझना भूल है। ध्यान आरम्भिक सीढ़ी है। आदर्श का निर्माण होते ही शरीर और मन सारी शक्तियों से उसे प्राप्त करने लग जाता है और दृश्य एवं अदृश्य लोकों से सफलता के लिए ऐसे-ऐसे विचित्र साधन सूक्ष्म तत्त्वों की सहायता से जुटाने लगता है, कभी-कभी तो वे सहायताएँ चमत्कार जैसी जान पड़ती हैं? ईश्वर की पवित्र मूर्ति में अपने को जितना तल्लीन कर देता है अथवा यों कहिए कि आत्मोन्नति की जो सबसे ऊँची, सर्वगुण सम्पन्न ध्येय प्रतिमा बनाई है, उसके साथ तदाकार होने के लिए प्रेम पूर्वक विह्वल होगा। वह सफलता की उतनी ही ऊँचाई प्राप्त करेगा। भक्ति का सच्चा तत्त्व यही है। 
जीवन-काफिला कहीं का कहीं पहुँच जायेगा। आपकी जीवन दशा में आश्चर्यजनक आमूल-चूल परिवर्तन हो जायेगा। भक्ति द्वारा उत्पन्न हुआ  आत्मोन्नतिकारी प्रचण्ड विद्युत् प्रवाह नस-नस में दौड़ने लगेगा। जैसा जीवन ध्येय निश्चित हो जाता है, उसी के अनुरूप शरीर के कार्य और मन के कार्य दिखाई देने लगते हैं।
अतः अपने उत्थान के लिए निर्धारित किये हुए उच्च आदर्श एवं उन्नत भविष्य की ध्येय-प्रतिमा बनाना, मानसिक चित्र निर्माण करना आवश्यक है। ईश्वर को मानने वाले या न मानने वाले सभी व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक है कि ध्येय प्रतिमा का ध्यान किया करें। इससे वे उसके अनुरूप बनने लग जायेंगे। मनोविज्ञान शास्त्र की  दृष्टि से यह व्यापार कल्पवृक्ष के समान मनोवांछाएँ पूरी करने वाला सिद्ध होगा।

प्रस्तुति- शांतिकुंज 


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