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तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘मातृदेवो भव’, ‘पितृ देवो भव’ के साथ ‘आचार्य देवो भव’ कहकर गुरु का महत्त्व माता-पिता के तुल्य बताया है। इतना ही नहीं, अनेक स्थानों पर तो ‘गुरु साक्षात् परब्रह्म’ कहकर उसकी सर्वोपरिता को भी स्वीकार किया गया है। वस्तुस्थिति भी ऐसी ही है। बालक के पालन-पोषण का कार्य माता-पिता करते हैं, किन्तु उसे संस्कारवान् बनाकर सुसभ्य नागरिक बनाना आचार्य की जिम्मेदारी है। इस महान् उत्तरदायित्व के कारण ही गुरु मनुष्य समाज का देवता रही है। गुरु की महत्ता शिक्षा और गुणों के कारण नहीं थी, बल्कि सही ज्ञान का दिग्दर्शन कराना उनका प्रमुख उद्देश्य रहा है।
मनुष्य संसार की अनेक समृद्धियाँ प्राप्त कर ले, सुख और सुविधाओं की किसी तरह की कमी न हो, तो भी उसके शान्तिमय जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। विश्व की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझाकर परम सत्य की खोज करना मनुष्य जीवन का लक्ष्य  है। लक्ष्य पूर्ति के लिए साधना की आवश्यकता होती है। साधना अनुभवी पथ प्रदर्शक की देख-रेख में ही सम्पन्न हो सकती है। गुरु शब्द से ब्रह्म विद्या का बोध होता है। साधना और ब्रह्म विद्या के निष्णात आचार्य  यह समझते थे कि साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं, उनके लिए विद्यार्थी जीवन सबसे उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है, किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है। इसके लिए अधिक शक्ति, समय और श्रम लगाकर भी परिणाम थोड़े ही निकलते हैं। विद्यार्थी जीवन में बुद्धि का उदय होता है। इसलिए उसमें आसानी से श्रद्धा उत्पन्न करके ब्रह्म तत्त्व की ओर प्रेरित किया जा सकता है। इस बात को भारतीय आचार्यों ने गहराई तक समझ लिया था, इसलिए जीवन के प्रारंभ में ही शिक्षा के साथ साधना का समन्वय किया गया था।
गुरु के सान्निध्य में रहकर शिष्य साधना का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोनिष्ठ होने से उनका शरीर स्वर्ण जैसा दैदीप्यमान होता था। संसार की कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें शक्ति होती थी। वार्तालाप विवेचन, विश£ेषण और विचार-विनिमय के द्वारा उनमें गंभीर चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनके आत्म ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुंज या ज्ञान पुंज ही नहीं, शक्ति पुंज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप,  उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकांक्षा न होती थी, तब वे अधिकार नहीं, कर्त्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे। साहस और कर्मठता उनमें कूट-कूटकर भरी होती थी। मनुष्य शरीर के रूप में उनमें स्वयं देवत्व निवास करता था। ऐसे मेधावी पुरुषों से यह भारत भूमि भरी-पूरी थी। यहाँ सुख और समृद्धि की वर्षा हुआ करती थी।
ज्ञानवान् तथा बुद्धिमान् आचार्यों के मार्गदर्शन में रहकर जीवन की सर्वांगपूर्ण शिक्षा इस देश के नागरिकों ने पाई थी, इसी से वे अपने ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता को प्रकाशित रख सके। गुरुकुलों के रूप में न सही, उतने व्यापक क्षेत्र में भी भले न हो, किन्तु यह परंपरा अभी पूर्ण रूप से मृत नहीं हुई है। आज भी ब्रह्म विद्या के जानकार आचार्य और अथातो ब्रह्म जिज्ञासा के जिज्ञासु शिष्य यहाँ विद्यमान हैं, किन्तु उनकी संख्या इतनी कम है कि वे किसी तरह लोकजीवन में प्रकाश उत्पन्न नहीं कर पा रहे हैं। फिर भी संतोष यह है कि गुरु गौरव अभी भी यहाँ सुरक्षित है और उसका पूर्ण विकास भी संभव है। इसमें कुछ देर भले ही लगे, किन्तु आत्मा की ज्ञान पिपासा को अधिक दिन तक भुलाया नहीं जा सकता। उसके जागने का समय अब करीब आ पहुँचा है। 
एक बार फिर से विचार करना पड़ेगा कि पाश्चात्य प्रणाली पर आधारित आधुनिक शिक्षा-संस्थाओं में जो व्यवस्था चल रही है, उससे क्या मानवीय जीवन की समस्याएँ पूरी होती हैं? आज की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य अर्थ प्राप्ति और कामोपभोग रह गया है। जीवन निर्माण तथा राष्ट्र के उत्थान के लिए ऐसी शिक्षा से कोई लाभ नहीं हो सकता। विद्यार्थी जीवन में तपश्चर्या, तत्परता और संयम भावना जाग्रत् करने की आवश्यकता है। इसके लिए गुरु शिष्यों के संबंधों में अनुपालन का भाव पैदा करना आवश्यक है।
इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सर्वप्रथम योग्य विचारवान्, दृढ़ चरित्र तथा ब्रह्मवेत्ता अध्यापकों को ढूँढ़ निकालना पड़ेगा। शिक्षा की नींव जब तक चरित्रवान् व्यक्तियों के हाथों से नहीं पड़ेगी, तब तक जातीय विकास की समस्या हल न होगी। जो स्वयं प्रकाश फैलाने वाला है, यदि वही अँधेरे में ठोकर खाकर गिरे, तो दूसरों को वह उजाला क्या देगा? राष्ट्र को ज्ञानवान्, प्रकाशवान् तथा शक्तिवान् बनाने के लिए गुरु और शिष्य परंपरा का सुधार नितान्त आवश्यक है। लोक जीवन में विकास की समस्या इसके बिना कभी भी पूरी न होगी।


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