img


हजरत अबू बिन आदम की एक बार फरिश्ते (स्वर्गदूत ) से भेंट हुई, वह अपनी बगल में एक बहुत बड़ी पुस्तक दबाये हुए था, हजरत ने फरिश्ते से पूछा- आपके हाथ में यह कौन सी पुस्तक है? और आप किस लिए पृथ्वी पर घूम रहे हैं? फरिश्ते ने उत्तर दिया कि मैं ईश्वर भक्तों की खोज किया करता हूँ और जो मिलते हैं, उनके नाम इस पुस्तक में दर्ज कर लेता हूँ। हजरत ने पूछा भाई, आपको थोड़ा कष्ट तो होगा, पर उस पुस्तक में यह तो देखों कि कहीं मेरा नाम भी लिखा हुआ है क्या? फरिश्ते ने उसका अनुरोध स्वीकार कर लिया और एक पेड़ की छाया में बैठ कर पुस्तक को आदि से अंत तक देख डाला। पर उसमें हजरत का कहीं नाम न था। स्वर्गदूत चला गया। हजरत बहुत रंज करने लगे कि मैंने अपना सारा जीवन अल्लाह के लिए कुरबान कर दिया; पर सब व्यर्थ हुआ, मेरा नाम उसके भक्तों की सूची में भी न लिखा जा सका।
बहुत दिन बीत गये। हजरत की फिर एक फरिश्ते से भेंट हुई। इसका रंग-ढंग भी पहले जैसा ही था। फर्क इतना ही था कि हाथ में एक बहुत ही छोटी पुस्तक थी। हजरत ने उससे भी पूछा-भाई, तुम कौन हो? किसलिए घूम रहे हो? और जो छोटी पुस्तक तुम्हारे हाथ में है, वह कैसी है? फरिश्ते ने कहा- ऐ अबू बिन आदम! सुन, मैं स्वर्गदूत हूँ और इस पृथ्वी पर ऐसे लोगों की तलाश करता हूँ, जिनकी भक्ति अल्लाह करता है। जो लोग ऐसे मिलते हैं, उनके नाम इस छोटी पुस्तिका में दर्ज कर लेता हूँ। हजरत ने झिझकते हुए पूछा-भाई! कष्ट न हो, तो मुझे यह बताओ कि ऐसे कितने और कौन-कौन भाग्यशाली लोग इस पृथ्वी पर हैं। स्वर्गदूत ने उस छोटी पुस्तिका में लिखे हुए दस-बीस नामों को एक श्वास में सुना दिया- इनमें सबसे पहले ‘अबू बिन आदम’ का नाम था। 
इस्लाम धर्म की उपरोक्त कथा एक बड़ी सच्चाई अपने अन्दर धारण किये हुए है। मुक्ति, स्वर्ग, सम्पदा आदि स्वार्थों के लिए ईश्वर का आश्रय पकड़ने वाले उसकी सेवा, पूजा, जप, कीर्तन करने वाले लोग इस संसार में बहुत हैं, इसमें बहुत से भक्त ऐसे भी मिल सकते हैं, जो दुनिया को ठगने के लिए तथा व्यापारिक आडम्बर करने के लिए हरि का नाम नहीं जपते, वरन् सच्चे मन से भक्ति करते हैं।
परन्तु आह! हजरत अबू बिन आदम जैसे तलवार की धार पर चलने वाले वे कर्मनिष्ठ कहाँ हैं, जो ईश्वर की भक्ति नहीं करते, परन्तु ईश्वर उनकी भक्ति करता है। हम लोग मतलबी और खुशामदी चापलूसी पर स्वभावतः खुश रहते हैं; किन्तु यदि कोई व्यक्ति हो, जो खुशामद का तो एक ऐसा शब्द भी मुँह से न निकलता हो, वरन् हमारी इच्छा को पूर्ण करने में, आज्ञा पालन करने के लिए अपने सर्वस्व की बाजी लगा देता हो, तो उस व्यक्ति के लिए जितना स्नेह-सत्कार हमारे मन में होगा, उतना मतलबी टट्टू खुशामदी के लिए नहीं हो सकता। कोई आश्चर्य नहीं कि ईश्वर उन लोगों को प्रधानता देता हो, जो उसकी आज्ञाओं को पालन करने में, धर्म का प्रसार करने में, अपना खून-पसीना एक कर देते हैं। उत्तम आचरण रखने वाला, ईमानदारी की रोटी कमाने वाला, असमर्थों की सहायता करने वाला कर्मनिष्ठ भले ही जप, कीर्तन, पूजा-पत्री न करता हो, वह ईश्वर को अधिक प्यारा होगा। 
संसार को ऐसे ईश्वर भक्तों की आवश्यकता है, ईश्वर को ऐसे प्रेमी चाहिए,जो प्रभु की पुण्य वाटिका को ईमानदार माली की तरह अपने स्वेद कणों से सींच कर हरा-भरा रखे। स्वयं अपने आचरण को सच्चाई और ईमानदारी से  परिपूर्ण रखे और दूसरों को भी उसी मार्ग में प्रवृत्त करने का प्रयत्न करे। भगवान् बुद्ध ने कहा था- ‘मुझे तब तक मुक्ति नहीं चाहिए, जब तक इस लोक में एक भी प्राणी बन्धन ग्रस्त है।’ महाप्रभु ईसा ने मुक्ति नहीं चाही, वरन् अज्ञान ग्रस्तों के पापों का बोझ अपने शिर पर लेकर असह्य वेदना सहन करने के लिए क्रूस पर चढ़ गये। आशिक वह है, जो खून देने को तैयार रहे। दूध पीने वाले मजनूँ तो चाहे जितने मिल सकते हैं। 
इस पुण्य भूमि पर छप्पन लाख पेशेवर और उनसे कई गुने अधिक पेशेवर भक्त मौजूद हैं। स्वर्ग युग की हजारों पुस्तकें उनकी नामावली से भरी जा सकती हैं। हमारी पीड़ित, दीनहीन, दुःखिया, मातृभूमि को ऐसे भक्तों की आवश्यकता है, जो स्वर्ग की कल्पना के नशे में झूमना छोड़कर, नरक बनी हुई भूमि को स्वर्ग बनाने में अपना सर्वस्व निछावर कर दें। हजरत अबू बिन आदम वाली स्वर्ग दूत की छोटी पुस्तक खाली पड़ी है। ऐसे माई के लाल बहुत कठिनता से मिलते हैं, जिनकी भक्ति करने के लिए ईश्वर भी प्रतीक्षा में बैठा हुआ है। 


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....