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नेपोलियन को चिट्ठी देने एक घुड़सवार वायु वेग से आगे बढ़ा। लम्बी यात्रा के बाद घोड़ा बेहद थक चुका था। अतः सवार ज्यों ही नेपोलियन के निकट पहुँचा और घोड़े से नीचे उतरा वैसे ही थका हुआ घोड़ा पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। नेपोलियन ने पत्रोत्तर लिखकर सवार को दिया और कहा- तुम्हारा घोड़ा मर गया है, अतएव तुम मेरे इस विशेष घोड़े पर सवार होकर जाओ और सेनापति को हमारा पत्र दो। अश्वारोही घबड़ा गया और उसने विनयपूर्वक सिर झुकाकर निवेदन किया-महाराज! हम जैसे निम्र श्रेणी के तुच्छ सेवकों का आपके घोड़े पर बैठना उचित नहीं है। नेपोलियन ने उत्तर दिया- दुनिया में ऐसी कोई भी उत्कृष्ट वस्तु नहीं है, जिस पर फ्रांस के एक छोटे से छोटे सैनिक का अधिकार न हो या उसे प्राप्त न हो सके।
वस्तुतः मन की कमजोरी ही व्यक्ति  के विकास का सबसे बड़ा अवरोध है। मनः केन्द्र में अभिलषित वस्तु के प्रवेश करते ही जो लोग यह समझने लगते हैं कि वह हमसे दूर की वस्तुएँ हैं, हमें उपलब्ध न होंगी, ऐसी मनोधारा अत्यंत घातक है। मनुष्य इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। वह बुद्धि और ज्ञान का धनी है। मनुष्य की विकास यात्रा की गाथा अनन्त है, जबकि अन्य प्राणी चिरकाल से अपनी लगभग यथावस्था ही बनाये हुए हैं। 
मनुष्य के अन्दर ईश्वर का जो केन्द्र है, उसे हम आत्मा कहते हैं। इसी आत्मा से मिले गुप्त ईश्वरीय संदेशों के आधार पर वह योग्यतम और श्रेष्ठतम कर्त्तव्य की ओर चलता है। सद्गुणों को बढ़ाता है, आत्मबल को विकसित करता है, बुद्धि को तीव्र करता है तथा विवेक को जाग्रत् करता है। यह विशेषताएँ परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को दी हैं। हर व्यक्ति प्रचुर सामर्थ्य का धनी है। अपनी सामर्थ्य को नहीं पहचान पाना ही व्यक्ति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। जो मनोबल के धनी हैं, अपनी सामर्थ्य पर विश्वास रखते हैं, वे कितने ही अभावग्रस्त क्यों न हों, परमात्मा द्वारा दी गयी अपनी सामर्थ्य को विकसित करते हुए निरन्तर सफलताएँ पाते चले जाते हैं।
जीवन के प्रधान नियमों में कदाचित् प्रमुख नियम यही है कि मनुष्य मन, विचार, आकांक्षा का सदुपयोग सीखे। यह अनुभव करे कि वह परम शक्ति सम्पन्न एक सुदृढ़ चैतन्य  आत्म पिण्ड है। संसार की समस्त उत्कृष्टतम वस्तुओं पर उसका पूर्ण अधिकार है। धन, सम्पत्ति, मान, सम्मान पदाधिकार, धर्म, मोक्ष इत्यादि कुछ भी क्यों न हो, उससे विमुख नहीं है, वे उसी के लिए सृजित हैं। अतएव उसे एक दिन अवश्यमेव प्राप्त होंगे। प्रत्येक मनुष्य को अपना चिन्तन इस प्रकार बनाना चाहिए।
आप किस अवस्था में आत्म विस्मृत हो? आपका वास्तविक स्वरूप क्या है? आप क्यों इन प्रश्रों पर गम्भीरता से विचार नहीं करते? यदि कोई आपको कमजोर मूर्ख, डरपोक कहता है, तो उसे क्यों स्वीकार कर लेते हो? आप क्यों उसका उत्तर नहीं देते और यह क्यों नहीं कहते कि मैं शक्ति-सम्पन्न ज्योतिर्मय आत्म पिण्ड हूँ। एक महान् शक्ति का पुत्र हूँ। ऐसा कोई पद नहीं, जिसके योग्य मैं न होऊँ। संसार में ऐसी कोई अलभ्य वस्तु नहीं, जिस पर मेरा स्वत्व न हो।
जब आपके दिल में बुजदिली के विचार प्रवेश करने लगें, तो पुरुषोचित साहस से गर्जना करो कि मैं निश्चिंत हूँ, साहसी हूँ और सबका स्वामी हूँ, प्रत्येक उत्कृष्ट वस्तु पर मेरा अधिकार है। ऐसे व्यक्ति संसार में अति न्यून हैं, जिनमें आत्म उत्तेजना है और निज शक्ति में विश्वास है, जो संसार की टीका-टिप्पणी की तनिक भी परवाह नहीं करते और सदैव शुभ प्रेरणा में अग्रसर हुआ करते हैं।
जो अपनी बेकदरी करते हैं, वे पापी हैं, क्योंकि वे परमेश्वर स्वरूप परम आत्मा की निंदा करते हैं। कारण कि मनुष्य ईश्वर की प्रतिमूर्ति है। ईश्वर में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं है, सीमा बन्धन नहीं है,प्रत्युत समृद्धि की विपुल सम्पदा भरी पड़ी है। ईश्वर  का आदेश है कि पूर्ण बनो जैसा कि मैं हूँ। अतः कभी अपने आपको नीच, दीन, दुःखी, दरिद्र, रोगग्रस्त आदि न समझो, प्रत्युत उत्साहपूर्वक कहो कि प्रत्येक उत्तम वस्तु पर मेरा अधिकार है। कोई मुझसे वह अधिकार हरण नहीं कर सकता। इस प्रकार मन को भद्दी बातों व भद्दी वस्तुओं से हटाकर ऐक्य में संलग्र करना, मृत्यु के विचार हटाकर दिव्य जीवन के रहस्य में केन्द्रित करना एक बहुत उत्कृष्ट कला है। इस कला में पारंगत बनने का प्रयत्न कीजिए।
प्रत्येक उत्तम वस्तु सर्वप्रथम मनः केन्द्र में प्राप्त होती है। तत्पश्चात् वस्तु जगत् में उपलब्ध होती है। अतः हमें चाहिए कि अपनी आकांक्षाओं का अनुभव करें। तत्संबंधी विचारों को मन में उदारतापूर्वक प्रवेश करने दें। जो काम हाथ में लें, उसमें उत्कृष्टता प्रकाशित करें। इन्हीं सूत्रों को धारण कर अपनी दैवी सामर्थ्य को विकसित करते हुए आप इस संसार की प्रत्येक उत्तम वस्तु के अधिकारी बन सकते हैं।
- शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार 


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