img


अपने आपकी समीक्षा करना, व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन और न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म-निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएँ आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं, उनका यदि विकास नहीं हुआ है, तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।
वस्तुतः मनुष्य के पास ऐसा बहुत कुछ है, जो सदा अप्रकट और अविकसित ही बना रहता है। मस्तिष्कीय क्षेत्र की अतीन्द्रिय क्षमताएँ और अन्तःकरण की ऋद्धि-सिद्धियाँ ऐसी हैं, जो हर किसी के पास न्यूनाधिकता में पाई जाती हैं। यदि आत्म-निरीक्षण की कला हस्तगत हो सके, तो मनुष्य इन दिव्य केन्द्रों का स्थान एवं स्वरूप समझ सकता है और उन्हें विकसित करने के लिए वह सब कर सकता है, जो सुदृढ़ संकल्प शक्ति के सहारे निश्चित रूप से हो सकता है। योग और तप इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है। वस्तुतः हमें अन्तर्मुखी होने का अभ्यास करना चाहिए, ताकि आत्म-निरीक्षण के साथ-साथ आत्म-सुधार का प्रयास भी चल  पड़े। इसकी अनिवार्य आवश्यकता है।
आत्म-निरीक्षण में सर्वप्रथम शरीर और आत्मा की मित्रता अनुभव करने का प्रसंग आता है। इसके बिना वह भ्रान्ति बनी रहती है। जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘माया’ कहा जाता है। ‘माया’ का सार संक्षेप इतना ही है कि चेतना अपने आपको मात्र शरीर मानती  रहती है और उसके निर्वाह तक सीमित न रहकर उसे सजाने, समृद्ध बनाने, दर्पण दिखाने में लगी रहती है। वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति को ही सफलता एवं प्रसन्नता का केन्द्र बिन्दु मान लिया जाता है। इतना ही नहीं, शरीर के साथ सम्पर्क साधने वाले कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र परिचित ही इस शरीराभ्यास के क्षेत्र में घुस पड़ते हैं। इन्हीं सबको वैभववान् बनाने के लिए इच्छाओं और चेष्टाओं का केन्द्रीकरण हो जाता है। जीवन की अवधि और शारीरिक, मानसिक शक्ति का अपव्यय इसी क्षेत्र में होता रहता है। कूप-मण्डूक जैसी गूलर के भीतर रहने वाले भुनगों की तरह मनुष्य की स्थिति हो जाती है और वह आत्मा-परमात्मा के सम्बन्ध में, आत्मोत्कर्ष एवं ईश्वर प्राप्ति के सम्बन्ध में कुछ गंभीर विचार तक नहीं कर पाता। फिर सुधार-विकास का उपक्रम तो चले ही कैसे?
आत्म-निरीक्षण जितना गंभीर और प्रखर होता है, उसी अनुपात से शरीर और आत्मा की भिन्नता का वास्तविक बोध होता है। अन्यथा तोता रटन्त की तरह आत्मा-परमात्मा की चर्चा का बाल-विनोद चलता रहता है।
‘माया’ के बन्धन शिथिल होने या कटने का एक मात्र उपाय है कि अपनी सत्ता की द्विधा स्थिति को समझा जाय। यह अनुभूति विकसित हो सके, तो ही आत्मा का महत्त्व एवं हित सूझ पड़ता है और शरीर के पक्ष में झुकी हुई सारी प्रवृत्ति को संतुलित करने का मन होता है। शरीर संसार में अनुरक्त करता है और आत्मा की प्रायः सर्वथा उपेक्षा करता है। यह सोच तक नहीं पाता कि हमारे भीतर आत्मा नाम की कोई वस्तु भी है और उसकी भी कुछ माँग, पुकार, सुख एवं आवश्यकताएँ भी हैं। इस प्रकार की अनुभूति तभी होती है, जब शरीर पर अपना सर्वस्व निछावर किये रहने के ढर्रे में हेर-फेर किया जाता है। आत्मा को परमात्मा का संदेश सुनने और आह्वान को अंगीकार करने की बात अंतरंग की गहराई तक प्रवेश कर जाती है, तभी यह सूझ पड़ता है कि शरीर की तरह आत्मा के निमित्त भी कुछ किया जाना चाहिए?
क्या किया जाना चाहिए? इसके उत्तर में दो तथ्य उभरकर सामने आते हैं-एक यह कि आत्म-गौरव के अनुरूप व्यक्तित्व के ढलने में जो त्रुटियाँ चल रही हैं उनका कठोरतापूर्वक नियमन किया जाय। इसी को तप कहते हैं। इस संदर्भ में कठोरता बरतनी होती है अन्यथा अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियाँ सहज पीछा नहीं छोड़तीं। तपश्चर्या में शरीर को अकारण कष्ट देना व्यर्थ है। इससे तो स्वास्थ्य गड़बड़ाता है। होना यह चाहिए कि ऐसा मनोबल विकसित किया जाय, जो दुष्प्रवृत्तियों से मल्ल-युद्ध कर उन्हें  परास्त कर सके। यह संशोधन पक्ष हुआ।
इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष श्रेष्ठता  के अभिवर्धन का है। यह आत्म-विश्वास और आत्म-बल के आधार पर उपयुक्त कार्यक्रम बना लेने से भी सम्भव हो सकता है। पर इसके लिए सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय ईश्वर की उपासना करने से भी सहायता मिल सकती है। इसे योग कहते हैं। योग का तात्पर्य है-जुड़ना। किसके साथ जुड़ना? विराट् ब्रह्म-समग्र समाज के साथ अपने को जोड़ना और क्षुद्र स्वार्थपरता के सीमा बन्धन शिथिल करने का अभ्यास करना। योगी का दृष्टिकोण समता का और क्रिया सर्वजनीन हित साधन का होता है। इसके लिए अभ्यास स्वरूप राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग में से किसी का या सभी के समन्वय का अभ्यास आरम्भ किया जा सकता है। यही है यथार्थवादी आत्मिक प्रगति का राजमार्ग।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....