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आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया, जब जौ भर सूँड़ जल से बाहर रह गयी, तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गयी, दूसरे के प्राण बच गये। जीवात्मा की तात्त्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं है।
आमतौर पर मनुष्य खाता, सोता, रौब गाँठता और शान दिखाता है। विलास वैभव का यथास्थिति लाभ उठाता है। किन्तु यह सारा सरंजाम शरीर तक ही सीमित है और अवस्थित भी है। समय गतिशील है। वह तेजी से बदलता और आगे बढ़ता है, साथ ही उपलब्धियों की अनुभूतियाँ भी भूतकालीन बन जाती हैं। इसी बीच इच्छाएँ प्रबल हो लेती हैं और अधिक अच्छी स्थिति पाने की ललक उभरती है, लिप्सा जगती है। संतोष और चैन का अनुभव हो नहीं पाता। इस स्थिति में अशांत, उद्वेग के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता।
प्रश्र सहज ही उठता है कि इस स्थिति का कारण क्या है? जब इस प्रश्र पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तब पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान् था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर, शाश्वत्, सनातन, सत्-चित् आनन्द से ओत-प्रोत था, उसकी उपेक्षा की गयी। फलस्वरूप भीतर और बाहर से सब प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन-हीन की तरह, अभागी जिन्दगी जियी गयी। सान्त्वना न मिल सकी और न किसी को दी जा सकी। 
सत् स्थिर आत्मा है। गुण कर्म स्वभााव में सन्निहित मानवीय गरिमा ही सत् है। जो सत् को पकड़ता है,अपनाता है और धारण करता है, उसका आनन्द सुरक्षित रहता है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित विभूतिवान बना देती है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृत तुल्य अनुदान बरसता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है। ‘असतो मा सद्गमय’। उसे सत् की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रूके। शान्ति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दल-दल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े, तो किसी से कुछ माँगना चाहना न पड़े। अपने अंतराल से ही आनन्द का ऐसा निर्झर बहे, जो अपने को गौरव प्रदान करे और दूसरों की हित साधना करते हुए धन्य बने।
आत्मा की दूसरी पुकार है- ‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’। हे सर्वशक्तिमान्! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात के अंधियारे में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध नहीं होने से ठोकर खाते और काँटों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ का कुछ समझ में आता है, कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधाएँ भी लक्ष्य रखती है। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दीखता है। ऐसी परिस्थिति में घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता से पुकारता है- ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’। ‘अज्ञान से ज्ञान की ओर लें चल। भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर जिसे अपनाकर सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
जीवात्मा की तीसरी पुकार है- ‘मृत्योर्मा मा अमृतं गमय’। मृत्यु की ओर नहीं, अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय-कल्मष सम्पर्क क्षेत्र के प्रचलन, उस ओर घसीट लिए जा रहे हैं, जिस पर मरण ही मरण है। आत्म हनन के उपरांत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकांक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक। जीवन कूड़े-करकट की तरह एक गंदे नाले में बहा जा रहा है। न ही किनारा दीखता है, न ठहराव, न आश्रय।
प्रकृति चक्र के अनुसार समय-समय पर उनमें परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है और वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। वह व्यक्ति की अपनी मनोदशा एवं मानसिक बनावट पर निर्भर है कि इन  परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करे और क्या न करे। 
इसलिए हे परमात्मन्! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक-एक कदम आगे बढ़ती आ रही है और अब तब में दबोचने ही वाली है। इससे पूर्व हम अपने अन्तःकरण को, आनन्द को, भविष्य को निरन्तर मारते-कुचलते रहते हैं। हे परम प्रभु! इस महामरण से हमें बचा लें और हमें अपनी गोद में बिठाकर अमृत का रसास्वादन करा दे।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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