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संसार के सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रन्थ ‘वेद’ में किसी विशेष धर्म या जाति सम्बन्धी नीति-नियमों का उल्लेख नहीं किया गया है, बल्कि मनुष्य को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की गई है, जिससे वह स्वयं देव-मानव बनकर संसार में दैवी प्रकृति के व्यक्तियों का निर्माण कर सके, ताकि समाज को निम्रगामी होने से बचा सके और उसे उच्च स्थिति की तरफ ले जा सके।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेद ने पहला साधन बतलाया है-तन्तुं तत्वन्रजसो भानुमिन्विहि (ऋग० १०.५३.६)  अर्थात् तुम सांसारिक कार्यों को करते हुए सदैव प्रकाश (ज्ञान) का आश्रय लो। जो कार्य ज्ञानपूर्वक किया जायेगा, उसका परिणाम कभी अशुभ नहीं हो सकता, उसका शुभ फल देर में या शीघ्र अवश्य मिलेगा। मनुष्य का पहला लक्षण ज्ञान ही है और मनुष्य तथा पशु में मुख्य अंतर यही है कि पशु को ज्ञान, विवेक, बुद्धि नहीं होती। जो मनुष्य ज्ञान से काम नहीं लेता अथवा अज्ञान में रहना ही पसंद करता है, उसे मनुष्य की बजाय पशु कहना ही अधिक उपयुक्त है।
मनुष्यता को सार्थक करने के लिए दूसरा आदेश वेद ने यह दिया कि  ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् अर्थात् जिन ज्योतिर्मय (ज्ञान अथवा प्रकाश) मार्गों से हम श्रेष्ठ कर्म करने में समर्थ हो सकते हैं, उनकी रक्षा की जाय। मनुष्य का काम केवल अकेले ही ज्ञान सम्पादन करने से नहीं चल सकता, वरन् उसको संसार में सर्वत्र ज्ञान प्रसार की चेष्टा करनी चाहिए। यदि बहुसंख्यक लोग अज्ञानी ही बने रहें, तो उनके उलटे-सीधे कामों से ज्ञानियों को भी अवश्य कठिनाई में पड़ना होगा। मनुष्य केवल अपने कृतकर्मों का ही परिणाम नहीं भोगता, वरन् जिस समाज में वह रहता है, उसके सामूहिक कर्मों का प्रभाव भी उस पर अवश्य पड़ता है। मनुष्य स्वयं चाहे जैसी स्वच्छता से रहे, अगर उसके आसपास के अधिकांश व्यक्ति गंदे रहते हैं, दूषित पदार्थों का उपयोग कर वातावरण को बिगाड़ते हैं, तो उसका कुप्रभाव न्यूनाधिक परिणाम में उस स्वच्छता वाले व्यक्ति को भी सहन करना पड़ेगा। इसीलिए वेद ने आज्ञा दी है कि प्रकाश (ज्ञान) के मार्गों की इस प्रकार रक्षा की जाय कि जिससे सभी लोग उनका उपयोग करके श्रेष्ठकार्य करने में समर्थ हो सकें।
ज्ञान के पश्चात् कर्म का नम्बर आता है। ज्ञान की आवश्यकता इसीलिए है कि मनुष्य जो कर्म करता है, वह उचित और लाभदायक ढंग से किये जायें। अगर हम ज्ञान की बातों को केवल सुनते और कहते ही रहें और कर्म के रूप में उनका उपयोग न करें, तो हमारा वह ज्ञान मिथ्या अथवा व्यर्थ ही है। इसी बात को लक्ष्य में रखकर उपर्युक्त मंत्र में अनुल्बणं वयत जोगुवामपो का उपदेश दिया गया है कि कार्य में उपस्थित होने वाले विघ्रों को दूर करो अथवा ऐसी ज्ञानयुक्त विधि से काम करो, जिससे कार्य में विघ्र अथवा कठिनाइयाँ उत्पन्न न हों। मनुष्य जन्म लेकर कर्म तो करना ही पड़ेगा, उससे तो मनुष्य किसी दशा में छूट ही नहीं सकता। पर एक मनुष्य कार्य को ऐसे ढंग से करता है कि उससे उसको और दूसरों को भी लाभ होता है और कुछ ऐसे भी काम करने वाले हैं, जो दूसरों का ही नहीं, अपना भी अहित कर डालते हैं। संसार में अपने पैरों पर आप ही कुल्हाड़ी मारने वालों अथवा जिस पेड़ पर चढ़े हैं, उसी को काटने वालों की कमी नहीं है। ऐसे ही अज्ञानी जन समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होने के कारण बनते हैं और सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाते हैं। मनुष्यत्व के सच्चे अभिलाषी व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है कि वह स्वयं ऐसे समाज विरोधी कार्यों से बचे और दूसरों को भी उनसे दूर रखने की बराबर चेष्टा करता रहे। 
जो मनुष्य इन वेदोपदेशों को हृदयगंम करके ज्ञान-मार्ग पर चलें, उन्हीं के अनुकूल कर्म करें, दूसरे लोगों में भी ज्ञान का प्रचार करें और तदनुकूल जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दें, वे ही सच्चे मनुष्य की संज्ञा के अधिकारी हो सकते हैं। मनुष्य का सर्वोच्च कर्त्तव्य और लक्षण परोपकार बतलाया गया है और उसके लिए सम्यक् ज्ञान का होना अनिवार्य है। जो मनुष्य नियमपूर्वक लगातार इस मार्ग पर चलता रहेगा और अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य का उपयोग अपने साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त लोगों के हितार्थ करता रहेगा, वह समय आने पर मनुष्य से उठकर देवत्व के दर्जे में  पहुँच जायेगा। इस प्रकार का देवत्व किसी के कहने-सुनने अथवा उपाधि प्रदान करने से नहीं मिल सकता, वरन् उसका साधन सत्य मार्ग का सतत अनुयायी बना रहना और परोपकार का पूर्ण ध्यान रखना ही है। ऐसे ही देवत्व को प्राप्त मनुष्य अपने आचरण, मनोबल और शुभ संकल्पों के प्रभाव से अपनी संतान को अपने से भी अधिक श्रेष्ठ गुण सम्पन्न बनाकर, जनता के लिए अनुकरणीय आदर्श स्थापित करने में समर्थ हो सकते हैं।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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