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संसार में समस्त दुःखों की जननी कुबुद्धि है- भूतकाल के कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दुःख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुतः दुःख का अस्तित्व ही नहीं है। कष्टों का कारण तो केवल ‘कुबुद्धि’ है। यही कुबुद्धि हमें आनंद से वंचित करके नाना प्रकार के दुःखों में फँसा देती है। 
कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है। पूर्व जन्म के प्रारब्धगत पाप भी पूर्व जन्मों की कुबुद्धि के परिणाम हैं। इसलिए यही मालूम पड़ता है कि जो भी कठिनाई हमारे सामने आती है, वर्तमान काल की या भूतकाल की, कुबुद्धि ही उसका मूल कारण है। इस कुबुद्धि से बचने के लिए सद्बुद्धि की आवश्यकता होती। 
सद्बुद्धि का सूत्र है- गायत्री महामंत्र। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक  प्रभाव परिलक्षित होता है।
गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। गायत्री उपासना के फलस्वरूप मस्तिष्क में सद्विचार और हृदय में सद्भाव उत्पन्न हो जाते हैं, जिसके कारण मनुष्य का जीवन क्रम ही बदल जाता है। सद्भावना की वृद्धि के साथ-साथ उसे अनायास ही अनेक प्रकार के सुख-सौभाग्य उपलब्ध होते हैं। साथ ही, उसके समीप रहने वाले, पड़ोसी एवं संबंधी भी उसकी समीपता से सुख तथा संतोष लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी रहते हैं, वहाँ सुखद वातावरण उत्पन्न करते हैं। विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों में गायत्री महामंत्र का भाव कुछ इस प्रकार है-
हिन्दू- ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुखस्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दे।  -ऋग० ३.६२.१०, यजुर्वेद ३६.३, साम. १४६२
यहूदी- हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा। -पुराना नियम भजन संहिता ५.८
शिंतो- हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें, परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे हृदय में अभद्र बातों का अनुभव न हो। -जापानी।
पारसी- वह परम गुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भण्डार के कारण, राजा के समान महान् है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है। -अवेस्ता २७.१३
दाओ (ताओ)-  दाओ (ब्रह्म) चिंतन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उत्तम धर्म है। - दाओ उपनिषद्
जैन- अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार।
बौद्ध धर्म- मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ। - दीक्षा मंत्र/त्रिशरण
कानफ्यूशस- दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने  प्रति नहीं चाहते। 
ईसाई- हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है। -नया नियम मत्ती ६.१३
इस्लाम- हे अल्लाह! हम तेरी ही वन्दना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्र्रष्ट हुए। -कुरान सूरा अल-फातिहा
सिख- ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्त्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, निर्वैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू  है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है। -ग्रंथ साहिब, जपुजी
बहाई- हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्वनिर्भर। इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी धर्म-सम्प्रदायों में ईश्वर के प्रति जो भाव व्यक्तहुए हैं, वे सब गायत्री मन्त्र में सन्निहित भावनाओं-प्रेरणाओं को ही मुखरित करते हैं।
गायत्री महामंत्र को आदिकाल से गुरु मंत्र कहा गया है। गुरु का कार्य है- साधक को परमात्म सत्ता का ठीक-ठीक बोध करा देना। गायत्री महामंत्र समर्थ गुरु की तरह साधक को परमात्म सत्ता का बोध कराने और उनके साथ जोड़ देने में समर्थ है।
सद्बुद्धि एक शक्ति है, जो जीवन-क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की परिस्थितियों भी बदलती हैं। रेडियो की सुई घुमा देने से कोई दूसरा प्रोग्राम सुनाई पड़ने लगता है। कुबुद्धि के मीटर से सद्बुद्धि की ओर सुई घुमाई जाती है, तो पहले गाने बंद होकर मंगलमय नवीन संदेश सुनाई पड़ते हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख-शांति का वरदान प्राप्त करता है।
मनुष्य मात्र को उज्ज्वल भविष्य प्रदान करने में सक्षम गायत्री महाविद्या-सबके लिए सुलभ, साध्य एवं हितकर है।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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