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     रूपी साँचे में ढलकर ही मनुष्य जीवन बनता है। अतः यदि जीवन को उच्च बनाना है, तो आवश्यक है कि हम पहले व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनायें। श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही दिव्य जीवन की निशानी है। गुण, कर्म, स्वभाव इन तीनों का परिष्कार लाने से ही सही रूप में व्यक्तित्व निखरता है और निखरा हुआ व्यक्तित्व ही आकर्षक प्रतीत होता है। पूर्ण व्यक्तित्व अंतर और बाह्य दोनों स्तरों के सम्मिश्रण से ही बनता है। जहाँ आंतरिक सुधार आवश्यक है, वहीं भौतिक जीवन के दैनिक कार्यक्रमों में भी उत्कृष्टता बनाये रखना जरूरी है।
जीवन सरसता लिए होना चाहिए। यह सरसता अपने अन्दर धारण करने से उत्पन्न होती है। प्रसन्न मुख रहने वाले व्यक्ति की ओर सभी आकर्षित होते हैं। जो रोनी सूरत बनाये रखता है, उसके पास कोई फटकना पसंद नहीं करता। नीरस व्यक्ति के मुख का सौन्दर्य भी विकृत हो उठता है। हँसना एक गुण है, जिसका व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं चरित्र पर प्रभाव पड़ता है। 
आकर्षक व्यक्तित्व की कुंजी तो बाह्य और आंतरिक सुन्दरता में निहित है। मनुष्य अपने अंतःकरण का प्रतिबिम्ब है। प्रसन्नता से पता चलता है कि व्यक्ति का मानस स्वस्थ है। स्वाभाविक मुस्कान से मन का भार हलका हो जाता है। दुःख की स्थिति में भी मुस्कुराने वाला व्यक्ति अपने मन को शुभ भावनाओं एवं सद्विचारों से आच्छादित रखता है। सब जीवों में मनुष्य जाति की एक बड़ी विशेषता है-हँसना। यह ईश्वर द्वारा मनुष्य को इसलिए दी गयी है कि वह क्षण भर में अपने दुःख-दर्दों से मुक्ति पा सके। मुस्कान एक ऐसी औषधि है, जिससे व्यक्ति के शरीर में स्फूर्ति एवं शक्ति आती है। कार्य में उत्साह उत्पन्न होता है, जो हमारे व्यक्तित्व के गठन में सहायक है। गंभीरता व्यक्ति के लिए आवश्यक है, किन्तु इससे भी अधिक आवश्यकता प्रसन्नता की है। हँसी व्यक्ति में प्राण शक्ति का संचार करती है, जो व्यक्ति को गतिशील एवं उन्नतिशील बनाती है। आकर्षक व्यक्तित्व प्रसन्नता एवं गंभीरता के मिश्रण से ही पूर्ण मुखरित होता है।
गुणों का विकास ही व्यक्तित्व के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। हममें नम्रता और सौम्यता होनी चाहिए। इससे हम अनेक दुुर्गुणों से बचते व दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि अनीति या गलत बात के सम्मुख भी हमें अपने स्वभावनुकूल झुक जाना चाहिए।
सोचने का ढंग भी मनुष्य के चरित्र विकास का महत्त्वपूर्ण अंग है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य के पीछे उसके विचारों की ही प्रेरणा होती है। विचारों के अनुसार ही व्यक्ति के बोलने-चालने देखने का ढंग भी होता है। मनुष्य जीवन का प्रत्येक भाग उसके मस्तिष्क में उठने वाले विचारों से प्रभावित होता है। विचार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को विनिर्मित करते हैं। जैसे विचार होंगे, वैसा चरित्र बनेगा और जैसा चरित्र होगा, वैसा ही व्यक्तित्व बनेगा।
मानवीय विकास का अगला चरण है, अंतःकरण को भाव संवेदनाओं से अभिपूरित करना। इसके लिए दूसरों की सहानुभूति मनुष्य की आंतरिक शक्तियों में से एक है। सहानुभूति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली वह कोमलता है, जिसका निर्माण संवेदना, दया, प्रेम और करुणा के सम्मिश्रण से होता है। वह आत्मा की निःस्वार्थ भाषा है, जिसकी वाणी मूक है, किन्तु हर हृदयवान् उसे समझ लेता है। प्रेम, दया एवं करुणा ऐसे मानवीय गुण हैं, कि इनके अभाव में एक पल चलना भी भारी हो जाता है; किन्तु आज का विचारवान् मनुष्य इन पर गहराई से ध्यान नहीं देता। प्रेम के अभाव में जीवन वीरान हो सकता है। करुणा, दया, सहयोग, के अभाव में समाज या परिवार का ढाँचा भी नहीं बन सकता। 
हर मनुष्य सहानुभूति का भूखा होता है। दुःख में संवेदना, दया किसी कीमती दवा से कम नहीं है। आपत्ति के समय प्रेम के, सांत्वना के दो शब्द शांति देते हैं। इसका अनुभव हर व्यक्ति को होगा। किसी की सहानुभूति मेरे साथ है, यह अनुभव मात्र मनुष्य को साहस प्रदान करता है। शारीरिक, आर्थिक या भौतिक रूप से उस सहानुभूति का हमारे स्वास्थ्य से गहरा संबंध है।
व्यक्तित्व की महानता का मूल्यांकन भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, जो व्यक्ति को आत्मिक सुख और आनन्द की अनुभूति कराते हैं। दुःख में हमारी भूख मर जाती है और खुशी में दो रोटी ज्यादा खा लेते हैं। यह तथ्य सिद्ध करता है कि महान् विचारों और गुणों का शरीर व मन पर गहरा प्रभाव है। स्वस्थ शरीर तथा स्वच्छ मन का निर्माण सद्गुणों से ही होता है। अतः सद्गुण ही सच्ची सम्पत्ति है। 

प्रस्तुती- शान्तिकुञ्ज


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