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अनन्त काल से मनुष्य को यह प्रश्र विस्मित करता रहा है कि वास्तव में ये जीवन क्या है? इसको जीवन और जगत् के आधार पर जानने की जिज्ञासा मनुष्य के मन से समाप्त नहीं हुई। जब तक इस समस्या का सच्चा समाधान नहीं मिल जाता, यह जिज्ञासा बनी रहेगी। जीवन के संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएँ प्रचलित हैं।
शून्यवादियों के अनुसार सृष्टि के प्रत्येक कण में  प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। किसी चीज का अस्तित्व नहीं है। वर्तमान ही सत्य है। शून्यवाद का भूत भविष्य को न स्वीकार कर वर्तमान को स्वीकारना ठीक वैसा ही है जैसा कि माता-पिता के अस्तित्व को अस्वीकार कर बच्चे के अस्तित्व को स्वीकार करना। भूत एवं भविष्य को स्वीकार किये बिना वर्तमान की कल्पना भी संभव नहीं है। भूत, वर्तमान एवं भविष्य का अस्तित्व एक दूसरे के सापेक्ष है। 
दूसरी ओर विज्ञान की यह मान्यता है कि विश्व की मूल सत्ता अज्ञेय है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सृष्टि की हलचलों का कारण परमाणुओं का परस्पर संघात है। समस्त ब्रह्माण्ड में एक स्वसंचालित प्रक्रिया चल रही है। उनके अनुसार चेतना की उत्पत्ति भी जड़ परमाणुओं के परस्पर संगठन के कारण हुई है। आत्मा, मन जड़ शरीर के ही परिणाम हैं अर्थात् शरीर का नाश होते ही आत्मा का भी अस्तित्व नहीं रहता। 
विज्ञान की यह मान्यता भी सत्य प्रतीत नहीं होती, क्योंकि इस तथ्य में यह विचारणीय है कि यदि जड़ परमाणुओं के संगठन एवं हलचल मात्र से शरीर का गठन हो जाता है, तो वह कौन सी शक्ति है, जो परमाणुओं में हलचल उत्पन्न करती तथा उनकी परस्पर संगठित करके सुन्दर शरीर में रूपान्तरित करती है। ऐसी कौन सी शक्ति है, जो कुछ परमाणुओं को लेकर एक प्रकार के शरीर तथा दूसरे से भिन्न प्रकार का शरीर निर्माण कर देती है। यदि पूछा जाय जो विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं है। 
यदि वैज्ञानिकों की मान्यताएँ सत्य हैं, तो वैज्ञानिक उन तत्त्वों को जिनसे शरीर बनता है, को लेकर जीव का निर्माण क्यों नहीं कर डालते? आज तक की सम्पूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ स्वयं साक्षी हैं कि वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ एक क्षुद्र से क्षुद्र जीव का निर्माण भी नहीं कर सकीं। यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा जड़ परमाणुओं के परस्पर संघात का प्रतिफल नहीं, वरन् एक स्वतंत्र सत्ता है। जो शक्ति प्रकृति के तत्त्वों को लेकर सुन्दर शरीर के रूप में रूपान्तरित करती तथा जो शरीर के अंदर चेतना के रूप में व्यक्त होती है, दोनों एक हैं।
यह सत्य है कि पदार्थ विज्ञान की अन्वेषण क्षमता सीमित है, लेकिन इस आधार पर चेतना के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जाना चाहिए। अच्छा हो यदि चेतना के अस्तित्व को इंकार करने तथा जड़ वस्तुओं के साथ उसकी नश्वरता की मान्यता प्रतिपादित करने के स्थान पर यदि सत्य को जानने का प्रयास करें, तो स्पष्ट होगा कि वस्तुतः जड़ का ही अपना अस्तित्व नहीं है। जड़ जगत् वस्तुतः शक्ति की एक अवस्था विशेष है।
जो अपरिवर्तित एवं अविनाशी है उसी तत्त्व को दार्शनिकों ने आत्मा कहा है। जीवन का वही आधार है। जीवन-मृत्यु से वह रहित है। यह स्वाभाविक भी है, जो स्वयं अनंत, असीम है, ऐसे तत्त्व की व्याख्या सीमित साधनों एवं उपकरणों द्वारा संभव नहीं है। भौतिक विज्ञान की सत्य शोधन की क्षमता सीमित है। एक स्तर तक सूक्ष्म-सूक्ष्मतर प्रेरणा करते चले जाने के बाद वह यह बताने लगता है कि इससे आगे की सूक्ष्मता की पकड़ वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा संभव नहीं। जितना भी वैज्ञानिक अन्वेषण है, उसे ज्योति साधना कहा जा सकता है। विचारों की ज्योति की सीमा आपेक्षिकता सिद्धान्त एवं अनुभूति तक है। विचार भी उपकरण ही हैं। पदार्थ उपरकरणों की ज्योति के प्रकाश की सीमा सूक्ष्मतम तंरगों या रश्मियों तक हैं, लेकिन दोनों ही प्रकार की सत्य की अनुभूतियाँ मनुष्य की चेतना में प्रतिष्ठित ज्योति द्वारा ही अनुभव की जा सकती है।
लेकिन परम तत्त्व तो ज्योतियों की भी ज्योति है। उसे किस ज्योति द्वारा जाना जाय? भौतिकी की साधनभूत ज्योति उस ज्योतियों की ज्योति चेतना को जानने में असमर्थ है। तपः शुद्ध चेतना में वह ज्योति स्वतः प्रकट होती है, यों वह विद्यमान तो सदैव ही है। वृहदारण्यक् उपनिषद् में  कहा गया है कि आत्मा ही वह ज्योति है, उसके द्वारा व्यक्ति स्थित होता, गतिशील रहता, क्रियाशील रहता एवं वापस लौट जाता है।
चेतन सत्ता का वास्तविक स्वरूप ऋतम्भरा प्रज्ञा, अंतरात्मा या अंतर्मन द्वारा ही जाना जा सकता है। अंतर्प्रज्ञा जिसे इन्ट्यूशन कहा गया है, जब विकसित हो जाती है, तो सोचने का तरीका ही बदल जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह व्यक्ति जोर से उद्घोषणा करे कि ‘ईश्वर है।’ कहने का तात्पर्य यही है कि जीवन व जगत् के वास्तविक तथ्य को भौतिक उपकरणों व अन्वेषणों द्वारा नहीं जाना जा सकता है।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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