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मनुष्य भटका हुआ देवता है। यह भटकाव और कुछ नहीं मात्र विचारों की विकृति है। यदि सही चिन्तन, तथ्य, तर्क और प्रमाणों की खोज करते हुए अपने लिए सही मार्ग अपनाये, तो साधारण से साधारण मनुष्य हँसी-खुशी का जीवन जीते हुए अपने लिए प्रगति का पथ-प्रशस्त कर सकता है और दूसरों के लिए इतना उपयोगी हो सकता है कि उसकी उपस्थिति-समीपता भर से आनन्द की अनुभूति हो, भले ही कोई प्रत्यक्ष सहयोग-सहायता का सुयोग उस सान्निध्य में बन पड़े।
इसके विपरीत दुर्गुणी व्यक्ति अपने निज की दुरभिसंधियों से अपने लिए तो विपत्ति निमंत्रित करता ही है, साथ ही देखने-सुनने वालों तक के मन में विक्षोभ पैदा करता है। अकारण उन्हें दुःखी एवं उद्वेलित करता है। दुर्घटनाओं की प्रतिक्रिया हर किसी पर विक्षोभकारी होती है। इसलिए दुर्गुणी और दुराचारी व्यक्ति अपने और दूसरों के लिए अभिशाप बनकर ही रहता है। प्रकारान्तर से दूर-दूर तक का वातावरण उसके कारण आक्रोश, उद्वेग से भरने लगता है।
यह विचार विभ्रम का ही दुष्परिणाम है कि शालीनता का राजमार्ग छोड़कर लोग अनाचार पर उतरते हैं और बहुत पाने के, जल्दी बटोरने के लालच में अपनी साख गँवा बैठते हैं। अविश्वासी लोगों को  दरिद्रता और भर्त्सना का भाजन ही बने रहना पड़ता है। ऐसी दशा में लक्ष्मी उनके यहाँ टिके भी कैसे? हराम का पैसा गुनाहों में खर्च होता है और प्रकृति के नियमानुसार भी बीमारी, मुकदमेबाजी, प्रतिशोध, ईर्ष्या, घृणा, तिरस्कार जन्य अन्यान्य अवांछनीय घटनाओं के माध्यम से वह सब कुछ गँवा बैठता है, जो अतिशय लालच के वशीभूत होकर अवांछनीयता अपनाकर किसी प्रकार संग्रह किया गया था। कुविचार ही आर्थिक क्षेत्र के अनाचारों में परिणत होते देखे गये हैं।
मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है। व्यक्तित्व विकास एवं भाग्य निर्माण में इन्हीं की महती भूमिका होती है। सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति आदि सभी मनुष्य के अपने विचारों पर निर्भर करते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार जानकर उसके जीवन के स्वरूप को सहज ही मालूम किया जा सकता है। मनुष्य को कायर-वीर, स्वस्थ-अस्वस्थ, प्रसन्न-अप्रसन्न कुछ भी बनाने में उसके विचारों का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। स्पष्ट है कि विचारों के अनुरूप ही मानव जीवन का निर्धारण होता है। अच्छे विचार उसे उन्नत बनायेंगे, तो उनकी निकृष्टता उसे गर्त में धकेलेगी। विचार चेतना क्षेत्र की एक विशिष्ट सम्पदा है। इसी के आधार पर मनुष्य जीवन का उपयोग करता, योजनाएँ बनाता और उन्हें पूरी करता है। विचारशील व्यक्ति सामर्थ्यवान माने जाते हैं। इसके विपरीत विचारहीनों की गणना नर-पशुओं में की जाती है। विचार क्षमता को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, सत्परामर्श आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते, वे कूप-मण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते। इसीलिए जहाँ चेतना की विचार शक्ति पर विचार किया जाता है, वहाँ प्रकारान्तर से उसे विचार शक्ति का विशेष सुनियोजन किया जाना कहा जाता है। विचारशील ही महत्त्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्त्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
संसार एक दर्पण है। इस पर हमारे विचारों की जैसी छाया पड़ेगी, वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाई देगा। इसके आधार पर ही सुखमय अथवा दुःखमय सृष्टि का सृजन होता है। संसार के समस्त विचारकों ने एक स्वर से उसकी शक्ति और असाधारण महत्ता को स्वीकार किया है। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था- ‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, वैसा ही उसका जीवन बनता है।’ स्वामी विवेकानन्द के अनुसार- ‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इसका निवास हमारे चिन्तन  चेतना में ही है।’ भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- ‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं, अपने विचारों के ही कारण हैं और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे, वह इसी के कारण।’ शेक्सपियर ने लिखा है-‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई और बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।’ ईसा ने कहा था- ‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, वैसा ही वह बन जाता है।’
संक्षेप में जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करने में हमारे विचारों का ही प्रमुख हाथ रहता है। मानवी महानता का सारा श्रेय उस सद्ज्ञान-सद्विचार को है, जो उसकी चिन्तन-प्रक्रिया एवं कार्य-पद्धति को आदर्शवादी परम्पराओं का अवलम्बन करने की प्रेरणा देता है। सौभाग्य और दुर्भाग्य की परख इस सद्ज्ञान व सद्विचार सम्पदा के मिलने, न मिलने की स्थिति को देखकर की जा सकती है। जिसे प्रेरक प्रकाश न मिल सका, वह अँधेरे में भटकेगा, जिसे सद्ज्ञान व सद्विचार की ऊर्जा से वंचित रहना पड़ा, वह सदा पिछड़ा और पतित ही बना रहेगा। पारस छूकर लोहे को सोना बनाने वाली किम्बदन्ती सच हो या झूठ, यह सुनिश्चित तथ्य है। सद्ज्ञान व सद्विचार की उपलब्धि मनुष्य को सौभाग्य के श्रेष्ठतम स्तर तक पहुँचा देती है।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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