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विश्व रंगमंच के उच्चतम पदों पर पहुँचे और महानता के उच्च शिखर पर जा चढ़े व्यक्तियों के जीवन इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं, तो उनके विकास में सामाजिक परिस्थितियों, शिक्षा एवं साधनों आदि का सीमित योगदान रहा है। माँ के प्रति अनन्य श्रद्धा-भाव ने ही उन्हें सफलता के शिखर तक पहुँचाया है। यह भाव न केवल उनके जीवन के आरंभिक काल में बना रहा, वरन् अंतिम समय तक प्रेरणा देता रहा है। अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जनरल ग्राण्ट के जीवन की एक मार्मिक घटना इस प्रकार है- ग्राण्ट रविवार को  सपरिवार गिरजाघर जाकर प्रार्थना किया करते थे। एक बार सपरिवार सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित थे। ग्राण्ट के छोटा पुत्र के शोर मचाने  से उनका ध्यान भंग हो गया। उन्होंने बच्चे को चुप रहने का संकेत किया, पर वह नहीं माना। क्रोधित होकर ग्राण्ट ने बच्चे को दो-तीन थप्पड़ जड़ दिये। इतने में ग्राण्ट की वयोवृद्ध माता उठीं और बच्चे को सहलाते हुए हृदय से लगा लिया और उसे चुप कराया। चुप होते ही ग्राण्ट की ओर मुड़ीं और तीन-चार थप्पड़ उन्हें लगा दिये। उपस्थित लोगों में खलबली मच गयी। अवाक् हुए सभी इस घटना को देखते रहे। तभी ग्राण्ट अपनी माँ के चरणों में बैठते हुए बोले- माँ मेरा ऐसा कौन-सा गंभीर अपराध था, जिसका दण्ड तुमने मुझे दिया। माँ का हृदय भर आया। उन्होंने बेटे को सीने से लगाते हुए कहा कि जिस अपराध के कारण तुमने बच्चे को दण्ड दिया है, वही तुमने भी किया  है। बच्चा तो शोर मचा रहा था, पर तेरा ध्यान कहाँ था। तुम्हारा मन तो स्वयं चंचल था। इस प्रार्थना से क्या लाभ? ग्राण्ट ने अपनी त्रुटि स्वीकार की और भाव-विभोर होकर बोले-सचमुच माँ तेरे  कारण ही हम राष्ट्रपति पद तक पहुँच सके हैं।
राष्ट्रपति आइजन होवर कहा करते थे कि अब तक मैं जो कुछ भी बन सका हूँ, वह माँ की स्नेहपूरित प्रेरणा एवं प्रशिक्षण का ही प्रतिफल है।
अब्राहम लिंकन जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तो अपनी सफलता के विषय में उन्होंने कहा- मैं जो कुछ बन पाया हूँ, या आगे आशा करता हूँ, उसका सारा श्रेय और गौरव मेरी माता को है।
सिकन्दर कहा करता था- अपनी माँ की आँखों के एक आँसू को मैं सम्पूर्ण साम्राज्य से भी बढ़कर मानता हूँ।
शिवाजी, राणाप्रताप से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों भगतसिंह, आजाद तक सभी ने माँ के आँचल में बैठकर ही शासन, पराक्रम एवं चरित्रनिष्ठा का पाठ पढ़ा था। मातृ भूमि के प्रति त्याग-बलिदान का बीजारोपण बचपन में ही हुआ था। महात्मा गाँधी और विनोबा को महामानव की श्रेणी में पहुँचाने में उनकी माताओं का असामान्य योगदान रहा है। जिन दिनों गाँधी जी विलायत अध्ययन के लिए जा रहे थे, उनकी माँ ने उनसे सदाचार और सत्य की प्रतिज्ञा कराई थी, जिसका निर्वाह वे जीवनपर्यंत करते रहे। माँ के प्रति अनन्य भक्ति उनका पथ-प्रदर्शन करती रही। गाँधी जी कहते थे कि सदाचार एवं सत्यनिष्ठा का जो पाठ हमारी माँ ने पढ़ाया, वह मेरे जीवन का मूलमंत्र बन गया। बचपन में त्याग और बलिदान के संस्कारों को अपनी ममता के साथ पिलाने वाली माँ के उदार हृदय की यह घटना कितनी प्रेरणाप्रद है। 
ऐसी एक महान् माता जिनका उल्लेख यहाँ किये बिना नहीं रहा जाता, वह है माता भगवती देवी शर्मा, जिनको गायत्री परिवार के परिजन माताजी के नाम से जानते हैं। माताजी का शरीर तो १९ सितम्बर १९९४ को ही पंचतत्त्वों में विलीन हो गया था, लेकिन आज भी गायत्री परिवार के सदस्य अपने हृदय में माँ का संस्पर्श सदैव अनुभव करते हैं, क्योंकि जिस तरह माँ ने अपने लाखों मानस पुत्रों  को प्यार, ममता, आत्मीयता एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया है, उससे उनका जीवन धन्य हो गया। उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। ममतामयी मातृशक्ति की गाथा से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, जिन्होंने अपने ही कोख से जन्मे, बच्चों को सही रास्ता दिखाया, मार्गदर्शन दिया, प्यार किया, लेकिन इस माता ने तो कितने ही बच्चों की जीवन धारा को बदल दिया। अनेकों के जीवन में आध्यात्मिकता की लहर दौड़ा दी। ऐसे माँ को कोटि-कोटि नमन। 
विश्व के मूर्धन्य तत्त्वविदों ने इस तथ्य को एकमत से स्वीकार किया है कि न केवल व्यक्ति, वरन् समाज और राष्ट्र का समग्र विकास मातृ-शक्ति की गरिमा की प्रतिष्ठा द्वारा ही संभव है। फारसी के एक कवि ने बड़े मार्मिक ढंग से कहा है- ‘जेरे कदमें वाल्दा, फिरदौसे वरी’ अर्थात् माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है। प्रकारान्तर से स्वर्गीय परिस्थितियों के सृजन के मूलभूत रहस्य का जो उद्घाटन उन पंक्तियों में किया गया है, वह है- मातृ-शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा। एक यहूदी कहावत है- ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं हो सकता, इसलिए माताओं को भेज देता है। यह मातृ-श्रद्धा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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