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गीता का कथन है-ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में और कुछ नहीं। विवेकानन्द कहते थे, हमारे सारे संकट और दुःख मात्र इस कारण हैं कि हम अपने और अपने समय के समाज के बारे में बहुत कम जानते हैं, फलतः यह समझ नहीं पाते कि कठिनाइयों के निराकरण एवं सुविधाओं के संवर्धन का प्रयोजन किस आधार पर पूरा किया जा सकता है। भटकाव ही समस्त समस्याओं का एकमात्र कारण है। यदि हम वस्तुस्थिति को समझने में समर्थ हो सकें, तो भूल-भुलैयों में इस प्रकार न भटकें कि ठोकरें खाते और रोते-कलपते दुर्दैव सहन करना ही पड़े। निर्वाह साधनों की ही तरह हमें सद्ज्ञान के संचय को भी महत्त्वपूर्ण कार्य मानना चाहिए।
कन्फ्यूशस का कथन है-रात भर प्रार्थना करने की अपेक्षा एक घण्टे का सद्ज्ञान संग्रह अधिक अच्छा है। शहीद के समक्ष विचार की कलम और स्याही कम पवित्र नहीं है। दूसरों की कठिनाइयों को हल्की करने के लिए उनके लिए साधन जुटाना ही उदारता नहीं है, वरन् यह भी है कि उन्हें उलझाने का कारण और समाधान बताकर और भविष्य में अपने बलबूते त्राण पाने का रास्ता बताया जाय। यह स्वाध्याय ऐसे ग्रंथों का होना चाहिए, जो हमें यथार्थता के समीप पहुँचा सके और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत किया गया हो।
एक स्पेनिश पत्रकार ने एक बार महात्मा गाँधीजी से पूछा- आप अब जिस रूप में हैं, वह बनने की प्रेरणा कहाँ से मिली? उन्होंने बताया- भगवान् श्रीकृष्ण, महापुरुष ईसा, दार्शनिक रस्किन और संत टॉलस्टॉय से। 
पत्रकार अचंभे में आ गया। उसने अनुभव किया- इनमें से कोई भी तो गाँधीजी के समय में नहीं रहा, पर फिर उनसे प्रेरणा वाली बात वह कैसे कहते हैं। उसने अपनी आशंका व्यक्त की, इस पर गाँधीजी बोले- महापुरुष सदैव बने नहीं  रहते, यह ठीक है। समय के साथ उनको भी जाना पड़ता है; किन्तु विचारों, पुस्तकों के रूप में उनकी आत्मा इस धरती पर चिरकाल तक बनी रहती है, जिन्हें लोग कागज के निर्जीव पन्ने समझते हैं, उनकी आत्मा उन्हीं में लिपटी रहती है, उनमें जीवित रहे लोगों को दीक्षित करने, संस्कारवान् बनाने और जीवनपथ पर अग्रसर होने के लिए शक्ति, प्रकाश और प्रेरणाएँ देने की सामर्थ्य बनी रहती है। मुझे भी इसी प्रकार उनसे  प्रकाश मिला है।
गीता के प्रतिपादन प्रत्येक शंकाशील, व्यक्ति का सही मार्गदर्शन कर सकते हैं। संसार में रहकर कर्म करते हुए भी किस तरह विरक्त और योगी रहा जा सकता है, यह बातें मुझे ‘गीता’ ने पढ़ाई। इस तरह मैं भगवान् श्रीकृष्ण से दीक्षित हुआ। दलित वर्ग से प्रेम व उनके उद्धार की प्रेरणा मुझे ‘बाइबिल’ से मिली, इस तरह मैं महापुरुष ईसा का अनुयायी बना। युवा अवस्था में ही मेरे विचारों में प्रौढ़ता, कर्म में प्रखरता तथा आशापूर्ण जीवन जीने का प्रकाश- ‘अन टु दिस लास्ट’ से मिला। इस तरह रस्किन मेरे गुरु हुए और बाह्य सुखों, संग्रह और आकर्षणों से किस तरह बचा जा सकता है, वह विद्या मैंने ‘दि किंगडम ऑफ गाड विद इन यू’ से पाई। इस तरह मैं प्राणपुंज इन पुस्तकों के सान्निध्य में नहीं आया होता, तो अब मैं जिस रूप में हूँ, उस तक पहुँचने वाली सीढ़ी से मैं उसी तरह वंचित रहा होता, जिस तरह स्वाध्याय और महापुरुषों के सान्निध्य में न आने वाला कोई भी व्यक्ति वंचित रह जाता है।
स्वाध्याय वस्तुतः आत्मोन्नति का ऐसा ही साधन है। स्वाध्यायात् मा प्रमदः विद्याध्ययन से, स्वाध्याय से कभी भी प्रमाद नहीं करना, ऋषियों की इस शिक्षा में यही तथ्य सन्निहित है। दीन-हीन जीवन को ऊँचा उठाने की शक्ति उसी से मिलती है, इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने  भी सफल व्यक्ति और महापुरुष हुए हैं, उनको आगे ले जाने वाला यान किसी न किसी पुस्तक की प्रेरणा के रूप में ही मिला है।
चार्ल्स डार्विन जिन्हें विकासवाद सिद्धान्त का जनक कहा जाता है, पुस्तकों के अनन्य भक्त और प्रेमी थे। ह्वाइट की सेलबोर्न हेनरी तथा पार्क की केमिकल कैरसिज्म तथा वान्डर्स आफ दि वर्ल्ड ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया था। इन्हीं पुस्तकों के स्वाध्याय ने ही उनके मस्तिष्क में इस नये दर्शन की पृष्ठभूमि विनिर्मित की थी।
माइकेल फैराडे, मार्कोनी गैलेसियस, हम्फी डैवी हों या भारतीय इतिहास के नक्षत्र सुभाष, शास्त्री, राधाकृष्णन और सरदार वल्लभभाई पटेल सबने जीवन में जो कुछ पाया, वह सब उनकी स्वाध्याय सुरुचि का वरदान था। जिसने उनकी प्रसुप्त क्षमताओं को अनेक गुना सक्रिय बना दिया। विचार की सत्ता हर व्यक्ति में होती है, स्वाध्याय उसे पैना कर उपयोगी बना देता है। जिनकी पढ़ने में अभिरुचि नहीं होती, यह कहना चाहिए कि उनके विचारों को खाद, पानी नहीं मिलता और वे फलने-फूलने की अपेक्षा मुरझाकर नष्ट हो जाते हैं। निराशाएँ, चिंताएँ, उद्विग्रताएँ और व्याधियाँ ऐसे ही लोगों को घेरती हैं। स्वाध्यायशील तो आपदाओं में हँसी-खुशी और प्रसन्नता का जीवन जी लेते हैं।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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