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गायत्री को गुरु मंत्र माना गया है। उसे वेद माता कहा गया है और गायत्री उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य बताया है। क्यों? किसलिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उस शक्तिशाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी, दिव्य तत्त्व का ध्यान करके, उससे बुद्धि की निर्मलता, शुद्धि, पवित्रता की प्रार्थना की गयी है। स्पष्ट है कि गायत्री ज्ञान का, बुद्धि का, शोध अभिवृद्धि का साधना मंत्र है। नित्य-प्रति प्रत्येक व्यक्ति परमात्म-तत्त्व का ध्यान करते हुए उससे सद्बुद्धि की, विवेक की प्रार्थना करता है।
वेद का अर्थ है- ज्ञान और ज्ञान बुद्धि की साधना का परिणाम है। इसलिए गायत्री को वेदमाता कहा गया है। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के मूल स्रोत-आधार वेद अर्थात् ज्ञान है और ज्ञान बुद्धि की देन है। अस्तु, हमारी समस्त जीवन पद्धति का संचालन बुद्धि के द्वारा होता आया है। कौटिल्य ने कहा है-जिस मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता अथवा जो बुद्धिद्रोही या अविवेकी होता है, वह मनुष्यता से गिर जाता है।
पितामह भीष्म से पूछा गया- यह धर्म कौन है? कहाँ से आया है? पितामह ने कहा- विचारशील व्यक्ति चिंतन, मनन, अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं। अर्थात् हमारा धर्म, हमारी संस्कृति विचार प्रधान है, बुद्धि प्रधान है- वेद प्रधान अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है।
ओछे कर्म करने वाले लोगों का अध्ययन करें, तो पता चलता है कि ऐसे  कार्य वे अधिकांश अज्ञानतावश ही करते हैं। जीवन की सही दिशा निर्माण करने की क्षमता न तो धन में है, न पद और प्रतिष्ठा में। आत्मनिर्माण की प्रक्रिया सत्कर्मों से पूरी होती है। सन्मार्ग में कोई स्वतः प्रवृत्त होता ही है, यह भी नहीं कहा जा सकता। यह प्रेरणा हमें औरों से मिलती है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करते हुए ही महानता की मंजिल तक पहुँचने का नियम बना हुआ है। ऐसी बुद्धि किसी को मिल जाए, तो उसे यही समझना चाहिए कि परमात्मा की उस पर बड़ी कृपा है। ज्ञान से मनुष्य को ऐसी ही धर्म बुद्धि जाग्रत् होती है, इसलिए ज्ञान को परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान मानना पड़ता है।
अज्ञानता के दुष्परिणामों से बचने के लिए हम अपनी  मानसिक चेष्टाओं को संसार का रहस्य समझने में लगायें। विचार करने की शक्ति हमें इसीलिए मिली है कि हम सृष्टि की वस्तुस्थिति को समझें और इसका लाभ अपने सजातियों को भी दें, किन्तु यह सब कुछ तभी संभव है, जब हमारा ज्ञान बढ़े। 
ज्ञान को मनुष्य की सम्पत्ति कहा गया है। उसे सत्शक्ति भी कहते हैं। वास्तविक वस्तु वह है, जो सदैव रहने वाली हो। संसार में हर वस्तु काल पाकर नष्ट हो जाती है। धन नष्ट हो जाता है, तन जर्जर हो जाता है, साथी और सहयोगी छूट जाते हैं। केवल ज्ञान ही एक ऐसा अभक्ष्य तत्त्व है, जो कहीं भी, किसी अवस्था और किसी काल में मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।
स्पष्ट है कि धर्म की व्याख्या भी ज्ञान पर आधारित है। इसलिए मनुष्य की श्रेष्ठता की परख ज्ञान के आधार पर 
करने की परिपाटी तत्त्ववेत्ताओं ने बनाई है। धन, वैभव, जमीन-जायजाद, शक्ति-सुन्दरता आदि के आधार पर किसी की उन्नति, विकास अथवा व्यक्तित्व को परखने की कसौटी मूर्खजनों की होती है। सज्जन एवं सत्पुरुष की कसौटी तो विद्या, बुद्धि, सद्ज्ञान, सदाचार, योग्यता एवं प्रतिभा ही रहा करती है। जिन्होंने विद्वानों तथा बुद्धिमानों से सम्मान पाया, श्रेष्ठता तथा सफलता का प्रमाण-पत्र प्राप्त किया है, वही वास्तव में सफल एवं श्रेष्ठ हैं, अन्यथा व्यक्ति तो सफलता एवं श्रेष्ठता पर झूठा संतोष कर आत्मवंचना ही किया करते हैं।
जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए सारा संसार अंधकारपूर्ण रहता है। सुन्दर दृश्यों तथा रंगों के आनन्द से वह वंचित रह जाता है, उसी प्रकार ज्ञानान्ध के लिए भी संसार का मधुर रहस्य ज्ञान-विज्ञान के चमत्कार, साहित्य तथा कलाओं का आनन्द, युग-युग संग्रहीत ज्ञान का रसास्वादन आदि सारे सुख निरर्थक ही रहते हैं। वह स्वर्गीय सम्पदाओं के बीच भी एक पशु की तरह केवल उदर पालन की क्रिया में ही बहुमूल्य मानव जीवन को नष्ट कर देता है। सच्चा मनुष्य वही है, जिसके पास ज्ञान की विशेषता है, विद्या रूपी धन है। विद्या की कृपा से मनुष्य का जीवन सार्थक बनता है। विद्या  के कारण ही मनुष्य सभ्य समाज में आदर का अधिकारी बनता है। धन के आधार पर विद्यारहित व्यक्ति का आदर आडम्बर तथा प्रदर्शन मात्र होता है। उसमें कोई सत्यता अथवा हार्दिकता नहीं होती है। वह लोग उसे ठगने, अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही ऊपरी मन से आदर किया करते हैं। सफलता, समाज, परिवार आनन्द, उल्लास, आदर, सम्मान आदि के जो भी भौतिक सुख हैं, विद्यावान व्यक्ति उन्हें यथार्थ रूप में भोगता ही है, और उसी आधार पर आगे बढ़ता हुआ आत्म प्रकाश अथवा मोक्ष पद तक पा लेता है।

प्रस्तुति-शान्तिकुञ्ज


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