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शास्त्रों में सप्त लोक, सप्त ऋषि, सप्त देवियाँ, सप्त नगरी, सप्त रंग, सूर्य की सप्त किरणें, सप्त घोड़ों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। उपरोक्त सात समूह वस्तुतः चेतना की सात परतें, सात आयाम हैं- जिनका आलंकारिक वर्णन इन रूपों में किया गया है। 
सामान्यतया तीन आयाम तक ही हमारा बोध क्षेत्र है। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई या गहराई के अंतर्गत समस्त पदार्थ सत्ता का अस्तित्व है। इन्द्रियों की बनावट भी कुछ ऐसी है कि वह मात्र तीन आयामों का अनुभव कर पाती है-लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई जो भी पदार्थ स्थूल नेत्रों को दृष्टिगोचर होते हैं, उनके यही तीन परिमाण हैं। चतुर्थ आयाम अनेक रहस्य अपने अन्दर छिपाये आइन्स्टीन से लेकर नारलीकर व अब्दुस्सलाम तक कई वैज्ञानिकों को शोध हेतु आकर्षित करता रहा है। योगियों का अदृश्य हो जाना, कुछ पलों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना संभवतः चतुर्थ आयाम में पहुँचकर ही संभव हो सका होगा। जिस चतुर्थ आयाम की कल्पना अभी वैज्ञानिक जगत् में की जा रही है, उसकी जानकारी हमारे ऋषियों को पूर्वकाल से है।
चतुर्थ आयाम का बोध होते ही  ज्ञान का एक अनंत क्षेत्र खुल सकता है। तब यह संसार भिन्न रूप में दिखाई पड़ने लगता है। उन मान्यताओं को जिन्हें हम सत्य यथार्थ मानते हैं, संभव है भ्रांति मात्र लगने लगे। आइन्स्टीन की कल्पना के अनुसार काल को भूत, वर्तमान, भविष्य की सीमाओं से नहीं बांधा जा सकता है। हाइजनवर्ग जैसे वैज्ञानिक ने सिद्ध किया कि काल भूत से वर्तमान एवं भविष्य से भूतकाल की ओर भी चलता है। 
पाँचवाँ आयाम विचार जगत् से संबंधित है। विचारों के माध्यम से वस्तुओं के स्वरूप की कल्पना की जाती है। विचार जगत् में उठने वाली तरंगें वातावरण एवं मनुष्यों को प्रभावित करती हैं तथा अपने अनुरूप लोगों को चलने के लिए बाध्य करती हैं। पंचम आयाम की रहस्यमय शक्ति को जानने एवं उसको करतलगत कर सदुपयोग करने से ही बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक क्रान्तियाँ संभव हो सकी हैं। कन्दरा में बैठे ऋषि एक स्थान पर बैठकर अपने विचारों को पंचम आयाम में प्रस्फुटित करते रहते हैं तथा अभीष्ट परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं।
छठा आयाम भावना जगत् है। कहते हैं कि इस लोक में मात्र देवता निवास करते हैं। इस आलंकारिक वर्णन में एक तथ्य छिपा है कि भावों में ही देवता निवास करते हैं अर्थात् भाव सम्पन्न व्यक्ति देव तुल्य हैं। भावना की शक्ति असीम है। आत्मा का परमात्मा से मिलन कितना आनन्ददायक होता है-इसका अनुमान भौतिक मनःस्थिति द्वारा लगा सकना संभव नहीं है। तत्त्वज्ञानी उसी आनन्द की मस्ती में डूबे रहते हैं तथा जन-मानस को उसे प्राप्त करने की प्रेरणा देते रहते हैं।
तुलसीदास जड़-चेतन सबमें परमात्म सत्ता का अनुभव करते हुए लिखते हैं- सीयराम मय सब जग जानी। ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्। ईशावास्योपनिषद् तथा रामायण के इस उद्धरण में अद्वैत स्थिति का वर्णन किया गया है। सप्तम आयाम की यही स्थिति है। इसमें पहुँचने पर जड़-चेतन में विभेद नहीं दीखता। सर्वत्र एक ही सत्ता दृष्टिगोचर होती है। शिव-शक्ति का, ब्रह्म-प्रकृति का, जड़-चेतन का, जीव-ब्रह्म की एकरूपता सातवें आयाम में दिखाई पड़ने लगती है। इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। इसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता। सातवें आयाम का ही वर्णन लोक के रूप में किया गया है। 
आइन्स्टीन के चतुर्थ आयाम की कल्पना मात्र से वैज्ञानिकों के हाथ में एक बहुत बड़ी शक्ति मिलने की आशा बन चली है। लेजर किरणों से होलोग्राफी के आधार पर त्रिमितीय सिनेमाओं का निर्माण कई देशों में हो चुका है। जहाँ पर्दे पर मनुष्य, मोटर, गाड़ी, शेर, हाथी यथार्थवत् चलते दिखायी देते हैं। अनभ्यस्त व्यक्तियों को प्रायः यथार्थ होने का भ्रम हो जाता है। इसके  पश्चात् चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम आयाम कितना विलक्षण एवं शक्ति-सम्पन्न हो सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
वस्तुतः सात लोकों का अस्तित्व अपने इर्द-गिर्द एवं भीतर बाहर भरा पड़ा है। उसमें से इन्द्रियों एवं यंत्र-उपकरणों से तो मात्र तीन को ही अनुभव किया जा सकता है। चौथे लोक में यदि प्रवेश संभव हो सके, तो इन्हीं इन्द्रियों और इन्हीं यंत्र- उपकरणों से ऐसा कुछ देखा-समझा जा सकेगा, जिसे आज की तुलना में अकल्पनीय और प्रत्याशित एवं अद्भुत ही कहा जाएगा। भूः, भुवः, स्वः के बाद यह चौथा आयाम चेतना जगत् और भौतिक जगत् का घुला-मिला स्वरूप है। इसे तप लोक कहा गया है। तपस्वी इसमें अभी भी प्रवेश पाते और अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न सिद्ध कहलाते हैं।
इसके ऊपर के जनः महः और सत्य लोक विशुद्धतः चेतनात्मक हैं। उनमें  प्रवेश पाने वाला दैवी शक्तियों से सम्पन्न होता है, उस तरह की मनःस्थिति एवं परिस्थिति में होता है, जिसे पूर्ण पुरुष, जीवन्मुक्त, परमहंस एवं देवात्मा जैसे शब्दों में सामान्य जनों द्वारा तो कहा-सुना ही जा सकता है।

प्रस्तुति- शान्तिकुञ्ज


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