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शासन का क्षेत्र पदार्थ एवं व्यवहार है, धर्म का चरित्र एवं चिन्तन। धर्म व्यक्तित्व का गठन करता है। शासन साधनों के उत्पादन वितरण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था जैसे भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति करता है। अर्थ और दण्ड की शक्ति उसके हाथ में रहने से आकर्षण एवं भय के आधार पर उसका लोहा भी माना जाता है। इतने पर भी धर्म की गरिमा, उपयोगिता एवं स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। मानवीय अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आस्था जमाने विचारणा में सदाशयता जोड़ रखने तथा क्रिया-प्रक्रिया को नीति-निष्ठ बनाने की शक्ति धर्म की ही है।
मनुष्यों का समूह ही समाज है। लोगों का स्तर जैसा होता है, उसी के अनुरूप समाज की गतिविधियाँ होती हैं, वैसी ही परिस्थितियाँ बनती हैं। शासन परिस्थितियों का नियन्त्रण भर करता है। उनका उत्पादन तो अंतःकरण एवं बुद्धि संस्थान से ही होता है। अस्तु, भावना क्षेत्र की दिशा देने वाले धर्म की गरिमा सदा ऊँची रहेगी। उसे शासन से भी अधिक महत्त्व मिलेगा। 
शासन का महत्त्व सभी समझते हैं। कोई भी अराजकता नहीं चाहता। यहाँ तक कि दुष्ट दुराचारी भी नही, क्योंकि अभी तो उन्हें न्याय-व्यवस्था के अंतर्गत अपनी जान बचाने और अनीति को छद्मरूप से चलाने का जो अवसर मिला हुआ है, वह भी अराजकता की स्थिति में न रहेगा। नीति-मर्यादा का परित्याग कर देने के बाद मनुष्य ङ्क्षहस्र पशुओं से भी अधिक आततायी हो जाता है। हिंसक जन्तु पेट भर जाने पर आक्रमण नहीं करते, पर मनुष्य तो दर्प के लिए असंख्यों को मटियामेट करता रहता है। मध्यकालीन सामन्तवाद का प्रत्येक रक्त-रंजित पृष्ठ इसी की साक्षी देता है। आज भी हिटलर, चंगेजखाँ, नादिरशाह, रावण, दुर्योधन, जरासन्ध आस्थाहीन व्यक्तियों ने न जाने कितने कहर ढाये हैं। आततायी और आतंकवादी प्रायः आस्थाहीन ही होते हैं। अराजकता और अधार्मिकता में से कौन अधिक भयावह है, यह कहना कठिन है। 
शासन के पास साधन कितने ही अधिक हों, उसकी सफलता बफादार ईमानदार कर्मचारियों एवं नीतिनिष्ठ प्रजाजनों पर टिकी हुई है। यदि कर्मचारी भ्रष्ट हों, तो असीम साधनों के रहते हुए भी पतन-पराभव का मुंळ देखना पड़ेगा, इसी प्रकार प्रजाजन यदि दुष्टता पर उतारु हो चलें, तो फिर उन्हें नियन्त्रित करने में पुलिस कचहरी की शक्ति क्या काम करेगी? 
शासन को श्रेय देने वाली सफलताएँ नीतिनिष्ठ कर्त्तव्यपरायण प्रजाजनों पर निर्भर है। कहना न होगा कि यह समूचा भावना क्षेद्घ धर्म धारणा के अंतर्गत आता है। शासन लोभ या भय के आधार पर किसी को भी उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न नहीं बना सकता। सरकारी प्रचार प्रोपेगेण्डा के आधार पर प्रस्तुत समाचारों तक पर जब विश्वास नहीं किया जाता, तो उनके द्वारा चिन्तन को उत्कृष्टता और व्यवहार की आदर्शवादिता को लोकमानस में इतनी गहराई तक उतार देना किस प्रकार संभव होगा।
धर्म-धारणा जहाँ भी बलवती, होगी, वहाँ नैष्ठिक नागरिकता, अनुशासित सामाजिकता, चारित्रिक संयमशीलता, व्यावहारिक सज्जनता के वे सभी चिह्न प्रकट होंगे, जिन्हें मानवीय गरिमा के रूप में सुना समझा जाता रहा है। श्रेष्ठताओं का समुच्चय ही ‘धर्म’ है। हर किसी का इस आप्त वचन पर दृढ़ विश्वास था कि धर्म की रक्षा करने से ही अपनी रक्षा होती है और मारने वाले को वह उलट कर मार ही डालता है। इसी तथ्य और सत्य पर अटूट विश्वास होने के कारण इस देश के नागरिक देवोपम कहे जाते थे।
धर्म की इस गरिमा से मनुष्य जाति चिरकाल से परिचित, अभ्यस्त, आश्वस्त रही है। फलतः इस गये गुजरे जमाने में जबकि धर्म मात्र विडम्बनाओं का अजायब घर बनकर रह गया है, उस प्राचीन गरिमा के प्रति अभी भी अजस्र श्रद्धा जमी हुई है। धर्म की मूल धारणा अस्त-व्यस्त हो जाने के उपरांत भी उसके मजार पर जितनी श्रद्धा बरसती है, उसे देखकर अनुमान लगाया जा सकता है, कि जब वह जीवन्त रहा होगा, तो कितनी बड़ी गौरव गरिमा का केन्द्र रहा होगा।
भारत को ही लें। यहाँ देवालयों का तीर्थयात्रा का कर्मकाण्डों का सोमवती अमावस्या से लेकर कुंभ जैसे छोटे-बड़े पर्वों का खर्चा जोड़ा जाय, तो सरकार द्वारा वसूल किये जाने वाले राजस्व से कहीं अधिक बैठता है। जिनका धर्म ही आजीविका, व्यवसाय हैं, ऐसे साधु बाबाओं की संख्या तकरीबन ६० लाख है। जो इस उद्योग पर पूर्णतया निर्भर नहीं है। आंशिक समय गँवाते और उपार्जन करते हैं, उन पण्डा-पुरोहितों की संख्या भी ४० लाख तो माननी ही पड़ेगी। इन एक करोड़ धर्म जीवियों का ठाट-बाट और आडम्बरों से भरा-पूरा व्यय भार भावुक धर्म प्रेमियों को ही उठाना पड़ता है। यह राशि इतनी बनती है जितनी कि शिक्षा और चिकित्सा के लिए निर्धारित कुल वजट की। मनोयोग, श्रम, समय एवं धन के रूप में जितनी मानवीय शक्ति धर्म के निमित्त लगती है, उसे उपार्जन, निर्वाह के बाद तीसरे नम्बर की सम्पदा कह सकते हैं।
इतनी बड़ी मानवीय शक्ति यदि सृजनात्मक प्रयोजनों में लग सकें, तो उतने भर से व्यक्ति और समाज का कायाकल्प हो सकता है। जो क्षेत्र शासन की पकड़ से बाहर हैं, जिन्हें संभालना निश्चित रूप से धर्म तंत्र के कंधे पर है, उस चिंतन और चरित्र के उभारने वाले प्रयोजनों में यह शक्ति लग सके, तो उसकी परिणति उससे भी अधिक श्रेयस्कर हो सकती है। बलिष्ठता, सम्पदा और बुद्धिमत्ता को मानवीय शक्ति माना जाता है किन्तु यदि थोड़ी गहराई में उतरकर देखा जाय, तो प्रतीत होगा कि अंतर की गहन परतों में विद्यमान आस्थाएँ ही उसकी वास्तविक सामर्थ्य है। उत्थान और पतन के लिए पूरी तरह वही जिम्मेदार है। यहाँ एक तथ्य और भी समझ लेना चाहिए कि इस शक्ति स्रोत को उभारने और दिशा देने का कार्य मात्र धर्म ही करता रहा है। भविष्य में भी वही करेगा। यहाँ धर्म तत्त्व से तात्पर्य आस्थाओं को उत्कृष्टता के साथ जोड़े रहने वाली उच्चस्तरीय अंतःप्रेरणा से है। आज के सम्प्रदायवाद को तो उसकी छाया या विकृति ही कह सकते हैं। 
आवश्यकता इस बात की है कि भ्रान्तियों का कुहासा हटाया जाय और धर्म के मूल स्वरूप की उपयोगिता और उसके नाम पर चल रही प्रतिगामिता जन्य विभीषिका से सर्वसाधारण को अवगत कराया जाय। धर्म और सम्प्रदाय के बीच क्या सम्बन्ध और क्या अन्तर है इसे समझने का अवसर मिलना ही चाहिए।
स्थिति इतनी गंभीर है कि कुरीतियों और मूढ़-मान्यताओं का विरोध करने वाले तक उन्हीं अन्ध-परंपराओं से चिपके देखे जाते हैं। विवेक कितना दुर्बल और प्रचलन कितना समर्थ है इस दुर्भाग्य भरी स्थिति को देखकर हतप्रभ रह जाना पड़ता है। समय की माँग है कि नीर-क्षीर विवेक का सरंजाम जुटाया जाय। यथार्थता और विडम्बना के अंतर को समझने का अवसर सर्व साधारण को दिया जाय। 

प्रस्तुती- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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