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सभी संत पुरुषों ने बतलाया है मनुष्य जितना  अधिक दूसरों को देता है और दूसरों से जितना कम अपने लिए चाहता है, उतना ही वह श्रेष्ठ होता है, इसके विपरीत जितना वह दूसरों को कम देता है और अपने लिए जितना ही अधिक चाहता है, उतना ही वह दीन-हीन होता  जाता है, जो मनुष्य दूसरों के लिए अधिक से अधिक प्रेम भावना रखता है और अपनी स्वार्थपरता की ओर से उदासीन रहता है, उसके लिए श्रेष्ठ बनना उतना ही सुगम होता है। इसके विपरीत जो मनुष्य अपने को जितना अधिक प्रेम करता है और दूसरों से अपने लिए जितनी सहायता चाहता है और अपनी जितनी ही अधिक सेवा कराता है, उतना ही वह दूसरे लोगों की भलाई कम कर सकता है। एक मनुष्य जो दूसरों को खिलाने की बजाय खुद ही बहुत अधिक खा लेता है,  वह अन्य लोगों की दो प्रकार की हानि करता  है। एक तो उसके अधिक खाने से दूसरों के भोजन में कमी पड़ जाती है और दूसरा अधिक खा लेने से वह अपनी शक्ति को भी खो बैठता है तथा दूसरों का हित करने योग्य नहीं रहता।
बहुत से लोग ऐसा प्रकट करते हैं कि वे दूसरों से प्रेम करते हैं, जबकि वे इसका मूल्य ही नहीं समझते, पर उनका प्रेम केवल शब्दों तक ही सीमित रहता है। हम दूसरों के साथ तभी वास्तविक प्रेम कर सकते हैं, जब अपना अनुचित स्वार्थ छोड़ें और अपने स्व से प्रेम करना सीखें। ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं, जिनमें हमें लगता है कि हम दूसरों से प्रेम करते हैं, पर अवसर आने पर हम वेदर्दी से असहायों की उपेक्षा कर देते हैं। हमारी आदर्श सोच अपनी परीक्षा की घड़ियों में असफल साबित होती है। दूसरों के लिए  आश्रय देना हम भूल जाते हैं, अपने लिए नहीं भूलते। इसलिए दूसरों को सचमुच प्रेम करने के लिए हमको अपने आपको अधिक सावधान करना होगा।
कई बार हम बिलासी जीवन बिताने वाले और अपने सुख के लिए ही प्रयत्न वाले व्यक्ति की ऊपरी आदर्शवादी बातों को देखकर कह देते हैं कि अमुक श्रेष्ठ जीवन बिता रहा है, किन्तु ऐसा व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष और चाहे उसमें  चरित्रशीलता के कितने ही अच्छे गुण-नम्रता, अच्छा स्वभाव आदि क्यों न हों, अच्छा आदमी नहीं हो सकता और न अच्छा जीवन बिताने का दावा कर सकता है। क्योंकि उसके जीवन की कोई धार नहीं है, जिस प्रकार एक चाकू कैसे भी बढ़िया लोहे का क्यों न बनाया गया हो और उसका बनाने वाला भी कैसा ही कारीगर क्यों न हो, पर जब तक उसमें धार न लगाई जायगी, वह तेज और कारगर नहीं हो सकता। अच्छा आदमी बनने और अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य दूसरों से जितना ग्रहण करे, उससे अधिक उन्हें लौटा दे, किन्तु स्व-भोगी (अपने सुख का ध्यान रखने वाला) मनुष्य, जो ऐश-आराम की जिन्दगी बिताने का अभ्यस्त है, ऐसा कर  नहीं पाता। 
इसका पहला कारण है कि हमेशा उसको अपने लिए बहुत से पदार्थों की जरूरत रहती है। वह भोग विलास का अभ्यस्त हो चुका है और जिन पदार्थों का वह अभ्यस्त होता है, उनसे वंचित रहना उसको कष्टकर जान पड़ता है। दूसरे वह अन्य लोगों से जो कुछ प्राप्त करता है, उस सबका उपयोग स्वयं ही करके, वह अपने आपको कमजोर और श्रम करने के अयोग्य बना लेता है, अंततः इस प्रकार दूसरों की सेवा करने में असमर्थ हो जाता है। एक स्वयं भोगी मनुष्य, जो देर तक कोमल शैय्या पर सोता है, गरिष्ठ और मीठे पदार्थों का सेवन करता है, हमेशा बढ़िया और फैशनेबिल कपड़े पहिनता है, कभी मेहनत का काम नहीं करता, वह कभी किसी का उपकार या सेवा करने योग्य नहीं रहता। ऐसा मनुष्य अपने भोग-विलासमय जीवन को तिलांजलि दिए बिना किस प्रकार दूसरों का भला कर सकता है? किस प्रकार श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर सकता है?
ऊँचे भोग-विलास, प्रचुर संसाधनों में जीवन यापन करने वालों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गरीब लोगों को ऐसी परिस्थितियों में रहना पड़ता है कि उनको न तो स्वास्थ्यकर भोजन मिलता है, न स्वास्थ्यकर मकान।  न उचित कपड़े और न ही मनोरंजन के लिए साधन नसीब होते हैं। वृद्ध, बालक और स्त्रियाँ जो श्रम-मजदूरी के लिए रात-रात भर जागकर रोग आदि से जर्जर हो गये हैं, वे हमारे लिए ही आराम और विलास की ऐसी चीजें तैयार करने में अपना जीवन खपा देते हैं, जो उनको कभी नसीब नहीं होती। हमें उसका हमें उसका उपभोग करते समय सिकन तक नहीं आती, दुखद पहलु है। इसलिए कोई भी मनुष्य तब तक नीतिवान और धार्मिक होने का दावा नहीं कर सकता, जब तक  मनुष्यता तथा न्याय की रक्षा के लिए वह अपने विलासमय जीवन में परिवर्तन करने को तैयार न हो। 

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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