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एक अनादि शक्ति जिसे हम अपनी भाषा में ब्रह्म, सृष्टिकर्त्ता, परमात्मा आदि विविध नामों से जानते हैं, उसका प्रकाश, उसकी प्रेरणा ही जगत् को सब ओर से प्रकाशित किए हुए हैं। उसी से इस जगत् और यहाँ के पदार्थों को हमारे ज्ञान-क्षेत्र, कार्य-क्षेत्र सौन्दर्य को स्फुरण मिल रहा है। वही अपने समग्र रूप में सर्वत्र ही अवतीर्ण होता रहता सत्य रूप में प्रतिष्ठित है। जगत् और इसके प्रेरक तत्त्व को जब हम एक करके देखते हैं, तभी हमारे ध्यान की प्रक्रिया पूर्ण होती है। हमारे ध्यान मंत्र में  ‘ॐ भूर्भुवः स्वः..’ के उच्चारण से ही सृष्टि का बोध होने लगता है और अखिल ब्रह्माण्ड के बीच जब उन्हें ही अपनी चेतना को, सूर्य, पृथ्वी, तारागण आदि को प्रकाशित करते देखते हैं, तभी हम सत्य का दर्शन करते हैं।
जगत् और अध्यात्म का जहाँ परिपूर्ण सामंजस्य होता है, वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है और यह सत्य जब हमारी जीवनयात्रा का आधार होता है, तभी हम जगत् और उसकी प्रेरक शक्ति का परिचय प्राप्त कर कृतार्थ होते हैं। इसलिए सत्य ही जवीन का सहज दर्शन है। महात्मा गाँधी के शब्दों में सत्य हमारे जीवन का नियम है। महर्षि व्यास ने सत्य को ही सर्वोपरि धर्म बतलाया है। सत्य तत्त्व को जानकर ही ऋषिगण देवयान मार्ग से परमात्मा तक पहुँचते हैं। महात्मा गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सृष्टि में सत्य की ही एक मात्र सत्ता है। सत्य के ऊपर कोई ईश्वर नहीं, सत्य स्वयं ही ईश्वर की अभिव्यक्ति है।
सत्यदर्शी विश्वामित्र ने सत्य की महिमा का बखान करते हुए कहा है-
सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी।
सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः॥
सत्य से ही सूर्य तप रहा है, सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है। सत्य पर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है।  एक अन्य शास्त्रकार ने भी इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहा है- 
सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्य से ही पृथ्वी स्थिर है, सत्य से सूर्य तप तपता है, सत्य से ही वायु बहती है। सब सत्य में ही स्थिर है।
स्मरण रहे कि अध्यात्ममय जगत्  ही सत्य का आधार है। पूर्व और पश्चिम जैसे एक ही अखण्ड क्षितिज में स्थित हैं, ठीक इसी तरह जगत् और अध्यात्म दृश्य और अदृश्य सत्ता एक ही सत्य के दो पहलू हैं। इनमें से एक का भी परिहार करने पर हम सत्य के समक्ष अपराधी होते हैं।
जब हम जगत् की समस्त घटनाओं को केवल बाह्य घटनाएँ समझते हैं, तो उनसे हमें कोई आनन्द नहीं मिलता। वे घटनाएँ और हमारा जीवन केवल एक रूखी मशीनी प्रक्रिया मात्र बनकर रह जाता है। जिस तरह पटरी पर रेल, सड़क पर मोटर, शिलाखण्ड़ों पर नदी की धारा बहती है, उसी तरह हमारे मन-पाषाण पर जगत् की धारा बहती रहती है। चित्त पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता। सब कुछ निर्जीव नीरस अरुचिकर व्यापार सा लगता है और तब हम कृत्रिम उपायों, व्यसनों द्वारा नाना वृथा कर्मों द्वारा आमोद-प्रमोद प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन फिर भी हमारी जीवनयात्रा एक बोझ-सी मालूम पड़ती है।
जब हम केवल जगत् को, यहाँ की घटनाओं को ही देखते हैं, तो हमें जीवन में कोई रस नहीं मिलता, न उत्साह स्फूर्तिमय प्रेरणा ही। कुछ समय तक तो ये हमारे मन, इन्द्रियों को लुभाये रहते हैं, किन्तु शीघ्र ही इनसे विरक्ति होने लगती है और फिर अपने स्वभाव के अनुसार अन्य पदार्थों में जीवन रस ढूँढ़ते हैं और एक समय वहाँ से भी हमें हटना पड़ता है। गरज यह है कि हम वस्तु से वस्तु, पदार्थ से पदार्थ, घटना से घटनाओं में चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन इन सबसे हमारी चेतना को कहीं स्फुरणा प्राप्त नहीं होती।
हमारी पदार्थवादी जगत् प्रधान दृष्टि के कारण सूर्य के उगने में, नदी के कल-कल बहने में, पक्षियों के गुंजन में, वृक्षों के फलने-फूलने में भी कोई विशेष प्रेरणा नहीं मिलती और हम यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। प्रतिदिन कहीं कुछ सहारा पाने को जहां हमारी चेतना को स्फुरणा मन को आनन्द की प्रेरणा प्राप्त हो सके, लेकिन असत्य की छाया में सुख-शान्ति कहाँ? उल्टे ये सब हमारे लिए दुःखप्रद, कष्टदायी, क्लेशपूर्ण ही सिद्ध होते हैं।
इसी तरह ही हमारा अभ्यास कुछ ऐसा हो गया है कि अध्यात्म को भी हम एकांगी दृष्टि से देखते हैं। जगत् की सीढ़ियाँ जिन पर चढ़कर सत्य दर्शन की यात्रा पूरी करते हैं, उनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता और बिना सीढ़ी के छत पर पहुँचना संभव नहीं होता, ठीक उसी तरह जगत् को भुलाकर हमारे सत्य दर्शन के प्रयास व्यर्थ सिद्ध होते हैं। जगत् के साथ रहने से ही अध्यात्म की भी सार्थकता है, अन्यथा वह एक कपोल-कल्पना, मूढ़ विश्वास मात्र बनकर रह जाता है।

प्रस्तुति- गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज


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